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नवरात्र के आठवें दिन हुई मां कालरात्रि की पूजा
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
Updated Sat, 08 Oct 2016 10:54 PM IST
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नवरात्र के आठवें दिन हुई मां कालरात्रि की पूजा
- फोटो : अमर उजाला
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शनिवार को शहर के मां शीतला माता मंदिर, दुर्गा मंदिर सहित सभी मंदिरों में मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की गई। इसमें श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर मां से मनौतियां मांगी। पुजारी गीतम दास ने कहा कि मां कालरात्रि का पूजन करने से भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। बन खंडेश्वरनाथ, मंदिर झार खंडेश्वरनाथ, मंदिर महाराज जी बाबा, मंदिर श्यामादेवी, मंदिर गेमी महाराज सहित सभी मंदिरों पर श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की। वहीं जीटीरोड स्थित मंदिर बनखंडेश्वर परिसर, मोहल्ला कानूनगोयान में माली वाली गली में सुबह हवन-यज्ञ शाम को महा आरती के साथ धार्मिक अनुष्ठान आयोजित हो रहे हैं।
नगर के निकटवर्ती ग्राम पड़रिया के प्राचीन काली देवी का मंदिर का विशेष महत्व है। करीब 350 साल पुराने काली देवी के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां नवरात्र के दौरान मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
पड़रिया का काली देवी मंदिर जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में शुमार किया जाता है। बुजुर्गो के अनुसार गांव के श्रद्धालु बटेश्वर में यमुना स्नान और भगवान की शिव की पूजा अर्चना के लिए जाते थे। वहां से लौटते समय श्रद्धालुओं की बैलगाड़ी किसी पत्थर की शिला से अटक कर रुक गई। ग्रामीणों ने उतर कर देखा तो काली देवी की प्रतिमा थी। ग्रामीण प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर गांव ले आए और गांव के बाहर प्रतिमा को विधिविधान के साथ स्थापित करा दिया। ग्रामीणों ने धन को एकत्रित कर मंदिर का निर्माण कर नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन शुरू हो गया। पड़ोसी जिले के श्रदालु भी नवरात्र के दौरान पूजा अर्चना करने के लिए आते थे। मंदिर के जर्जर होने पर 30 वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने की मरम्मत कराया और मां काली का भव्य मंदिर बनवा दिया। नवरात्र के पहले दिन से ही मां काली की पूजा के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो जाती है।
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नगर के निकटवर्ती ग्राम पड़रिया के प्राचीन काली देवी का मंदिर का विशेष महत्व है। करीब 350 साल पुराने काली देवी के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां नवरात्र के दौरान मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
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पड़रिया का काली देवी मंदिर जिले के प्रमुख देवी मंदिरों में शुमार किया जाता है। बुजुर्गो के अनुसार गांव के श्रद्धालु बटेश्वर में यमुना स्नान और भगवान की शिव की पूजा अर्चना के लिए जाते थे। वहां से लौटते समय श्रद्धालुओं की बैलगाड़ी किसी पत्थर की शिला से अटक कर रुक गई। ग्रामीणों ने उतर कर देखा तो काली देवी की प्रतिमा थी। ग्रामीण प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर गांव ले आए और गांव के बाहर प्रतिमा को विधिविधान के साथ स्थापित करा दिया। ग्रामीणों ने धन को एकत्रित कर मंदिर का निर्माण कर नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन शुरू हो गया। पड़ोसी जिले के श्रदालु भी नवरात्र के दौरान पूजा अर्चना करने के लिए आते थे। मंदिर के जर्जर होने पर 30 वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने की मरम्मत कराया और मां काली का भव्य मंदिर बनवा दिया। नवरात्र के पहले दिन से ही मां काली की पूजा के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो जाती है।
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