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‘जरा याद उन्हें भी कर लो जो लौट...’
Mainpuri
Updated Sun, 11 Aug 2013 05:33 AM IST
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मैनपुरी। देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए जान की बाजी लगा देने वाले शहीद अब सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर ही याद आते हैं। उनके परिवारीजन किस हाल में हैं इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। ऐसे ही शहीद सीताराम गुप्ता के पुत्र गुमनामी की जिंदगी जीते हुए दुनिया छोड़ गए, वहीं कुछ अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारीजन भी परेशानी में हैं। कई सेनानियों को तो आज की पीढ़ी जानती तक नहीं है।
14 अगस्त 1942 को बेवर में स्वतंत्रता के लिए उमड़े सैकड़ों लोगों के बीच थाने पर झंडा फहरा रहे सीताराम गुप्ता अंग्रेजी फौज की गोलीबारी में शहीद हो गए थे। उनके 70 वर्षीय पुत्र रामकिशन गुप्ता को न तो कभी किसी तरह की सरकारी सहायता मिली और न ही उनकी किसी ने सुध ली। आमदनी के नाम पर वर्ष 2005 से उन्हें वृद्धावस्था पेंशन के रूप में मात्र 150 रुपये प्रति माह मिलते थे। अविवाहित रामकिशन गुप्ता का 23 मई 2007 को निधन हो गया।
वहीं बेवर के ही दूसरे शहीद कृष्ण कुमार ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही शहादत पाई थी। अब उनके माता-पिता तो दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके भतीजे वेदप्रकाश मिश्रा को इस बात का मलाल है कि कृष्ण कुमार की प्रतिमा उनके पैतृक गांव बसुरा सुल्तानपुर में नहीं लगाई गई है। कृष्ण कुमार के चचेरे भाई मुरारी लाल मिश्रा, रवींद्र कुमार मिश्रा, सुरेंद्र कुमार मिश्रा कुरावली क्षेत्र के ग्राम बसुरा सुल्तानपुर में ही खेती बाड़ी कर जीवन यापन कर रहे हैं।
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नगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमानंद सोती भी शहीदों के प्रति शासन प्रशासन की उदासीनता से क्षुब्ध ही रहे। सोती को जिंदगी के अंतिम क्षणों तक मलाल रहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत नहीं बन सका। उनके निधन के बाद अब तक उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए स्मारक तक के लिए पहल नहीं की गई।
महाराजा तेज सिंह का किला उपेक्षा का शिकार
मैनपुरी। जिले के कई स्थान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के मूक गवाह हैं। यह बात अलग है कि उनकी न तो उचित देखभाल हो रही है और न ही युवा पीढ़ी ऐसे स्थलों के बारे में बहुत कुछ जानती है। मैनपुरी के महाराज तेज सिंह का किला अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध गाथा की गवाही देता नजर आता है। महाराजा तेज सिंह के नेतृत्व में लड़े गए युद्ध में अंग्रेजों को मैनपुरी छोड़कर भागना पड़ा और मैनपुरी राज्य 1857 के जून के अंतिम सप्ताह में स्वतंत्र हो गया। स्वतंत्र होने के चार माह बाद ही अलीगढ़, ग्वालियर और फतेहगढ़ से आईं अंग्रेजी फौजों ने आक्रमण किया तो राजा तेज सिंह को वहां से भागना पड़ा। गोलों से किले का क्षतिग्रस्त हिस्सा आज भी अंग्रेजी आक्रमण की याद दिलाता है। वर्तमान पीढ़ी को नहीं पता कि इसी किले से आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी। किले की देखभाल कर रहे अवनींद्र तोमर के अनुसार वह अपने स्तर से किले को संरक्षित करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।
आर्य समाज मंदिर में बनती थी रणनीति
नगर का आर्यसमाज मंदिर भी क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों की याद ताजा करता है। आर्यसमाज मंदिर में ही मिशन स्कूल में पढ़ने वाले क्रांतिकारी छात्र गुप्त रूप से बैठकें कर अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति तैयार करते थे।
ग्राम चंदीकरा में वर्ष 1897 में जन्मे सिद्ध गोपाल चतुर्वेदी ने मिशन स्कूल के छात्रों को संगठित कर एक क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया। यही क्रांतिकारी संगठन मैनपुरी के इतिहास में मैनपुरी षड्यंत्र के नाम से विख्यात हुआ। क्रांतिकारी संगठन और क्रांतिकारी संस्था मातृवेदी की गुप्त बैठकें आर्यसमाज मंदिर में ही हुआ करती थीं। स्टेशन रोड स्थित आर्यसमाज मंदिर आज भी जिले के सिद्धगोपाल चतुर्वेदी, शिवकृष्ण जैसे क्रांतिकारियों की याद दिलाता है। वहीं पं. रामप्रसाद विस्मिल, गेंदालाल दीक्षित, दम्मीलाल पांडेय, प्रताप सिंह राणा, कढ़ोरीलाल गुप्ता जैसे क्रांतिकारियों ने भी आर्यसमाज मंदिर में बैठकें की थीं। अब मंदिर के एक हिस्से में कंप्यूटर क्लास चल रही है। और दूसरे हिस्से में कभी-कभार आर्य समाज के कार्यक्रम होते हैं।
थाना भवन शहीदों की दे रहा मूक गवाही
बेवर का थाना भवन भी क्रांतिकारियों की बलिदान गाथा का मूक गवाह है। 14 अगस्त 1942 को क्रांतिकारियों ने इसी थाना भवन पर तिरंगा फहराकर बेवर को एक दिन के लिए अंग्रेजों की दासता से मुक्त करा लिया था। एक दिन बाद 15 अगस्त को इसी थाने में अंग्रेज सैनिकों ने क्रांतिकारियों पर फायरिंग की थी। जिसमें छात्र कृष्ण कुमार के अलावा जमुना प्रसाद त्रिपाठी और सीताराम गुप्ता शहीद हो गए थे और करीब आधा दर्जन क्रांतिकारी घायल हो गए थे। जर्जर हाल में पहुंचा थाना भवन कभी भी धराशाई हो सकता है। पुलिस विभाग ने समीप ही नए भवन का निर्माण कराकर थाना उसमें स्थानांतरित करा लिया है। बेवर की नई पीढ़ी भी नहीं जानती कि कभी इसी थाना भवन पर बेवर के क्रांतिकारियों ने भारत का झंडा फहराया था।
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14 अगस्त 1942 को बेवर में स्वतंत्रता के लिए उमड़े सैकड़ों लोगों के बीच थाने पर झंडा फहरा रहे सीताराम गुप्ता अंग्रेजी फौज की गोलीबारी में शहीद हो गए थे। उनके 70 वर्षीय पुत्र रामकिशन गुप्ता को न तो कभी किसी तरह की सरकारी सहायता मिली और न ही उनकी किसी ने सुध ली। आमदनी के नाम पर वर्ष 2005 से उन्हें वृद्धावस्था पेंशन के रूप में मात्र 150 रुपये प्रति माह मिलते थे। अविवाहित रामकिशन गुप्ता का 23 मई 2007 को निधन हो गया।
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वहीं बेवर के ही दूसरे शहीद कृष्ण कुमार ने मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही शहादत पाई थी। अब उनके माता-पिता तो दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके भतीजे वेदप्रकाश मिश्रा को इस बात का मलाल है कि कृष्ण कुमार की प्रतिमा उनके पैतृक गांव बसुरा सुल्तानपुर में नहीं लगाई गई है। कृष्ण कुमार के चचेरे भाई मुरारी लाल मिश्रा, रवींद्र कुमार मिश्रा, सुरेंद्र कुमार मिश्रा कुरावली क्षेत्र के ग्राम बसुरा सुल्तानपुर में ही खेती बाड़ी कर जीवन यापन कर रहे हैं।
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नगर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परमानंद सोती भी शहीदों के प्रति शासन प्रशासन की उदासीनता से क्षुब्ध ही रहे। सोती को जिंदगी के अंतिम क्षणों तक मलाल रहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत नहीं बन सका। उनके निधन के बाद अब तक उनकी स्मृति को ताजा रखने के लिए स्मारक तक के लिए पहल नहीं की गई।
महाराजा तेज सिंह का किला उपेक्षा का शिकार
मैनपुरी। जिले के कई स्थान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के मूक गवाह हैं। यह बात अलग है कि उनकी न तो उचित देखभाल हो रही है और न ही युवा पीढ़ी ऐसे स्थलों के बारे में बहुत कुछ जानती है। मैनपुरी के महाराज तेज सिंह का किला अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध गाथा की गवाही देता नजर आता है। महाराजा तेज सिंह के नेतृत्व में लड़े गए युद्ध में अंग्रेजों को मैनपुरी छोड़कर भागना पड़ा और मैनपुरी राज्य 1857 के जून के अंतिम सप्ताह में स्वतंत्र हो गया। स्वतंत्र होने के चार माह बाद ही अलीगढ़, ग्वालियर और फतेहगढ़ से आईं अंग्रेजी फौजों ने आक्रमण किया तो राजा तेज सिंह को वहां से भागना पड़ा। गोलों से किले का क्षतिग्रस्त हिस्सा आज भी अंग्रेजी आक्रमण की याद दिलाता है। वर्तमान पीढ़ी को नहीं पता कि इसी किले से आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी। किले की देखभाल कर रहे अवनींद्र तोमर के अनुसार वह अपने स्तर से किले को संरक्षित करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।
आर्य समाज मंदिर में बनती थी रणनीति
नगर का आर्यसमाज मंदिर भी क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों की याद ताजा करता है। आर्यसमाज मंदिर में ही मिशन स्कूल में पढ़ने वाले क्रांतिकारी छात्र गुप्त रूप से बैठकें कर अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति तैयार करते थे।
ग्राम चंदीकरा में वर्ष 1897 में जन्मे सिद्ध गोपाल चतुर्वेदी ने मिशन स्कूल के छात्रों को संगठित कर एक क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया। यही क्रांतिकारी संगठन मैनपुरी के इतिहास में मैनपुरी षड्यंत्र के नाम से विख्यात हुआ। क्रांतिकारी संगठन और क्रांतिकारी संस्था मातृवेदी की गुप्त बैठकें आर्यसमाज मंदिर में ही हुआ करती थीं। स्टेशन रोड स्थित आर्यसमाज मंदिर आज भी जिले के सिद्धगोपाल चतुर्वेदी, शिवकृष्ण जैसे क्रांतिकारियों की याद दिलाता है। वहीं पं. रामप्रसाद विस्मिल, गेंदालाल दीक्षित, दम्मीलाल पांडेय, प्रताप सिंह राणा, कढ़ोरीलाल गुप्ता जैसे क्रांतिकारियों ने भी आर्यसमाज मंदिर में बैठकें की थीं। अब मंदिर के एक हिस्से में कंप्यूटर क्लास चल रही है। और दूसरे हिस्से में कभी-कभार आर्य समाज के कार्यक्रम होते हैं।
थाना भवन शहीदों की दे रहा मूक गवाही
बेवर का थाना भवन भी क्रांतिकारियों की बलिदान गाथा का मूक गवाह है। 14 अगस्त 1942 को क्रांतिकारियों ने इसी थाना भवन पर तिरंगा फहराकर बेवर को एक दिन के लिए अंग्रेजों की दासता से मुक्त करा लिया था। एक दिन बाद 15 अगस्त को इसी थाने में अंग्रेज सैनिकों ने क्रांतिकारियों पर फायरिंग की थी। जिसमें छात्र कृष्ण कुमार के अलावा जमुना प्रसाद त्रिपाठी और सीताराम गुप्ता शहीद हो गए थे और करीब आधा दर्जन क्रांतिकारी घायल हो गए थे। जर्जर हाल में पहुंचा थाना भवन कभी भी धराशाई हो सकता है। पुलिस विभाग ने समीप ही नए भवन का निर्माण कराकर थाना उसमें स्थानांतरित करा लिया है। बेवर की नई पीढ़ी भी नहीं जानती कि कभी इसी थाना भवन पर बेवर के क्रांतिकारियों ने भारत का झंडा फहराया था।