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इमरजेंसी के वक्त की कड़वी यादें नहीं भूल सकते लोकतंत्र रक्षक सेनानी: योगेंद्र
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नौहझील। इमरजेंसी के वक्त की कड़वी यादें भूलना बहुत कठिन है। लोकतंत्र रक्षक सेनानी इन कड़वी यादों को कभी भुला नहीं सकते हैं। ये बातें लोकतंत्र रक्षक सेनानी चौ. योगेंद्र सिंह ने कहीं। 1975 में देश में लगाई गई इमरजेंसी में जेल काट चुके लोकतंत्र रक्षक सेनानी चौ. योगेंद्र सिंह इमरजेंसी को देश के लिए कलंक मानते हैं। 1975 की यादें उनके जेहन में आज भी बसी हुई हैं। 25 जून 1975 की रात देश में इमरजेंसी लगी थी।
नौहझील थाना क्षेत्र के गांव मुसमुना निवासी चौ. योगेंद्र सिंह उस दौरान भारतीय लोकदल के सक्रिय सदस्य थे। चरण सिंह की पार्टी के इस युवा और तेज तर्रार कार्यकर्ता को सात अगस्त 1975 को इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने उठा लिया। इनके साथ चार अन्य साथियों को भी जेल में डाल दिया गया। इनके उस वक्त के सभी साथी चल बसे हैं। इमरजेंसी को वह काला अध्याय मानते हैं। योगेंद्र को पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह व पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की ओर से सम्मान पत्र भी दिया जा चुका है।
इमरजेंसी के दिनों को याद करते हुए प्रमुख शिक्षाविद व आर्केडियन पब्लिक स्कूल के चेयरमैन संजय पाठक बताते हैं कि 25 जून 1975 को थोपी गई इमरजेंसी की कालिमा जब 21 माह बाद समाप्त हो रही थी, तब हम कक्षा सात में प्रवेश कर रहे थे। उन दिनों हम जैसे छोटे बच्चों से एक डिक्लियरेशन फॉर्म भरवाया जाता था, जिसमें दहेज न लेने और दो बच्चों के बाद नसबंदी कराने की वचनबद्धता होती थी।
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नौहझील थाना क्षेत्र के गांव मुसमुना निवासी चौ. योगेंद्र सिंह उस दौरान भारतीय लोकदल के सक्रिय सदस्य थे। चरण सिंह की पार्टी के इस युवा और तेज तर्रार कार्यकर्ता को सात अगस्त 1975 को इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने उठा लिया। इनके साथ चार अन्य साथियों को भी जेल में डाल दिया गया। इनके उस वक्त के सभी साथी चल बसे हैं। इमरजेंसी को वह काला अध्याय मानते हैं। योगेंद्र को पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह व पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की ओर से सम्मान पत्र भी दिया जा चुका है।
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इमरजेंसी के दिनों को याद करते हुए प्रमुख शिक्षाविद व आर्केडियन पब्लिक स्कूल के चेयरमैन संजय पाठक बताते हैं कि 25 जून 1975 को थोपी गई इमरजेंसी की कालिमा जब 21 माह बाद समाप्त हो रही थी, तब हम कक्षा सात में प्रवेश कर रहे थे। उन दिनों हम जैसे छोटे बच्चों से एक डिक्लियरेशन फॉर्म भरवाया जाता था, जिसमें दहेज न लेने और दो बच्चों के बाद नसबंदी कराने की वचनबद्धता होती थी।
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