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हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन
अमर उजाला ब्यूरो, महोबा
Updated Sat, 08 Oct 2016 10:55 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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1362 साल पहले 61 हिजरी में कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 हमराहियों की शहादत को मोहर्रम में याद किया जाता है। इमाम हुसैन की शहादत की याद करके लोगाें की आंखें डबडबा जाती हैं। पैगंबर ए इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन का नाम इस्लाम की तवारीख में हमेशा याद किया जाता रहेगा। हजरत इमाम हुसैन ने मैदान ए कर्बला में सच्चाई और दीन के खातिर अपना सिर दे दिया लेकिन यजीद से बैत नहीं की। तब यजीद ने मक्का के गवर्नर को लिखा कि अगर हजरत इमाम बैत से इनकार करें तो उनका सर कलम कर दिया जाए। हजरत इमाम आली मकाम के साथ 72 लोग जिसमें मर्द, औरतें, बूढ़े, जवान और बच्चे शामिल थे कूफे की तरफ चल दिए। मोहर्रम की दूसरी तारीख को यजीद की फौज ने इन सभी को दरिया फरहाद से दूर रखने पर मजबूर कर दिया था। हजरत ने फरमाया हम जंग करने नहीं आए बल्कि तबलीग दीन के खातिर आए हैं लेकिन यजीद की फौज नहीं मानी और हजरत इमाम हुसैन का काफिला तीन दिन चलने के बाद एक मुकाम पर पहुंचा। यहां लगे दरख्त की शाख तोड़ी जिसमें खून निकला। हजरत इमाम ने फरमाया यह मकाम नैनवाह इसे लोग आज के बाद कर्बला कहेंगे। यह बात मोहम्मद साहब ने इमाम हुसैन को पहले बता दी थी। यह शहर इराक में हैं। मोहर्रम की सात तारीख तक समझौते की बात चलती रही। आठ तारीख को जंग शुरू हो गई। सबसे पहले हजरत हुर्र ने शहादत दी। मोहर्रम की 10 वीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन को शहीद कर दिया।
कर्बला की जंग है याद
कर्बला की जंग को इंसानियत का परचम फहराने वाला कहा जाता है। आसमान और जमीन और जो कुछ उनके दरम्यान है, बातिल नहीं पैदा किए हैं, इसी से बात साफ हो जाती है कि यदि बातिल सिर उठाए तो उसे मिटा देना। न सिर्फ तख्लीक ए कयानत के फितरी तकाजों के मुताबिक होगा, बल्कि इंसानियत के लिए भी जरूरी है इसलिए बुराई का अंत करने के लिए हमेशा से जद्दोजहद रही है।
हजरत इमाम हुसैन के भाई
हसन बिन अली, अब्बास बिन अली, जाफिर बिन अली, अब्दुल्ला बिन अली, मोहम्मद बिन अली, अबुबक्र बिन अली शामिल हैं। जिन्होेंने जंगे शहादत में सच्चाई के लिए इमाम हुसैन का साथ दिया।
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इमाम हुसैन के बेटे, भतीजे
अली अकबर, अली असगर, अबुबक्र, कासिम, अब्दुल्ला औन बिन, बिन जाफर, बिन अबू तालिब, मोहम्मद बिन अब्दुल्ला ने भी कर्बला के मैदान में शहादत दी। इनकी शहादत आज भी याद की जाती है।
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कर्बला की जंग है याद
कर्बला की जंग को इंसानियत का परचम फहराने वाला कहा जाता है। आसमान और जमीन और जो कुछ उनके दरम्यान है, बातिल नहीं पैदा किए हैं, इसी से बात साफ हो जाती है कि यदि बातिल सिर उठाए तो उसे मिटा देना। न सिर्फ तख्लीक ए कयानत के फितरी तकाजों के मुताबिक होगा, बल्कि इंसानियत के लिए भी जरूरी है इसलिए बुराई का अंत करने के लिए हमेशा से जद्दोजहद रही है।
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हजरत इमाम हुसैन के भाई
हसन बिन अली, अब्बास बिन अली, जाफिर बिन अली, अब्दुल्ला बिन अली, मोहम्मद बिन अली, अबुबक्र बिन अली शामिल हैं। जिन्होेंने जंगे शहादत में सच्चाई के लिए इमाम हुसैन का साथ दिया।
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इमाम हुसैन के बेटे, भतीजे
अली अकबर, अली असगर, अबुबक्र, कासिम, अब्दुल्ला औन बिन, बिन जाफर, बिन अबू तालिब, मोहम्मद बिन अब्दुल्ला ने भी कर्बला के मैदान में शहादत दी। इनकी शहादत आज भी याद की जाती है।