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बुंदेलों के शौर्य और वीरता की याद दिलाता है ऐतिहासिक कजली मेला
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इस कीरत सागर तट में कजलियों का होगा विसर्जन
- फोटो : MAHOBA
महोबा। उत्तर भारत के मशहूर कजली मेले की शुरुआत सन् 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान से हुए भीषण युद्घ में विजय मिलने के बाद हुई थी। आल्हा-ऊदल के पराक्रम से जुड़ा महोबा का ऐतिहासिक कजली मेला लोगों को त्याग और बलिदान की याद दिलाता है। बुंदेलों के शौर्य और पराक्रम के साथ मातृभूमि से प्रेम की अनूठी मिशाल संजोए कजली मेले पर लगातार दूसरे वर्ष भी कोरोना का ग्रहण लग गया है। जिसके तहत 23 अगस्त से सात दिन तक चलने वाले कजली मेला स्थगित कर दिया गया है। सोमवार को कीरत सागर में कजली विसर्जित कर रस्म अदायगी की जाएगी।
सन् 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में रक्षाबंधन के दिन उस समय चढ़ाई कर दी थी। जब रानी चंद्रावल अपनी सखियों के साथ भुजरियों का विसर्जन करने कीरत सागर तट जा रही थी। चंदेल राजा परमाल व दिल्ली नरेश की सेना के बीच भीषण युद्घ हुआ था। राजा परमाल ने वीर आल्हा-ऊदल की मदद से पृथ्वीराज चौहान की सेना को खदेड़ दिया था। इसी विजय के उपलक्ष्य में कीरत सागर तट पर विजय उत्सव मनाया गया था। तब से अनवरत कजली मेले का आयोजन होता चला आ रहा है।
बीते दो वर्ष से कोरोना संक्रमण के चलते बुंदेलों की शौर्य और वीरता का प्रतीक कजली मेला स्थगित है। इस मेले में विभिन्न जनपदों से लाखों की संख्या में मेलाप्रेमियों की भीड़ जुटती थी। दिनरात सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते थे। रक्षाबंधन के दूसरे दिन शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती थी लेकिन मेले में कोरोना का ग्रहण लगने से कजली विसर्जित कर रस्म अदायगी की जाएगी।
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मेला न होने से कलाकारों में भी मायूसी
लगातार दूसरे वर्ष मेला स्थगित होने से स्थानीय व दूर-दराज से आने वाले कलाकारों में मायूसी है। आल्हा गायक वंश गोपाल यादव, प्रतीक्षा यादव, दीक्षा यादव आदि ने बताया कि मेले में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता था। आल्हा गायन के माध्यम से लोग आल्हा-ऊदल की वीरता व इतिहास को जानते थे लेकिन दो वर्ष से कहीं भी आयोजन न होने से वह घर बैठने को मजबूर हैं।
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सन् 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में रक्षाबंधन के दिन उस समय चढ़ाई कर दी थी। जब रानी चंद्रावल अपनी सखियों के साथ भुजरियों का विसर्जन करने कीरत सागर तट जा रही थी। चंदेल राजा परमाल व दिल्ली नरेश की सेना के बीच भीषण युद्घ हुआ था। राजा परमाल ने वीर आल्हा-ऊदल की मदद से पृथ्वीराज चौहान की सेना को खदेड़ दिया था। इसी विजय के उपलक्ष्य में कीरत सागर तट पर विजय उत्सव मनाया गया था। तब से अनवरत कजली मेले का आयोजन होता चला आ रहा है।
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बीते दो वर्ष से कोरोना संक्रमण के चलते बुंदेलों की शौर्य और वीरता का प्रतीक कजली मेला स्थगित है। इस मेले में विभिन्न जनपदों से लाखों की संख्या में मेलाप्रेमियों की भीड़ जुटती थी। दिनरात सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते थे। रक्षाबंधन के दूसरे दिन शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती थी लेकिन मेले में कोरोना का ग्रहण लगने से कजली विसर्जित कर रस्म अदायगी की जाएगी।
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मेला न होने से कलाकारों में भी मायूसी
लगातार दूसरे वर्ष मेला स्थगित होने से स्थानीय व दूर-दराज से आने वाले कलाकारों में मायूसी है। आल्हा गायक वंश गोपाल यादव, प्रतीक्षा यादव, दीक्षा यादव आदि ने बताया कि मेले में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता था। आल्हा गायन के माध्यम से लोग आल्हा-ऊदल की वीरता व इतिहास को जानते थे लेकिन दो वर्ष से कहीं भी आयोजन न होने से वह घर बैठने को मजबूर हैं।