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Maharajganj News: जटायु का बढ़ेगा कुनबा, तेंदुओं का होगा संरक्षण
Wed, 07 Feb 2024 02:28 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Wed, 07 Feb 2024 02:28 AM IST
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जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र
महराजगंज। वन ग्राम भारी वैसी में जटायु संरक्षण केंद्र समृद्ध हो रहा है, यहां गिद्धों का कुनबा बढ़ाने का प्रयास चल रहा है। वहीं दूसरी ओर मधवलिया रेंज में 22 हजार स्कवायर मीटर से अधिक क्षेत्रफल में वन्य जीव संरक्षण केंद्र बन रहा है। इसमें लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर भी है। फरवरी के अंत तक निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा। इसमें पशु अस्पताल, पांच तेंदुओं के संरक्षण और संवर्धन की सुविधा शुरू हो जाएगी।
जानकारी के अनुसार, चार रेस्क्यू सेंटर तेंदुए और टाइगर के लिए बनाए जाने का फैसला शासन की तरफ से लिया गया था। इसी क्रम में पहला केंद्र महराजगंज के सोहगीबरवा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी, दूसरी पीलीभीत, तीसरा हस्तिनापुर (मेरठ) और चौथा रानीपुर (चित्रकूट) में बनाया जा रहा है। पहले चरण में शासन की तरफ से जारी 4.99 करोड़ रुपये की धनराशि से पूरा किया जा रहा है। इसमें पांच तेंदुए या टाइगर के संरक्षण के साथ अन्य स्थान बनाए जा रहे हैं। फरवरी के अंत तक पहले चरण का काम पूरा हो जाएगा। इसके साथ ही रेस्क्यू सेंटर तैयार हो जाएगा।
दरअसल, सोहगीबरवा सेंचुरी क्षेत्र में तेंदुआ समेत अन्य वन्य जीवों की उपलब्धता के कारण यह समृद्ध जंगल के रूप में जाना जाता है। आवश्यक व्यवस्थाओं के अभाव में आए दिन यहां मानव व वन्य जीव में संघर्ष होना आम बात है। ऐसे में कई बार जंगलों से बाहर निकलने वाले तेंदुए भी घायल हो जाते हैं। उनकी समुचित देखभाल स्थानीय स्तर पर नहीं हो पाती। कभी-कभार घायल हुए तेंदुए को इलाज के लिए बाहर भी भेजना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर वन्य जीवों को समुचित इलाज और अन्य व्यवस्थाएं मिलें इसके लिए वन विभाग ने पूर्व में शासन को प्रस्ताव भेजा था।
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पूर्वांचल का जिम कार्बेट माने जाने वाले सोहगीबरवा में तीन साल पहले हुई गणना के मुताविक तेदुओं की कुल संख्या 47 बताई गई है। इसमें 16 पर 19 मादा तो 12 शावक हैं। ऐसे में लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर बनने से काफी सहूलियत मिलेगी।
उधर, गिद्धों के संरक्षण के लिए वन ग्राम भारी वैसी में जटायु संरक्षण केंद्र स्थापित किया गया है। भारी वैसी में जटायु संरक्षण व प्रजनन केंद्र में दो गिद्ध रखे गए हैं। अभी वह वयस्क नहीं हुए हैं। उम्र पूरी होने के बाद प्रजनन शुरू होगा। जटायु गिद्ध एवं प्रजनन केंद्र गोरखपुर वन्य क्षेत्र के अंतर्गत 1.5 हेक्टेयर में फैला है। इसे लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है। विलुप्त हो रहे गिद्धों की इस प्रजाति के संरक्षण के लिए संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई है। इस संरक्षण केंद्र में गिद्ध के लिए विभिन्न पिंजड़े बनाए गए हैं। गिद्धों के लिए एक अस्पताल की स्थापना भी की गई है, जिससे बीमार गिद्धों का जल्द इलाज हो सके। एक नर्सरी की स्थापना भी की गई है।
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जानकारी के अनुसार, चार रेस्क्यू सेंटर तेंदुए और टाइगर के लिए बनाए जाने का फैसला शासन की तरफ से लिया गया था। इसी क्रम में पहला केंद्र महराजगंज के सोहगीबरवा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी, दूसरी पीलीभीत, तीसरा हस्तिनापुर (मेरठ) और चौथा रानीपुर (चित्रकूट) में बनाया जा रहा है। पहले चरण में शासन की तरफ से जारी 4.99 करोड़ रुपये की धनराशि से पूरा किया जा रहा है। इसमें पांच तेंदुए या टाइगर के संरक्षण के साथ अन्य स्थान बनाए जा रहे हैं। फरवरी के अंत तक पहले चरण का काम पूरा हो जाएगा। इसके साथ ही रेस्क्यू सेंटर तैयार हो जाएगा।
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दरअसल, सोहगीबरवा सेंचुरी क्षेत्र में तेंदुआ समेत अन्य वन्य जीवों की उपलब्धता के कारण यह समृद्ध जंगल के रूप में जाना जाता है। आवश्यक व्यवस्थाओं के अभाव में आए दिन यहां मानव व वन्य जीव में संघर्ष होना आम बात है। ऐसे में कई बार जंगलों से बाहर निकलने वाले तेंदुए भी घायल हो जाते हैं। उनकी समुचित देखभाल स्थानीय स्तर पर नहीं हो पाती। कभी-कभार घायल हुए तेंदुए को इलाज के लिए बाहर भी भेजना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर वन्य जीवों को समुचित इलाज और अन्य व्यवस्थाएं मिलें इसके लिए वन विभाग ने पूर्व में शासन को प्रस्ताव भेजा था।
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पूर्वांचल का जिम कार्बेट माने जाने वाले सोहगीबरवा में तीन साल पहले हुई गणना के मुताविक तेदुओं की कुल संख्या 47 बताई गई है। इसमें 16 पर 19 मादा तो 12 शावक हैं। ऐसे में लेपर्ड रेस्क्यू सेंटर बनने से काफी सहूलियत मिलेगी।
उधर, गिद्धों के संरक्षण के लिए वन ग्राम भारी वैसी में जटायु संरक्षण केंद्र स्थापित किया गया है। भारी वैसी में जटायु संरक्षण व प्रजनन केंद्र में दो गिद्ध रखे गए हैं। अभी वह वयस्क नहीं हुए हैं। उम्र पूरी होने के बाद प्रजनन शुरू होगा। जटायु गिद्ध एवं प्रजनन केंद्र गोरखपुर वन्य क्षेत्र के अंतर्गत 1.5 हेक्टेयर में फैला है। इसे लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है। विलुप्त हो रहे गिद्धों की इस प्रजाति के संरक्षण के लिए संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई है। इस संरक्षण केंद्र में गिद्ध के लिए विभिन्न पिंजड़े बनाए गए हैं। गिद्धों के लिए एक अस्पताल की स्थापना भी की गई है, जिससे बीमार गिद्धों का जल्द इलाज हो सके। एक नर्सरी की स्थापना भी की गई है।