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देवोत्थान आज, गूंजेंगी शहनाइयां

Thu, 09 Nov 2023 07:00 PM IST
Anonymous User ब्यूरो,अमर उजाला मैनपुरी
ब्यूरो,अमर उजाला मैनपुरी Published by: Anonymous User Updated Thu, 09 Nov 2023 07:00 PM IST
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Devotthan today, reverberate Conical oboes
मैनपुरी। देवोत्थान एकादशी को लेकर घर-घर तैयारियां की गईं। महिलाओं ने घरों में चौक और अल्पनाएं बनाने और पूजन-अर्चना के इंतजाम किए। रविवार को घर-घर देवों को जगाया जाएगा। सनातन मान्यता के अनुसार देवोत्थान के दिन से ही शादी-समारोह का सीजन शुरू हो जाता है। इस दिन शादियों की खासी धूम रहेगी। लोगों को भी जाम में फंसना पड़ सकता है।
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देवोत्थान की तैयारियों को लेकर लोगों ने शनिवार को गन्ने, सब्जियां और सिंघाड़े की खरीदारी की। देवोत्थान को देखते हुए नगर के स्टेशन रोड, पंजाबी कालोनी, मैनपुरी-घिरोर मार्ग, कचहरी रोड, घंटाघर चौराहा आदि स्थानों पर किसानों ने गन्ने रखकर बेचे। लोग ट्रालियों में लाकर गन्ने बेच रहे थे। देहात में भोगांव, किशनी, कुसमरा, कुरावली, करहल में भी एकादशी के लिए गन्ने और सिंघाड़े की जमकर खरीदारी हुई।
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आज निकलें संभल कर
देवोत्थान एकादशी पर जिले में लगभग 800 जोड़े परिणय सूत्र में बंधेंगे। इसके लिए सभी मैरिज होम बुक हो चुके हैं। देवोत्थान पर शादी समारोह की धूम के चलते बाजार और कुछ मार्गों पर भी जाम के हालात बनेंगे। जाम से बचने के लिए लोग संभलकर निकलें।
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पर्व के रूप में मनाई जाती है एकादशी
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी देवोत्थान, तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में मनाई जाती है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देव शयन करते हैं। कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए क्षीर सागर में विश्राम करने के लिए चले गए थे और देवोत्थान एकादशी के दिन ही निकले थे। ग्रामीण क्षेत्रों में तो देवोत्थान एकादशी एक पर्व के रूप में मनाई जाती है। ग्रामीणों के लिए इस पर्व का महत्व होली व दीपावली से कम नहीं है। इस दिन दीपावली की तरह घरों को दीयों से रोशन करने के अलावा आतिशबाजी भी की जाती है।

क्यों है महत्व
एकादशी से करीब चार माह पूर्व देव शयनि एकादशी आती है। उसके बाद से ही हिंदू परिवारों में शादी-विवाह व अन्य मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवता नींद में होते हैं। इस अंतराल में एक दो मौके को छोड़कर कोई शादी-विवाह नहीं होता। देवोत्थान एकादशी पर पूजा अर्चना के बाद देवताओं को जगाया जाता है। उसी के बाद से ग्रामीण शादी-विवाह, गृह प्रवेश, नए भवन व दुकान तथा वाहन इत्यादि की खरीदारी को शुभ मानते हैं।

कैसे मनाते हैं पर्व
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग शाम को घरों की साफ-सफाई करके तथा कच्चे घरों में गोबर से चौका लगाते हैं। घर में मुख्य द्वार पर सेलखड़ी व गेरु (महावर) से लक्ष्मी व नारायण भगवान के पैरों के चिन्ह अंकित करते हैं। उसके बाद परिवार के सभी सदस्यों के पैरों के चिन्ह भी बनाए जाते हैं। उनका मानना है कि इस दिन भगवान नींद से जागकर उनके घरों में प्रवेश करेंगे। मुख्य द्वार के दोनों तरफ लाल सेलखड़ी से भगवान नारायण की प्रतिमा बनाई जाती है। महिलाएं एकत्र होकर समूह में लोकगीत गाकर पूजा अर्चना करती हैं।


क्या आया बदलाव
पहले गांवों और शहरों में रहने वाले ग्रामीण ही इसे ज्यादा मानते थे, परंतु पिछले कुछ वर्षों में इसमें काफी बदलाव आया है। शहरों में रहने वाले लोग भी इसे मानने लगे हैं और अपने गृह प्रवेश व खरीदारी जैसे कार्य इन्हीं दिनों में करने लगे हैं। पहले बाजारों में ग्रामीणों की ही भीड़ ज्यादा नजर आती थी, अब पर्व पर शहर के लोग भी काफी संख्या में खरीदारी करते नजर आते हैं। इन दिनों में जेवरात, कपड़ों, वाहनों इत्यादि की बिक्री काफी बढ़ जाती है।
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