{"_id":"655503d54174ada312048def","slug":"artists-spread-the-fragrance-of-bundeli-folk-art-through-wall-dance-mahoba-news-c-225-1-mah1001-2827-2023-11-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mahoba News: दिवारी नृत्य से कलाकारों ने बिखेरी बुंदेली लोककला की महक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mahoba News: दिवारी नृत्य से कलाकारों ने बिखेरी बुंदेली लोककला की महक
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
महोबा। शहर के मोहल्ला नैकानापुरा में भाईदूज के मौके पर पारंपरिक दिवारी का आयोजन किया गया। दिवारी नृत्य के दौरान कलाकारों ने बुंदेली लोक कला की महक बिखेरी। कलाकारों ने हैरतअंगेज कलाओं की प्रस्तुति से सभी का मन मोह लिया। दिवारी नृत्य देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुटी रही।
लखनलाल यादव एंड बुंदेली लोक समिति के कलाकारों ने दिवारी नृत्य पर अलग-अलग प्रस्तुतियां दीं। बुंदेलखंड समेत देश भर में अपनी बुंदेली लोक कला का रंग बिखेर रहे ग्रुप के कलाकार लखनलाल यादव, विपिन यादव, धर्मेंद्र, रामजी, अभिषेक, हेमंत, निखिल, शिवम, मकरंद, हरिश्चंद्र, जीतेंद्र ,शंकरलाल, तुलसीदास, जगत व धीरेंद्र ने नृत्य की शुरूआत दोहों से की। इस दौरान नवयुवक व बड़े-बुजुर्गों ने घेरा बनाकर मोहक अंदाज में नृत्य किया।
दिवारी नृत्य में लट्ठ कला की भी बेहतरीन प्रस्तुति दी गई। साथ ही मोनिया नृत्य भी प्रस्तुत किया गया। इस दौरान दर्शकों को बताया गया कि प्राचीन मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे, तब उनकी सारी गायें कहीं चली गईं। अपनी गायों को न पाकर भगवान श्रीकृष्ण दुखी होकर मौन हो गए। इसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे। जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर आए, तब कहीं जाकर कृष्ण भगवान ने अपना मौन तोड़ा। इसी आधार पर इस परंपरा की शुरुआत हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन
महोबा। शहर के मोहल्ला नैकानापुरा में भाईदूज के मौके पर पारंपरिक दिवारी का आयोजन किया गया। दिवारी नृत्य के दौरान कलाकारों ने बुंदेली लोक कला की महक बिखेरी। कलाकारों ने हैरतअंगेज कलाओं की प्रस्तुति से सभी का मन मोह लिया। दिवारी नृत्य देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुटी रही।
लखनलाल यादव एंड बुंदेली लोक समिति के कलाकारों ने दिवारी नृत्य पर अलग-अलग प्रस्तुतियां दीं। बुंदेलखंड समेत देश भर में अपनी बुंदेली लोक कला का रंग बिखेर रहे ग्रुप के कलाकार लखनलाल यादव, विपिन यादव, धर्मेंद्र, रामजी, अभिषेक, हेमंत, निखिल, शिवम, मकरंद, हरिश्चंद्र, जीतेंद्र ,शंकरलाल, तुलसीदास, जगत व धीरेंद्र ने नृत्य की शुरूआत दोहों से की। इस दौरान नवयुवक व बड़े-बुजुर्गों ने घेरा बनाकर मोहक अंदाज में नृत्य किया।
विज्ञापन
दिवारी नृत्य में लट्ठ कला की भी बेहतरीन प्रस्तुति दी गई। साथ ही मोनिया नृत्य भी प्रस्तुत किया गया। इस दौरान दर्शकों को बताया गया कि प्राचीन मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे, तब उनकी सारी गायें कहीं चली गईं। अपनी गायों को न पाकर भगवान श्रीकृष्ण दुखी होकर मौन हो गए। इसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे। जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर आए, तब कहीं जाकर कृष्ण भगवान ने अपना मौन तोड़ा। इसी आधार पर इस परंपरा की शुरुआत हुई।
विज्ञापन