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श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है मां बनैलिया मंदिर
Updated Fri, 22 Sep 2017 05:43 PM IST
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महराजगंज। भारत-नेपाल सीमा को जोड़ने वाले नगर नौतनवां में वन देवी अर्थात मां बनैलिया के नाम से विख्यात मंदिर स्थित है। शारदीय नवरात्र शुरू होते ही इस मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। स्थानीय नागरिकों के अलावा दूरदराज के जनपदों के साथ पड़ोसी देश नेपाल के श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर में आ रही है। मां बनैलिया के नाम से विख्यात इस मंदिर में विशेष कर नेपाल के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है।
मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से ही सभी की मुरादें पूरी होती हैं। मंदिर के संबंध में बताया जाता है कि अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पांडवों ने मां वन शक्ति की यहां पर आराधना की थी। जिससे प्रसन्न होकर मां ने पिंडी स्वरूप में पांडवों को दर्शन दिया। कालांतर में मां की पिंडी खेतों के बीच समाहित हो गई। एक दिन खेत जोत रहे किसान केदार मिश्र को स्वप्न में मां ने कहा कि यहां पर उनकी पिंडी खोजकर मंदिर का निर्माण करें। इसके बाद केदार मिश्र ने सन 1888 में यहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया। जो आज विशालकाय मंदिर के रूप में स्थापित हो चुका है। जिसकी स्थापना 20 जनवरी 1991 को विधिपूर्वक हुई। प्रतिवर्ष इस दिन धूमधाम से वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। यहां पर आने वाले हर भक्त की इच्छा मां पूरा करती हैं। चूंकि मां को हाथी बहुत पसंद है, इसलिए इच्छा पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पर हाथी की मूर्ति चढ़ाते हैं।
मंदिर के पुजारी गजेंद्र का कहना है कि मंदिर वृत्ताकार अरघा नुमा संरचना में है, जिसके अंदर मां के नौ स्वरूपों को स्थापित किया गया है। केंद्र में मां बनैलिया की भव्य प्रतिमा शोभायमान है। मंदिर वृत्ताकार होने के कारण मां की परिक्रमा मंदिर के अंदर ही की जाती है। मंदिर परिसर में तीर्थ यात्रियों के रात्रि निवास व भोजन की व्यवस्था भी है।
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मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से ही सभी की मुरादें पूरी होती हैं। मंदिर के संबंध में बताया जाता है कि अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के भवन से लौटते समय पांडवों ने मां वन शक्ति की यहां पर आराधना की थी। जिससे प्रसन्न होकर मां ने पिंडी स्वरूप में पांडवों को दर्शन दिया। कालांतर में मां की पिंडी खेतों के बीच समाहित हो गई। एक दिन खेत जोत रहे किसान केदार मिश्र को स्वप्न में मां ने कहा कि यहां पर उनकी पिंडी खोजकर मंदिर का निर्माण करें। इसके बाद केदार मिश्र ने सन 1888 में यहां पर एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया। जो आज विशालकाय मंदिर के रूप में स्थापित हो चुका है। जिसकी स्थापना 20 जनवरी 1991 को विधिपूर्वक हुई। प्रतिवर्ष इस दिन धूमधाम से वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। यहां पर आने वाले हर भक्त की इच्छा मां पूरा करती हैं। चूंकि मां को हाथी बहुत पसंद है, इसलिए इच्छा पूरी होने पर श्रद्धालु यहां पर हाथी की मूर्ति चढ़ाते हैं।
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मंदिर के पुजारी गजेंद्र का कहना है कि मंदिर वृत्ताकार अरघा नुमा संरचना में है, जिसके अंदर मां के नौ स्वरूपों को स्थापित किया गया है। केंद्र में मां बनैलिया की भव्य प्रतिमा शोभायमान है। मंदिर वृत्ताकार होने के कारण मां की परिक्रमा मंदिर के अंदर ही की जाती है। मंदिर परिसर में तीर्थ यात्रियों के रात्रि निवास व भोजन की व्यवस्था भी है।
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