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ब्रज की होली की शान मुखराई का चरकुला नृत्य
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चरकुला नृत्य करती एक महिला।
- फोटो : MATHURA
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राधाकुंड (मथुरा)। मुखराई का चरकुला नृत्य ब्रज की होली की शान है। इसमें 108 जलते दीपकों को पहिए पर रख कर ब्रज की गोपिकाएं नृत्य करतीं हैं। इसकी कथा राधा रानी के जन्म की कथा से जुड़ी है। यह नृत्य अब होली का मुख्य हिस्सा बन चुका है।
फागुन मास की मस्ती में उड़ते रंग के बीच नृत्य की चमक अलग ही आभा बिखेरती है। श्रीराधा जी की ननिहाल गांव मुखराई में थी। उनकी नानी मुखरा देवी ने जब यह सुना की उनकी पुत्री कीरत ने भादों मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा रानी को जन्म दिया है तो इसकी मुखरा देवी को बड़ी खुशी हुई। खुशी में उन्होंने गाड़ी के पहिये पर 108 दीपक जलाकर और उसे सिर पर रख कर नृत्य किया। आगे चल कर यही चरकुला नृत्य के रूप में प्रसिद्ध हुआ। हुरियारे लोक गीत जुग-जुग जियो नाचन हारी गाकर उन्हें उत्साहित करते हैं।
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चरखुला को दिया नया रूप
गांव मुखराई के प्यारे लाल ने 1845 में चरकुला को नया रूप दिया था। उन्होंने लकड़ी का घेरा लोहे की थाल और लोहे की पत्ती मिट्टी के बने 108 दीपक रख पांच मंजिला चरकुला बनाया। इसका वजन 40 किलोग्राम होता है। इसे महिला सिर पर रख कर मुखराई स्थित मदन मोहन मंदिर के निकट नृत्य करतीं हैं। वर्ष 1930 से 1980 तक लगातार यह नित्य लक्ष्मी देवी और अशर्फी देवी ने किया था।
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विदेशों तक पहुंच चुका चरकुला नृत्य
राधाकुंड। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा से 25 किमी दूर गांव मुखराई स्थित है। चरखुला नृत्य का पहली बार मथुरा जन्मभूमि पर आयोजन किया गया था। गांव के मदन लाल और छगन लाल शर्मा 1992 में चरकुला नृत्यांगना लक्ष्मी देवी के साथ पहली बार मॉरीशस गए। इसके बाद तो विश्व के अनेक देशों में चरकुुला नृत्य की प्रस्तुति दी गई।
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फागुन मास की मस्ती में उड़ते रंग के बीच नृत्य की चमक अलग ही आभा बिखेरती है। श्रीराधा जी की ननिहाल गांव मुखराई में थी। उनकी नानी मुखरा देवी ने जब यह सुना की उनकी पुत्री कीरत ने भादों मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधा रानी को जन्म दिया है तो इसकी मुखरा देवी को बड़ी खुशी हुई। खुशी में उन्होंने गाड़ी के पहिये पर 108 दीपक जलाकर और उसे सिर पर रख कर नृत्य किया। आगे चल कर यही चरकुला नृत्य के रूप में प्रसिद्ध हुआ। हुरियारे लोक गीत जुग-जुग जियो नाचन हारी गाकर उन्हें उत्साहित करते हैं।
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चरखुला को दिया नया रूप
गांव मुखराई के प्यारे लाल ने 1845 में चरकुला को नया रूप दिया था। उन्होंने लकड़ी का घेरा लोहे की थाल और लोहे की पत्ती मिट्टी के बने 108 दीपक रख पांच मंजिला चरकुला बनाया। इसका वजन 40 किलोग्राम होता है। इसे महिला सिर पर रख कर मुखराई स्थित मदन मोहन मंदिर के निकट नृत्य करतीं हैं। वर्ष 1930 से 1980 तक लगातार यह नित्य लक्ष्मी देवी और अशर्फी देवी ने किया था।
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विदेशों तक पहुंच चुका चरकुला नृत्य
राधाकुंड। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा से 25 किमी दूर गांव मुखराई स्थित है। चरखुला नृत्य का पहली बार मथुरा जन्मभूमि पर आयोजन किया गया था। गांव के मदन लाल और छगन लाल शर्मा 1992 में चरकुला नृत्यांगना लक्ष्मी देवी के साथ पहली बार मॉरीशस गए। इसके बाद तो विश्व के अनेक देशों में चरकुुला नृत्य की प्रस्तुति दी गई।