{"_id":"1-67956","slug":"Mainpuri-67956-1","type":"story","status":"publish","title_hn":"खेल शिक्षक न मैदान, कहां से आएं इरफान पठान ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खेल शिक्षक न मैदान, कहां से आएं इरफान पठान
Mainpuri
Updated Thu, 17 Oct 2013 05:37 AM IST
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मैनपुरी। जिले में पर्याप्त और सुविधाओं से युक्त खेल के मैदान न होने से नई प्रतिभाएं सामने नहीं आ पा रही हैं। वर्षों पूर्व गांवों में बनाए गए मिनी स्टेडियम भी गायब हो चुके हैं। इनकी जानकारी अधिकारी तो दूर ग्राम प्रधानों को भी नहीं है। उधर, कालेजों में भी खेल के मैदान कम हैं। जो हैं भी वह दयनीय हालत में हैं।
हाईस्कूल एवं इंटर में खेलकूद अनिवार्य विषय है। जिले के तमाम विद्यालयों में न तो खेल शिक्षक हैं और न ही खेल के मैदान हैं। विद्यालयों की खेल गतिविधियों पर नजर डाली जाए तो खेल के नाम पर हाथ खाली ही हैं। जिले में 300 से अधिक इंटर कालेज हैं। इनमें से कई में खेल के मैदान ही नहीं हैं। अधिकांश विद्यालयों में खेल शिक्षक की तैनाती नहीं है। इंटर कालेज के छात्र-छात्राएं यह भूलते जा रहे हैं कि कालेजों में पीटीआई भी होते हैं।
वालीबाल खिलाड़ी अमर पचौरी का कहना है कि एक दशक पूर्व कई विद्यालयों में पीटीआई थे। सेवानिवृत्त होने के बाद विद्यालयों में पीटीआई की नियुक्ति ही नहीं हुई है। पीटीआई की नियुक्ति न होने से विद्यालयों में खेलकूद प्रतियोगिताओं संचालन ही बंद हो गया है।
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खेलकूद प्रशिक्षक मनीषा चौहान का कहना है कि खेलकूद के नाम पर छात्र-छात्राओं से लिए जाने वाले शुल्क का प्रयोग कहां और कैसे होता है इसकी जानकारी अभिभावकों के मांगने पर कालेज प्रबंधन देना भी नहीं चाहता है।
वालीबाल संघ के सचिव राघवेंद्र दुबे कहते हैं कि जब जिले में पीटीआई ही नहीं होंगे तो बच्चों की प्रतिभा का निखार कैसे होगा। क्रिकेट जैसे खेल की चकाचौंध में ग्रामीण परिवेश से जुड़े लुप्त होते जा रहे है।
पूर्व फुटबाल खिलाड़ी संजोग मल्ल का कहना है कि वालीबाल, कबड्डी, फुटबाल जैसी प्रतियोगिताओं का आयोजन अब विशेष लोगों की पहल पर ही होते हैं। इन खेलों की गंभीरता से कालेज प्रबंधन पूरी तरह अंजान बने हुए हैं।
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सरकारी कालेजों में नहीं पीटीआई
गैर सरकारी कालेजों की बात तो दूर सरकारी कालेजों में भी पीटीआई नहीं हैं। देहात क्षेत्र के कालेज तो दूर की बात नगर क्षेत्र के कालेजों में ही पीटीआई नहीं हैं। नगर के पुराने डीएवी और चित्रगुप्त इंटर कालेज में पीटीआई ही नहीं हैं। जबकि एक दशक पूर्व इन विद्यालयों के कई छात्रों ने खेलकूद प्रतियोगिताओं में मंडल स्तर पर नाम रोशन किया था।
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हाईस्कूल एवं इंटर में खेलकूद अनिवार्य विषय है। जिले के तमाम विद्यालयों में न तो खेल शिक्षक हैं और न ही खेल के मैदान हैं। विद्यालयों की खेल गतिविधियों पर नजर डाली जाए तो खेल के नाम पर हाथ खाली ही हैं। जिले में 300 से अधिक इंटर कालेज हैं। इनमें से कई में खेल के मैदान ही नहीं हैं। अधिकांश विद्यालयों में खेल शिक्षक की तैनाती नहीं है। इंटर कालेज के छात्र-छात्राएं यह भूलते जा रहे हैं कि कालेजों में पीटीआई भी होते हैं।
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वालीबाल खिलाड़ी अमर पचौरी का कहना है कि एक दशक पूर्व कई विद्यालयों में पीटीआई थे। सेवानिवृत्त होने के बाद विद्यालयों में पीटीआई की नियुक्ति ही नहीं हुई है। पीटीआई की नियुक्ति न होने से विद्यालयों में खेलकूद प्रतियोगिताओं संचालन ही बंद हो गया है।
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खेलकूद प्रशिक्षक मनीषा चौहान का कहना है कि खेलकूद के नाम पर छात्र-छात्राओं से लिए जाने वाले शुल्क का प्रयोग कहां और कैसे होता है इसकी जानकारी अभिभावकों के मांगने पर कालेज प्रबंधन देना भी नहीं चाहता है।
वालीबाल संघ के सचिव राघवेंद्र दुबे कहते हैं कि जब जिले में पीटीआई ही नहीं होंगे तो बच्चों की प्रतिभा का निखार कैसे होगा। क्रिकेट जैसे खेल की चकाचौंध में ग्रामीण परिवेश से जुड़े लुप्त होते जा रहे है।
पूर्व फुटबाल खिलाड़ी संजोग मल्ल का कहना है कि वालीबाल, कबड्डी, फुटबाल जैसी प्रतियोगिताओं का आयोजन अब विशेष लोगों की पहल पर ही होते हैं। इन खेलों की गंभीरता से कालेज प्रबंधन पूरी तरह अंजान बने हुए हैं।
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सरकारी कालेजों में नहीं पीटीआई
गैर सरकारी कालेजों की बात तो दूर सरकारी कालेजों में भी पीटीआई नहीं हैं। देहात क्षेत्र के कालेज तो दूर की बात नगर क्षेत्र के कालेजों में ही पीटीआई नहीं हैं। नगर के पुराने डीएवी और चित्रगुप्त इंटर कालेज में पीटीआई ही नहीं हैं। जबकि एक दशक पूर्व इन विद्यालयों के कई छात्रों ने खेलकूद प्रतियोगिताओं में मंडल स्तर पर नाम रोशन किया था।