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मानसून चक्र अनियमित होने का दिखने लगा असर
maharajgang
Updated Wed, 11 Jul 2018 11:57 PM IST
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- फोटो : amar ujala
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महराजगंज। क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) गैसों के उत्सर्जन से आजोन परत में क्षरण के कारण उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग के संकट ने जलवायु परिर्वतन का नया दौर खड़ा कर दिया है। मानसून चक्र अनियमित होने के कारण इसका असर जिले में भी दिखने लगा है। बीते दस साल में औसत बारिश के आंकडे़ से कम बारिश जिले में हुई। मानसून सत्र के अनियमित होने के कारण बरसात के आंकड़ों में भारी कमी दर्ज की जा रही है।
मौसम विभाग के मुताबिक जिले में औसत बारिश का आंकड़ा 1327 एमएम होनी चाहिए, लेकिन एक दशक में कभी भी औसत बरसात नहीं हुई। वर्ष 2004 में 1171 एमएम, 2005 में 1010 एमएम, 2006में 1059 एमएम, 2007 में 1142 एमएम, 2008 में 1214 एमएम, 2009 में 678 एमएम, 2010 में 753 एमएम, 2011 में 987 एमएम बारिश हुई। वहीं वर्ष 2012 में 1010 एमएम, 2013 में 830 एमएम, 2014 में 843 एमएम, 2015 में 585 एमएम, 2016 में 961 एमएम और वर्ष 2017 में 946 मिलीमीटर बारिश हुई। मौसम वैैज्ञानिक कैलाश पांडेय ने बताया कि इस वर्ष जुलाई में बारिश अपने औसत से कम है। बारिश में आ रही कमी के कारण मानसून आधारित कृषि क्षेत्र में उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
भूमिगत जल के दोहन का क्रम कई गुना बढ़ गया है। इसका सीधा प्रभाव भूगर्भीय जल स्तर पर पड़ा है। अपेक्षित बारिश न होने से बागवानी, सब्जी, कृषि, वानिकी एवं पौधरोपण अभियान पर भी असर पड़ा है। उप कृषि निदेशक गणेश दुबे ने बताया कि बरसात में हो रही लगातार गिरावट जलवायु परिवर्तन का असर है। इसका प्रभाव फसल चक्र पर भी पड़ रहा है। बारिश की कमी का प्रभाव जीव एवं वनस्पति जगत पर भी पड़ रहा है। डीएफओ मनीष सिंह ने बताया कि प्रकृति से छेड़डाड़ कर विकास की तेज प्रक्रिया ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है। इससे जलवायु परिर्वतन की स्थिति उत्पन्न हुई है। पौधरोपण ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उपाय है।
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मौसम विभाग के मुताबिक जिले में औसत बारिश का आंकड़ा 1327 एमएम होनी चाहिए, लेकिन एक दशक में कभी भी औसत बरसात नहीं हुई। वर्ष 2004 में 1171 एमएम, 2005 में 1010 एमएम, 2006में 1059 एमएम, 2007 में 1142 एमएम, 2008 में 1214 एमएम, 2009 में 678 एमएम, 2010 में 753 एमएम, 2011 में 987 एमएम बारिश हुई। वहीं वर्ष 2012 में 1010 एमएम, 2013 में 830 एमएम, 2014 में 843 एमएम, 2015 में 585 एमएम, 2016 में 961 एमएम और वर्ष 2017 में 946 मिलीमीटर बारिश हुई। मौसम वैैज्ञानिक कैलाश पांडेय ने बताया कि इस वर्ष जुलाई में बारिश अपने औसत से कम है। बारिश में आ रही कमी के कारण मानसून आधारित कृषि क्षेत्र में उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
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भूमिगत जल के दोहन का क्रम कई गुना बढ़ गया है। इसका सीधा प्रभाव भूगर्भीय जल स्तर पर पड़ा है। अपेक्षित बारिश न होने से बागवानी, सब्जी, कृषि, वानिकी एवं पौधरोपण अभियान पर भी असर पड़ा है। उप कृषि निदेशक गणेश दुबे ने बताया कि बरसात में हो रही लगातार गिरावट जलवायु परिवर्तन का असर है। इसका प्रभाव फसल चक्र पर भी पड़ रहा है। बारिश की कमी का प्रभाव जीव एवं वनस्पति जगत पर भी पड़ रहा है। डीएफओ मनीष सिंह ने बताया कि प्रकृति से छेड़डाड़ कर विकास की तेज प्रक्रिया ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है। इससे जलवायु परिर्वतन की स्थिति उत्पन्न हुई है। पौधरोपण ही पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उपाय है।
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