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Maharajganj News: मां शैलपुत्री की आराधना के साथ शारदीय नवरात्र का शुभारंभ

Mon, 12 Oct 2026 02:49 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 12 Oct 2026 02:49 AM IST
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Crowds of devotees gathered in the Devi temples, the temples echoed with chants.
महराजगंज। शारदीय नवरात्र के पहले दिन रविवार को देवी मंदिरों में मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना के साथ पर्व का शुभारंभ हुआ। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। भक्तों ने विधि-विधान से पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिरों में घंटा-घड़ियाल और जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया। घरों में भी कलश स्थापना कर मां की आराधना की गई।
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परतावल प्रतिनिधि के अनुसार, श्यामदेउरवां क्षेत्र के परसा उर्फ परसौना गांव स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में रविवार को नौ दिवसीय श्रीश्री शतचंडी महायज्ञ का शुभारंभ भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ। 300 कन्याओं और महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर यात्रा की। जयकारों से क्षेत्र गूंज उठा।
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कलश यात्रा यज्ञ स्थल से शुरू होकर बरौली, सोहनपुर उर्फ सोनकटिया, बांसपार कोठी और अंध्या गांव होते हुए बनरहवा पुल पर पहुंची। वहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालुओं ने जल भरा। इसके बाद यात्रा विभिन्न मार्गों से होते हुए समय माता मंदिर परिसर स्थित यज्ञ स्थल पर पहुंची, जहां विधि-विधान से कलश स्थापित किया गया। मुख्य यजमान कृष्ण मुरारी चौरसिया ने बताया कि सोमवार से प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से तीन बजे तक प्रवचनकर्ता अरविंद उपाध्याय श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाएंगे। रात आठ बजे से रामलीला का मंचन किया जाएगा। महायज्ञ की पूर्णाहुति 20 अक्टूबर को होगी। इसके अगले दिन 21 अक्टूबर को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा।
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नौ कन्याओं के साथ निकली कलश यात्रा
निचलौल। कनलही गांव के दुर्गा मंदिर परिसर से नौ कन्याओं और महिलाओं की कलश यात्रा निकाली गई। सिर पर कलश रखकर निकलीं कन्याएं और महिलाएं गाजे-बाजे के साथ चरभरिया गांव के घाट पर पहुंचीं। वहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विधि-विधान से कलश में जल भरा गया। इसके बाद श्रद्धालु कलश लेकर वापस मंदिर परिसर पहुंचे और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की। समिति के संयोजक अजय राजभर ने बताया कि गांव में करीब 15 साल से नवरात्र के पहले दिन कलश यात्रा निकालने की परंपरा चली आ रही है। समापन दिवस पर भंडारे का आयोजन होता है। उस दिन गांव में घरों में चुल्हा नहीं जलता। इस मौके पर कलश यात्रा में समिति के अध्यक्ष संजय यादव, विंध्याचल गौंड, रोहित, अच्छेलाल मद्धेशिया, सनी मद्धेशिया, नेबूलाल साहनी सहित अन्य श्रद्धालु शामिल रहे।

विधि विधान से आरंभ हुई दुर्गा पूजा
अड्डा बाजार। क्षेत्र में सुबह 10 बजे के बाद पंडालों में दुर्गा पूजा के लिए निकटवर्ती नदियों से घड़े में जल भरने के लिए कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में डीजे साउंड के गीतों पर झूमते श्रद्धालु और माथे पर घड़ा लेकर महिलाएं, युवतियां और बच्चियां चल रही थीं।


नवरात्र के पहले दिन पाथिभरा में उमड़ा आस्था का सैलाब, होटल फुल
सोनौली। नवरात्र के पहले दिन रविवार को नेपाल के ताप्लेजुंग स्थित प्रसिद्ध पाथिभरा शक्तिपीठ में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। घटस्थापना के साथ सुबह से ही माता के दर्शन के लिए भक्तों की कतार लगी रही। भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचे, जिससे मंदिर मार्ग और काफलेपाटी के आसपास के लगभग सभी होटल फुल हो गए। मौसम साफ होने से धार्मिक पर्यटन में तेजी आई है। बढ़ती भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुरक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और यातायात के विशेष इंतजाम किए गए हैं।


नेपाल तक प्रसिद्ध है टिकुलहिया माई मंदिर, नवरात्र के पहले दिन उमड़े श्रद्धालु
1892 में स्थापित हुआ था माता के पिंड स्वरूप, निचलौल के जमींदार महेश्वरी दत्त पांडेय से जुड़ी है स्थापना की कहानी
निचलौल। शारदीय नवरात्र के पहले दिन रविवार को टिकुलहिया स्थित टिकुलहिया माई मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। निचलौल नगर पंचायत सहित आसपास के गांवों से पहुंचे भक्तों ने मां दुर्गा के दरबार में मत्था टेककर पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। उत्तर प्रदेश के साथ नेपाल तक प्रसिद्ध यह मंदिर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, निचलौल के जमींदार महेश्वरी दत्त पांडेय को नेपाल की पहाड़ियों में विराजमान मां दुर्गा के शक्ति स्वरूप की जानकारी मिली थी। इसके बाद उन्होंने माता के पिंड स्वरूप को निचलौल लाने का संकल्प लिया। कहा जाता है कि माता के पिंड को पालकी से लाते समय प्रत्येक गांव के सिवान पर बकरे की बलि देने की शर्त थी। टिकुलहिया गांव के सिवान तक पहुंचते-पहुंचते बकरे समाप्त हो गए। अंतिम बकरे की बलि देने के बाद भी पालकी आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद वर्ष 1892 में उसी स्थान पर माता के पिंड स्वरूप की स्थापना करा दी गई।


2013 में स्थापित हुईं देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
स्थानीय मान्यता के अनुसार, स्थापना के बाद रात में एक शेर मंदिर परिसर में आता था और सुबह जंगल की ओर लौट जाता था। इसकी चर्चा फैलने के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। बाद में पुजारी सुभग और व्यवसायी विजय केडिया के प्रयास से मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्ष 2010 में जीर्णोद्धार की पहल हुई। अजय जायसवाल के नेतृत्व में कमेटी ने भव्य मंदिर बनवाया। वर्ष 2013 में यहां शीतला माता, नवदुर्गा और गणेश जी की प्रतिमाएं स्थापित की गईं। बाद में हनुमान और शिव मंदिर का भी निर्माण कराया गया।
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