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Maharajganj News: बढ़ी तस्करी, भारत पहुंच रहा नेपाल का कबाड़
Wed, 13 Dec 2023 01:33 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Wed, 13 Dec 2023 01:33 AM IST
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महराजगंज। सख्ती के बाद भी पड़ोसी देश नेपाल से तस्करी रुकने का नाम नहीं ले रही है। अब तक कपड़े, जूते समेत अन्य सामानों की तस्करी की जाती थी, लेकिन अब नेपाल से भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में कबाड़ पहुंच रहा है। इस अवैध कारोबार में अंतरराष्ट्रीय स्तर के तस्करों का भी नेटवर्क जुड़ा है। इसका खुलासा रविवार को ठूठीबारी में तब हुआ जब एसएसबी व पुलिस की संयुक्त टीम ने पेट्रोलिंग के दौरान भरवलियां एसएसबी मार्ग पर दो ट्रैक्टर-ट्रॉली पर लदी स्क्रैप, कपड़ा, प्लास्टिक, पाॅलिथीन सहित दो चालकों को गिरफ्तार किया।
सूत्रों की माने तो स्क्रैप नेपाल की सीमा में कैरियरों के जरिये डंप किए जाते हैं। वहां से पगडंडी के रास्ते साइकिल कैरियरों के जरिये भारतीय सीमा में स्थित कबाड़ की दुकानों पर पहुंचा दिए जाते हैं। पिछले माह सोनौली कोतवाली क्षेत्र के भगवानपुर गांव स्थित रोहिन नदी के किनारे चरस की बड़ी खेप के साथ पकड़ा गया सरगना दीपक मिश्रा का कबाड़ का बड़ा गोदाम था। जहां ठूठीबारी में पकड़े गए दो ट्रैक्टर-ट्रॉली कबाड़ भारत में लाया जाता था। बताया जा रहा है कि चरस तस्करी के आरोप में पकड़ा गया आरोपी कैरियर था।
मुख्य सरगना की बरगदवा ठूठीबारी, प्रसामलिक निचलौल में कई ठिकाने हैं। जहां नेपाल से कबाड़ लाकर डंप किए जाते हैं। कबाड़ की आड में मादक पदार्थ की तस्करी की जाती है। भारत और नेपाल के तस्करों का एक बड़ा सिंडिकेट नेपाल के विभिन्न स्थानों पर जर्जर फैक्ट्रियां खरीद रहा है। उन फैक्ट्रियों को तोड़कर लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े कर कैरियर के माध्यम से भारत-नेपाल सीमा से सटे नेपाली सीमाओं में पहले कबाड़ को डंप कराते हैं। फिर मौका मिलते ही भारतीय सीमाओं में भेज देते हैं। कबाड़ के इस तस्करी के धंधे में भारत-नेपाल सीमा से सटे जनपद के सीमावर्ती गांव और कस्बे में करीब एक दर्जन से अधिक दुकानें खुली हैं। किसी भी दुकान का लाइसेंस भी नहीं है। बावजूद इसके एसएसबी, पुलिस और कस्टम की सांठगांठ से यह दुकानें धड़ल्ले से चल रहीं है। सोनौली कोतवाली के फरेंदी तिवारी, तिलहवा, खनुवा, श्यामकाट, भगवानपुर आदि पगडंडी रास्ते से बड़े पैमाने पर ठेले पर लादकर कबाड़ लाया जा रहा है। इसी तरह ठूठीबारी के लक्षमीपुर, निचलौल के पगडंडियों से कबाड़ भारत में आ रही है। उक्त पगडंडी मार्ग के कुछ दूरी पर ही एसएसबी कैंप भी है, जहां जवान गश्त भी करते हैं।
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अपर पुलिस अधीक्षक आतिश कुमार सिंह ने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्र में कड़ी निगरानी की जा रही है। अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
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साइकिल कैरियर को मिलता है 1500 का लाभ
भारतीय क्षेत्र में स्क्रैप माफियाओं द्वारा साइकिल कैरियर को अधिक लाभ दिया जाता है। नेपाल स्क्रैप से जुड़े कारोबारी अब दशकों पुरानी तरकीब अपना रहे हैं। नेपाल में सक्रिय कामगार सोनौली कोतवाली के भगवानपुर से बेलहिया, होते हुए माणिग्राम तक एवं मार्चवार से सेमरहनी, लवनी होते हुए तौलियाहवा साइकिल से सब्जी व अन्य समान लेकर जाने वाले नेपाल से कबाड़ लाद कर आते हैं। जानकारों का कहना है कि एक चक्कर में ही 1500 रुपये नेपाली कमाई हो जाती है। इसी तरह नेपाल परसा मलिक थाना क्षेत्र के नेपाल गांव तैरेनी में चोरी की गाड़ियों को काटा जाता है फिर नेपाल के महेसपुर ठूठीबारी कोतवाली क्षेत्र के पगडंडियों के रास्ते भारत में डंप किया जाता है। दर्जनों साइकिल कैरियर के मदद से नेपाल में कटने वाली वाहनों के हिस्से भारत नेपाल सीमा से सटे भारतीय क्षेत्र के दुकानों पर पहुंचा दिए जाते हैं। वहीं ट्राइसाइकिल से चलने वाले चीनी चावल सहित अन्य सामान लेकर जाने वाले भी नेपाल से वापसी में कबाड़ भारत पहुंचा रहे हैं।
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नेपाल में 15 रुपये किलो बिकता है कबाड़
नेपाल में कबाड़ 15 रुपये किलो बिकता है। जबकि यह भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में 32 रुपये किलो बिकता है। वहीं गोरखपुर पहुंचते ही इसकी कीमत 40 से 50 रुपये हो जाती है। ज्यादा लाभ मिलने के कारण कबाड़ की तस्करी बढ़ गई है।
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सूत्रों की माने तो स्क्रैप नेपाल की सीमा में कैरियरों के जरिये डंप किए जाते हैं। वहां से पगडंडी के रास्ते साइकिल कैरियरों के जरिये भारतीय सीमा में स्थित कबाड़ की दुकानों पर पहुंचा दिए जाते हैं। पिछले माह सोनौली कोतवाली क्षेत्र के भगवानपुर गांव स्थित रोहिन नदी के किनारे चरस की बड़ी खेप के साथ पकड़ा गया सरगना दीपक मिश्रा का कबाड़ का बड़ा गोदाम था। जहां ठूठीबारी में पकड़े गए दो ट्रैक्टर-ट्रॉली कबाड़ भारत में लाया जाता था। बताया जा रहा है कि चरस तस्करी के आरोप में पकड़ा गया आरोपी कैरियर था।
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मुख्य सरगना की बरगदवा ठूठीबारी, प्रसामलिक निचलौल में कई ठिकाने हैं। जहां नेपाल से कबाड़ लाकर डंप किए जाते हैं। कबाड़ की आड में मादक पदार्थ की तस्करी की जाती है। भारत और नेपाल के तस्करों का एक बड़ा सिंडिकेट नेपाल के विभिन्न स्थानों पर जर्जर फैक्ट्रियां खरीद रहा है। उन फैक्ट्रियों को तोड़कर लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े कर कैरियर के माध्यम से भारत-नेपाल सीमा से सटे नेपाली सीमाओं में पहले कबाड़ को डंप कराते हैं। फिर मौका मिलते ही भारतीय सीमाओं में भेज देते हैं। कबाड़ के इस तस्करी के धंधे में भारत-नेपाल सीमा से सटे जनपद के सीमावर्ती गांव और कस्बे में करीब एक दर्जन से अधिक दुकानें खुली हैं। किसी भी दुकान का लाइसेंस भी नहीं है। बावजूद इसके एसएसबी, पुलिस और कस्टम की सांठगांठ से यह दुकानें धड़ल्ले से चल रहीं है। सोनौली कोतवाली के फरेंदी तिवारी, तिलहवा, खनुवा, श्यामकाट, भगवानपुर आदि पगडंडी रास्ते से बड़े पैमाने पर ठेले पर लादकर कबाड़ लाया जा रहा है। इसी तरह ठूठीबारी के लक्षमीपुर, निचलौल के पगडंडियों से कबाड़ भारत में आ रही है। उक्त पगडंडी मार्ग के कुछ दूरी पर ही एसएसबी कैंप भी है, जहां जवान गश्त भी करते हैं।
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अपर पुलिस अधीक्षक आतिश कुमार सिंह ने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्र में कड़ी निगरानी की जा रही है। अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
साइकिल कैरियर को मिलता है 1500 का लाभ
भारतीय क्षेत्र में स्क्रैप माफियाओं द्वारा साइकिल कैरियर को अधिक लाभ दिया जाता है। नेपाल स्क्रैप से जुड़े कारोबारी अब दशकों पुरानी तरकीब अपना रहे हैं। नेपाल में सक्रिय कामगार सोनौली कोतवाली के भगवानपुर से बेलहिया, होते हुए माणिग्राम तक एवं मार्चवार से सेमरहनी, लवनी होते हुए तौलियाहवा साइकिल से सब्जी व अन्य समान लेकर जाने वाले नेपाल से कबाड़ लाद कर आते हैं। जानकारों का कहना है कि एक चक्कर में ही 1500 रुपये नेपाली कमाई हो जाती है। इसी तरह नेपाल परसा मलिक थाना क्षेत्र के नेपाल गांव तैरेनी में चोरी की गाड़ियों को काटा जाता है फिर नेपाल के महेसपुर ठूठीबारी कोतवाली क्षेत्र के पगडंडियों के रास्ते भारत में डंप किया जाता है। दर्जनों साइकिल कैरियर के मदद से नेपाल में कटने वाली वाहनों के हिस्से भारत नेपाल सीमा से सटे भारतीय क्षेत्र के दुकानों पर पहुंचा दिए जाते हैं। वहीं ट्राइसाइकिल से चलने वाले चीनी चावल सहित अन्य सामान लेकर जाने वाले भी नेपाल से वापसी में कबाड़ भारत पहुंचा रहे हैं।
नेपाल में 15 रुपये किलो बिकता है कबाड़
नेपाल में कबाड़ 15 रुपये किलो बिकता है। जबकि यह भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में 32 रुपये किलो बिकता है। वहीं गोरखपुर पहुंचते ही इसकी कीमत 40 से 50 रुपये हो जाती है। ज्यादा लाभ मिलने के कारण कबाड़ की तस्करी बढ़ गई है।