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विश्व दुग्ध दिवसः यूपी के इस गांव में हर घर में गाय-भैंस...फिर भी नहीं बेचा जाता दूध, वर्षों से इस बात का खाैफ
Sun, 01 Jun 2025 12:33 PM IST
अरुन पाराशर
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
Published by: अरुन पाराशर
Updated Sun, 01 Jun 2025 12:33 PM IST
सार
मैनपुरी के गांव अंजनी में किस्से हैं कि कुछ लोगों ने दूध बेचा तो उनके पशु बीमार हो गए। परिवार पर कोई न कोई आपदा आ गई। ऐसे में लोग दूध नहीं बेचते हैं।
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अंजनी गांव।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
मैनपुरी जिले में एक अनोखा गांव है अंजनी, यहां हर घर में गाय-भैंस पाली जाती हैं, लेकिन दूध की बिक्री नहीं की जाती। किंवदंती है कि अगर किसी ने दूध बेचा तो उस पर कोई बड़ी आपदा आ जाएगी। फरमान है कि जिसने भी दूध बेचा, उसका हुक्का पानी बंद कर दिया जाएगा।
शहर मुख्यालय से पांच किमी दूर मैनपुरी-कुरावली रोड स्थित अंजनी गांव में लगभग 8000 की आबादी हैं। गांव में 4000 से अधिक गाय और भैंस पाली जाती हैं। लगभग हर घर में दूध देने वाले पशु हैं और दूध का उत्पादन भी खूब होता है। मगर गांव के लोग आज भी दूध नहीं बेचते।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्वजों ने करीब 300 साल पहले यह शपथ ली थी। गांव में किस्से हैं कि कुछ लोगों ने दूध बेचा तो उनके पशु बीमार हो गए। परिवार पर कोई न कोई आपदा आई। गांव में दूध की बिक्री न होने के कारण आस-पास के गांव या शहर के लोग जरूरत पड़ने पर यहां से छाछ (मट्ठा) ले जाते हैं।
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शहर मुख्यालय से पांच किमी दूर मैनपुरी-कुरावली रोड स्थित अंजनी गांव में लगभग 8000 की आबादी हैं। गांव में 4000 से अधिक गाय और भैंस पाली जाती हैं। लगभग हर घर में दूध देने वाले पशु हैं और दूध का उत्पादन भी खूब होता है। मगर गांव के लोग आज भी दूध नहीं बेचते।
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गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्वजों ने करीब 300 साल पहले यह शपथ ली थी। गांव में किस्से हैं कि कुछ लोगों ने दूध बेचा तो उनके पशु बीमार हो गए। परिवार पर कोई न कोई आपदा आई। गांव में दूध की बिक्री न होने के कारण आस-पास के गांव या शहर के लोग जरूरत पड़ने पर यहां से छाछ (मट्ठा) ले जाते हैं।
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दूध और पूत बिकते नहीं हैं...
गांव के लोगों का कहना है कि वैसे तो उन्हें सटीक तौर पर यह नहीं पता कि उनके किन पूर्वजों ने कब शपथ ली थी। मगर, उन्होंने बचपन से यही सुना है कि दूध और पूत (बेटा) बिकते नहीं हैं। अपने बड़ों से सुनी इस परंपरा पर इसलिए आज भी अडिग हैं। गांव के सेवक राम कहते हैं, हमारा धर्म कहता है कि दूध और पूत बेचे नहीं जाते। इसी उद्देश्य से हमारे गांव के लोग दूध नहीं बेचते। हम अपनी परंपरा पर अडिग हैं। गांव के सियाराम का मानना है, ग्रामीण अंचल में बच्चों के लिए दूध ही सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए यह अच्छा भी है कि गांव में दूध न बेचा जाए। आज तक हमारे गांव में दूध नहीं बेचा गया।
सोनू यादव बताते हैं, हमारे पूर्वजों का संदेश है कि चाहे कुछ भी कर लेना लेकिन दूध बेचने की कोशिश मत करना। हम अपने पूर्वजों के संदेश को निभाने का काम कर रहे हैं। लालू यादव जैसे युवा भी इस परंपरा के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनका कहना है, गांव के सभी लोगों ने वर्षों पहले दूध न बेचने की शपथ ली थी। हम युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि हम अपने पूर्वजों की उस शपथ को न टूटने दें।
फौजियों के गांव के नाम से है मशहूर
अंजनी गांव की पहचान फौजियों के गांव से भी है। इस गांव में सर्व जाति के लोग रहते हैं। जवानों को फौजी और पुलिस की नौकरी के बाद खेती का यहां मुख्य पेशा है।
गांव के लोगों का कहना है कि वैसे तो उन्हें सटीक तौर पर यह नहीं पता कि उनके किन पूर्वजों ने कब शपथ ली थी। मगर, उन्होंने बचपन से यही सुना है कि दूध और पूत (बेटा) बिकते नहीं हैं। अपने बड़ों से सुनी इस परंपरा पर इसलिए आज भी अडिग हैं। गांव के सेवक राम कहते हैं, हमारा धर्म कहता है कि दूध और पूत बेचे नहीं जाते। इसी उद्देश्य से हमारे गांव के लोग दूध नहीं बेचते। हम अपनी परंपरा पर अडिग हैं। गांव के सियाराम का मानना है, ग्रामीण अंचल में बच्चों के लिए दूध ही सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए यह अच्छा भी है कि गांव में दूध न बेचा जाए। आज तक हमारे गांव में दूध नहीं बेचा गया।
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सोनू यादव बताते हैं, हमारे पूर्वजों का संदेश है कि चाहे कुछ भी कर लेना लेकिन दूध बेचने की कोशिश मत करना। हम अपने पूर्वजों के संदेश को निभाने का काम कर रहे हैं। लालू यादव जैसे युवा भी इस परंपरा के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनका कहना है, गांव के सभी लोगों ने वर्षों पहले दूध न बेचने की शपथ ली थी। हम युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि हम अपने पूर्वजों की उस शपथ को न टूटने दें।
फौजियों के गांव के नाम से है मशहूर
अंजनी गांव की पहचान फौजियों के गांव से भी है। इस गांव में सर्व जाति के लोग रहते हैं। जवानों को फौजी और पुलिस की नौकरी के बाद खेती का यहां मुख्य पेशा है।