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#हिंदीहैंहम: लगातार बढ़ रहा हिंदी का दायरा, हिंदी भारतीयों के स्वाभिमान की भाषा
Fri, 28 Aug 2020 12:28 AM IST
आगरा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Fri, 28 Aug 2020 12:28 AM IST
सार
किसी भी देश और राष्ट्र की पहचान वहां की भाषा से ही होती है। भारत सदियों से वैदिक सनातन संस्कृति का संवाहक रहा है। यहां की मुख्य भाषा हिंदी है। यहां ऋषि मुनियों, विद्वानों, आचार्यों, लेखक, कवियों ने हिंदी भाषा को अपनाकर न केवल हिंदी को सम्मानित किया अपितु इसे एक पहचान दी।
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
हिंदी का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। तकनीकी युग में भी सभी वर्गों में हिंदी अपनी गहरी पैठ बना रही है। देश ही नहीं, विदेश में भी हिंदी की पकड़ मजबूत हो रही है। अब हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित करने की मांग उठने लगी है। अमर उजाला ने व्हाट्सएप संवाद के जरिये हिंदी के विशेषज्ञों से उनके विचार जाने।
हिंदी भारतीयों के स्वाभिमान की भाषा
आज के युग में हिंदी की उपयोगिता मनोरंजन के क्षेत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन, सिनेमा, समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन के साथ अब शोध कार्यों में भी हिंदी का उपयोग होने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के बोलने वाले निरंतर बढ़ रहे हैं। विभिन्न देशों में कई विश्वविद्यालय हिंदी की पढ़ाई करा रहे हैं। हिंदी भारतीयों के स्वाभिमान की भाषा है। हिंदी से भारतीयों का गौरव भी है। अनेक देशों ने अपनी मातृ भाषा के बल पर प्रगति की है तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है। - डॉ. अखिलेश गर्ग, बीएसए इंजी कॉलेज, मथुरा
शुद्ध व्याकरणनिष्ठ हिंदी प्रयोग के आग्रह हित में नहीं
अपनी संस्कृति और इतिहास से लगाव अपनी भाषा की स्थिति पर एक स्वाभाविक चिंता पैदा कर देता है। सामान्यजन के बीच आज अपनी संस्कृति को लेकर जो सरोकार दिखाई पड़ रहे हैं, वे भारत की प्रमुख भाषा हिंदी के उत्थान को लेकर भी उतने ही मुखर हैं। देखा जाए तो भारत में राष्ट्रवाद के रुझान के साथ ही हिंदी भाषा की स्थिति को लेकर बहस लेखकों के बीच आ गई थी। साथ ही संप्रेषण भी समय के साथ आते विकास से अनिवार्यत: जुड़ा होता है। शुद्ध संस्कृतनिष्ठ या व्याकरणनिष्ठ हिंदी के प्रयोग का आग्रह हिंदी के दूरगामी हित में नहीं होगा। - सुनील आचार्य, सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक
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हिंदी भारतीयों के स्वाभिमान की भाषा
आज के युग में हिंदी की उपयोगिता मनोरंजन के क्षेत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन, सिनेमा, समाचार पत्र-पत्रिकाओं के जरिये तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन के साथ अब शोध कार्यों में भी हिंदी का उपयोग होने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी के बोलने वाले निरंतर बढ़ रहे हैं। विभिन्न देशों में कई विश्वविद्यालय हिंदी की पढ़ाई करा रहे हैं। हिंदी भारतीयों के स्वाभिमान की भाषा है। हिंदी से भारतीयों का गौरव भी है। अनेक देशों ने अपनी मातृ भाषा के बल पर प्रगति की है तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है। - डॉ. अखिलेश गर्ग, बीएसए इंजी कॉलेज, मथुरा
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शुद्ध व्याकरणनिष्ठ हिंदी प्रयोग के आग्रह हित में नहीं
अपनी संस्कृति और इतिहास से लगाव अपनी भाषा की स्थिति पर एक स्वाभाविक चिंता पैदा कर देता है। सामान्यजन के बीच आज अपनी संस्कृति को लेकर जो सरोकार दिखाई पड़ रहे हैं, वे भारत की प्रमुख भाषा हिंदी के उत्थान को लेकर भी उतने ही मुखर हैं। देखा जाए तो भारत में राष्ट्रवाद के रुझान के साथ ही हिंदी भाषा की स्थिति को लेकर बहस लेखकों के बीच आ गई थी। साथ ही संप्रेषण भी समय के साथ आते विकास से अनिवार्यत: जुड़ा होता है। शुद्ध संस्कृतनिष्ठ या व्याकरणनिष्ठ हिंदी के प्रयोग का आग्रह हिंदी के दूरगामी हित में नहीं होगा। - सुनील आचार्य, सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक
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किसी राष्ट्र की पहचान वहां की भाषा से
किसी भी देश और राष्ट्र की पहचान वहां की भाषा से ही होती है। भारत सदियों से वैदिक सनातन संस्कृति का संवाहक रहा है। यहां की मुख्य भाषा हिंदी है। यहां ऋषि मुनियों, विद्वानों, आचार्यों, लेखक, कवियों ने हिंदी भाषा को अपनाकर न केवल हिंदी को सम्मानित किया अपितु इसे एक पहचान दी। देश भाषियों के बीच संपर्क की भाषा बनाया। वर्तमान में अपने स्वरूप को बचाने को लगी है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल देेश में राष्ट्र भाषा को 14 सितंबर को दिवस के रूप में याद किया जाता है। - देवेंद्र शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता
हिंदी वैज्ञानिक भाषा और संस्कृत की पुत्री है
भाषा किसी भी राष्ट्र को महान बनाती है भाषा की गुलामी राष्ट्र को गुलाम बना देती है। किसी भी राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने के लिए उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। भारत की जो राष्ट्रीय भाषा हिंदी है। अगर भारत को समृद्धशाली, संस्कारवान बनाना है तो राष्ट्रभाषा हिंदी को लाना होगा। कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि देश को जब आजाद समझूंगा कि पूरे देश में हमारे बच्चे हर प्रकार की उन्नति अपनी भाषा में करें। हिंदी वैज्ञानिक भाषा है जो संस्कृत की पुत्री के रूप में हम देखते हैं। - पं. विपिन बिहारी आर्य, प्रधान जिला आर्य प्रतिनिधि सभा मथुरा
किसी भी देश और राष्ट्र की पहचान वहां की भाषा से ही होती है। भारत सदियों से वैदिक सनातन संस्कृति का संवाहक रहा है। यहां की मुख्य भाषा हिंदी है। यहां ऋषि मुनियों, विद्वानों, आचार्यों, लेखक, कवियों ने हिंदी भाषा को अपनाकर न केवल हिंदी को सम्मानित किया अपितु इसे एक पहचान दी। देश भाषियों के बीच संपर्क की भाषा बनाया। वर्तमान में अपने स्वरूप को बचाने को लगी है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल देेश में राष्ट्र भाषा को 14 सितंबर को दिवस के रूप में याद किया जाता है। - देवेंद्र शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता
हिंदी वैज्ञानिक भाषा और संस्कृत की पुत्री है
भाषा किसी भी राष्ट्र को महान बनाती है भाषा की गुलामी राष्ट्र को गुलाम बना देती है। किसी भी राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने के लिए उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। भारत की जो राष्ट्रीय भाषा हिंदी है। अगर भारत को समृद्धशाली, संस्कारवान बनाना है तो राष्ट्रभाषा हिंदी को लाना होगा। कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि देश को जब आजाद समझूंगा कि पूरे देश में हमारे बच्चे हर प्रकार की उन्नति अपनी भाषा में करें। हिंदी वैज्ञानिक भाषा है जो संस्कृत की पुत्री के रूप में हम देखते हैं। - पं. विपिन बिहारी आर्य, प्रधान जिला आर्य प्रतिनिधि सभा मथुरा