फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Mainpuri News ›   Mainpuri Basmati rice needs GI tag for export

UP: धान किसान फिर भी निराश...300 करोड़ का निर्यात, ईरान से लेकर कतर तक महकता है इस जिले का बासमती चावल

Mon, 02 Jun 2025 12:17 PM IST
अरुन पाराशर अबरार अहमद, अमर उजाला, मैनपुरी
अबरार अहमद, अमर उजाला, मैनपुरी Published by: अरुन पाराशर Updated Mon, 02 Jun 2025 12:17 PM IST
सार

मैनपुरी के चावल की मांग मुख्य रूप से ईरान, इराक, सऊदी अरब, कतर और दुबई में है। मगर इन देशों के व्यापारी सीधे मैनपुरी की कंपनियों से चावल खरीद नहीं करते।

विज्ञापन
Mainpuri Basmati rice needs GI tag for export
राइस मिल। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

धान का कटोरा कहलाने वाला मैनपुरी उत्तर प्रदेश के उन चंद जिलों में शामिल है, जहां बासमती चावल का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। किसान भी बासमती की खेती का रकबा हर साल बढ़ा रहे हैं, लेकिन सरकार की अनदेखी से किसानों को वह लाभ नहीं मिल रहा, जो मिलना चाहिए। जीआई टैग नहीं मिलने से मैनपुरी के बासमती की खुशबू सिमट कर रह गई है। इससे राइस मिल संचालक भी खुश नहीं हैं।
विज्ञापन


 

100 बीघा में धान की खेती करने वाले दन्नाहार क्षेत्र के गांव नौनेर के किसान वीरेश चौहान कहते हैं, अब तक जीआई टैग मिला है न सुविधाएं। मंडी में बासमती का उचित दाम तक नहीं मिल रहा। ऐसे में दूसरे राज्यों में जाकर फसल बेचनी पड़ती है। दिल्ली के नरेला व हरियाणा के चरखी दादरी मंडी में बासमती धान यहां के मुकाबले प्रति क्विंटल 400 से 500 रुपये ज्यादा में बिकता है। वह कहते हैं, जब सरकार मोटा धान खरीद रही है तो बासमती भी खरीदे। यहां किसानों के लिए प्रशिक्षण केंद्र तक नहीं है। अच्छी गुणवत्ता वाले बीज का भी अभाव है। पूसा अनुसंधान केंद्र, दिल्ली जाकर बासमती का बीज खरीदना पड़ता है।

 
विज्ञापन
विज्ञापन

चावल मिल संतलाल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के सह संचालक अनिल अग्रवाल कहते हैं, जिले में बासमती धान की खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ा है, आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। जिले में वर्ष 2023 में 65.101 हेक्टेयर और 2024 में 66.927 हेक्टेयर में धान की खेती हुई, लेकिन निर्यात में गिरावट आई है। इसके कई कारण हैं, सबसे प्रमुख कारण चावल में कीटनाशक की मात्रा की जांच के लिए कोई लैब का न होना है। लाल सागर में हूती विद्रोहियों का आतंक, अरब देशों का बासमती उगाने वाले मुस्लिम देशों के प्रति नर्म रुख समेत अन्य वजहें भी हैं। बंपर बासमती पैदा करने के बाद भी जिले को जीआई टैग नहीं मिलने से मैनपुरी के बासमती चावल को पहचान नहीं मिल रही।

ये भी पढ़ें-UP: आंखें फोड़ीं, प्राइवेट पार्ट काटा...इसलिए दो दोस्तों ने 11 वर्षीय बालक को मार डाला, पुलिस भी रह गई सन्न
विज्ञापन

अधिकांश चावल मिलों पर लग गए ताले
करीब दो दशक पहले जिले में 47 चावल मिलें थीं, लेकिन सरकार और संबंधितों की उदासीनता के चलते अधिकांश पर ताले लग गए और संचालकों ने दूसरे व्यापार की ओर रुख कर लिया। अब जिले में केवल 7 मिलें बची हैं। मिलें बंद होने से बेरोजगारी भी बढ़ी है। चावल मिल संचालक अशोक गोयल कहते हैं सरकार की नीतियों के कारण मिलें बंद हो गईं और बेरोजगारी बढ़ी। जिले की उद्योग शून्यता समाप्त करने के लिए किसी सरकार ने कोई पहल नहीं की।

लंबा दाना और सुगंध है मैनपुरी के बासमती की पहचान
गुणवत्ता, सुगंध और लंबे दाने के चलते मैनपुरी के बासमती चावल की मांग रहती है। खासतौर पर बासमती की वैरायटी 1121 बासमती, पूसा बासमती, सुगंधा बासमती, शरबती बासमती यहां की पहचान है।

 

300 करोड़ का सालाना निर्यात, पर सीधे नहीं
मैनपुरी के चावल की मांग मुख्य रूप से ईरान, इराक, सऊदी अरब, कतर और दुबई में है। मगर इन देशों के व्यापारी सीधे मैनपुरी की कंपनियों से खरीद नहीं करते। कारण है, मैनपुरी के बासमती को जीआई टैग नहीं मिला है। इसके अलावा यहां निर्यातक संघ विकसित करने की कोशिश सरकार ने नहीं की। ऐसे में दिल्ली, एनसीआर के बड़े निर्यातकों के जरिए मैनपुरी का बासमती चावल दूसरे देशों में निर्यात किया जाता है।

 

कीटनाशक अवशेषों की मात्रा जांचने के लिए लैब तक नहीं
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बासमती चावल में कीटनाशक अवशेषों की मात्रा पर कड़े नियम हैं। अगर किसान अत्यधिक या प्रतिबंधित कीटनाशकों का उपयोग करते हैं तो उनके धान को निर्यात के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है। लगातार मांग की जा रही है कि कीटनाशक की मात्रा की जांच के लिए जिले में लैब स्थापित की जाए मगर सरकार ध्यान नहीं दे रही। चावल मिल संचालक अपीडा के स्थानीय कार्यालय की भी मांग कर रहे हैं, उस पर भी सुनवाई नहीं हो रही। किसानों के लिए चावल भंडारण की सुविधा भी नहीं है। चावल सीधे मिलों या निर्यातकों को बेचने तक की सुविधा किसानों के पास हीं है। इससे बिचौलियों को कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है।

 

आढ़तियों के सामने भी संकट
बाजार की अस्थिरता व कीमतों में उतार-चढ़ाव आढ़तियों के मार्जिन को प्रभावित करता है। अचानक कीमतें गिरने पर उन्हें नुकसान होता है। आढ़तियों को बड़ी मात्रा में धान का भंडारण करना पड़ता है। उचित भंडारण सुविधाओं के अभाव में या नमी के कारण गुणवत्ता में गिरावट का जोखिम रहता है, जिससे उन्हें नुकसान होता है।

जीआई टैग के लिए शासन में भेजी है रिपोर्ट
मैनपुरी के जिला कृषि अधिकारी डाॅ.सूर्य प्रताप सिकि ने बताया कि जीआई टैग बासमती चावल की पहचान और प्रामाणिकता के लिए जरूरी है। इसके लिए शासन को रिपोर्ट भेजी गई है। हालांकि इसका पूर्ण लाभ उठाने के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है। इसमें बेहतर कृषि पद्धतियों, आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रभावी ब्रांडिंग, और किसानों तथा आढ़तियों को सीधे निर्यात बाजारों से जोड़ने वाली नीतियों को बढ़ावा देना शामिल है। जिला प्रशासन इसी दिशा में काम कर रहा है।

ये भी पढ़ें-UP: 500 रुपये के लिए गई युवक की जान...दोस्त ने वापस मांगा उधार, मारपीट में ऐसे हुई माैत; चाैंकाने वाला खुलासा



 

आंकड़ों पर एक नजर
7 राइस मिलें हैं जिले में संचालित
1 हजार करोड़ से अधिक का सालाना टर्नओवर
2 हजार टन प्रतिदिन चावल प्रोसेस की क्षमता
10 हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मिल रहा रोजगार

 

दो वर्ष की धान की खेती पर एक नजर
वर्ष            रकबा उत्पादन             प्रति हेक्टेयर  उत्पादन
2023  65.101 195.418 29.99

2024 66.927 210.552 31.46
(नोटः रकबा हेक्टेयर में और उत्पादन मीट्रिक टन में है।)
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed