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‘तमन्ना क्या करें उसकी जो अब पराया है’
अमर उजाला ब्यूरो, महोबा
Updated Sun, 04 Sep 2016 11:11 PM IST
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शायर कामिल महोबी
- फोटो : अमर उजाला
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शहर के मशहूर शायर कामिल महोबी का शनिवार को निधन हो गया। नातिया शायर के लिए जाने जाने वाले शायर कामिल ने कई प्रांतों में महोबा का नाम रोशन किया है। ‘तमन्ना क्या करें उसकी जो अब पराया है, कहां नसीब में उन गेसुओं का साया है। हमारा शीश-ए-दिल टूट गया, किसी तरफ से तो पत्थर जरूर आया है’। यह गजल उनकी आज भी लोग गुनगुनाते हैं।
77 साल के शायर कामिल ने शनिवार की रात को अंतिम सांस ली। वह काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। महोबा में 1939 में पैदा हुए कामिल महोबी को बचपन से ही शायरी का शौक था। 19 वर्ष की उम्र में पीएसी में नौकरी मिलने के बाद शायरी से दूर हो गए। मुशायरा कार्यक्रम भी छूटने लगे। लेकिन, इससे आहत होकर उन्होंने पीएसी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और
फिर शायरी करने लगे। गजल, नातिया और कलाम पेश करने में मिलने वाले पैसे से वह अपना परिवार चलाते थे। शायर कामिल ने हक बनारसी साहब को उस्ताद बनाया था। शहर में शायरों की खासी संख्या होने के कारण हर रोज गोष्ठी होती थी। जहां पर शायर अपनी शायरी के जरिए अपना रियाज करते रहते थे। उन्होंने 1957 में पहले मुशायरे में शायरी पड़ी थी। इसके बाद कामिल महोबी की लोकप्रियता बढ़ी गई। उन्हें आल इंडिया मुशायरों में भी गजलें पढ़ने का मौका मिला।
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77 साल के शायर कामिल ने शनिवार की रात को अंतिम सांस ली। वह काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। महोबा में 1939 में पैदा हुए कामिल महोबी को बचपन से ही शायरी का शौक था। 19 वर्ष की उम्र में पीएसी में नौकरी मिलने के बाद शायरी से दूर हो गए। मुशायरा कार्यक्रम भी छूटने लगे। लेकिन, इससे आहत होकर उन्होंने पीएसी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और
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फिर शायरी करने लगे। गजल, नातिया और कलाम पेश करने में मिलने वाले पैसे से वह अपना परिवार चलाते थे। शायर कामिल ने हक बनारसी साहब को उस्ताद बनाया था। शहर में शायरों की खासी संख्या होने के कारण हर रोज गोष्ठी होती थी। जहां पर शायर अपनी शायरी के जरिए अपना रियाज करते रहते थे। उन्होंने 1957 में पहले मुशायरे में शायरी पड़ी थी। इसके बाद कामिल महोबी की लोकप्रियता बढ़ी गई। उन्हें आल इंडिया मुशायरों में भी गजलें पढ़ने का मौका मिला।
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