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Maharajganj News: मोहर्रम के महीने में रोजा रखे, कुरान खानी कराए
Wed, 10 Jul 2024 07:40 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Wed, 10 Jul 2024 07:40 PM IST
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मिठौरा। मोहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी वर्ष का पहला महीना है। हिजरी वर्ष का आरंभ इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार (शामिल) किया जाता है। बृहस्पतिवार को मोहर्रम महीने की चार तारीख है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद ने इस महीने को अल्लाह का महीना कहा है। साथ ही इस मास में रोजा रखने की खास अहमियत बयान की।
जामिया रिजवीया नुरुल उलूम महराजगंज के मौलाना अमजद के अनुसार, एक हदीस में अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि रमजान के अलावा सबसे उत्तम रोजे वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मोहर्रम में रखे जाते हैं। यह कहते समय नबी-ए-करीम हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी की जिस तरह अनिवार्य नमाजों के बाद सबसे अहम नमाज तहज्जुद की है। उसी तरह रमजान के रोजों के बाद सबसे उत्तम रोजे मोहर्रम के हैं।
मोहर्रम का महीना आए तो अकीदतमंदों को खूब रोजे रखने चाहिए, कुरान खानी कराना चाहिए, गरीबों, यतिमों की मदद करना चाहिए। मुहर्रम की 9 तारीख को की जाने वाली इबादतों का भी बड़ा सवाब बताया गया है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि जिसने मोहर्रम की 9 तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मोहर्रम के एक रोजे का सवाब (फल) 30 रोजों के बराबर मिलता है।
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जामिया रिजवीया नुरुल उलूम महराजगंज के मौलाना अमजद के अनुसार, एक हदीस में अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि रमजान के अलावा सबसे उत्तम रोजे वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मोहर्रम में रखे जाते हैं। यह कहते समय नबी-ए-करीम हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी की जिस तरह अनिवार्य नमाजों के बाद सबसे अहम नमाज तहज्जुद की है। उसी तरह रमजान के रोजों के बाद सबसे उत्तम रोजे मोहर्रम के हैं।
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मोहर्रम का महीना आए तो अकीदतमंदों को खूब रोजे रखने चाहिए, कुरान खानी कराना चाहिए, गरीबों, यतिमों की मदद करना चाहिए। मुहर्रम की 9 तारीख को की जाने वाली इबादतों का भी बड़ा सवाब बताया गया है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि जिसने मोहर्रम की 9 तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मोहर्रम के एक रोजे का सवाब (फल) 30 रोजों के बराबर मिलता है।
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