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भौतिक व वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खा रही सर्वे रिपोर्ट

Tue, 22 Aug 2017 01:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 22 Aug 2017 01:05 AM IST
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Survey report that does not match physical and physical status
computer, lalitpur news - फोटो : demo
मई में जिला बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा हाउस होल्ड सर्वे कराया गया था। इसमें जनपद के कुल 283 बच्चों को चिह्नित किया गया था, जो आउट ऑफ स्कूल हैं। उक्त सर्वे रिपोर्ट विभाग द्वारा शासन को भेजी जा चुकी है और वर्तमान में इन बच्चों को विशेष शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शासन स्तर पर विशेष प्रशिक्षण की कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है और बजट तक उपलब्ध करा दिया गया है। जबकि जिला बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा शासन को भेजी गई सर्वे रिपोर्ट में और जनपद की भौतिक स्थिति में काफी परिवर्तन है, जो यह साबित करता है कि स्थानीय विभाग द्वारा शासन की योजना को पलीता लगाने का काम किया जा रहा है।
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इस वर्ष का हाउस होल्स सर्वे अभियान 15 मई तक पूर्ण हो चुका है, जिसमें 283 बच्चों को चिह्नित किया गया है, जिन्होंने अभी तक विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया है। जिला बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा बीते मई माह में ही सर्वे रिपोर्ट भी शासन को भेज दी है, लेकिन विभाग द्वारा जो सर्वे रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी गई है। वह जनपद की भौतिक व वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खा रही है। विभाग द्वारा आउट आफ स्कूल वाले बच्चों की जो सर्वे रिपोर्ट तैयार कर उसमें दर्शाया गया है कि पूरे जनपद में एक भी ऐसा बालक व बालिका नहीं है तो कचरा व कबाड़ बीनने का काम करता है, जबकि हकीकत सबको पता है।
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शहर के रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड पर छोटे-छोटे बच्चे ग्रुप बनाकर हर रोज पानी की खाली बोतलें व अन्य प्लास्टिक के सामने बीनते दिखाई देते हैं और इसके अलावा शहर के कचरा घरों, डंपिंग स्थल समेत सरकारी कार्यालयों के सामने व रिहायसी इलाकों व अन्य स्थानों पर भी यह दृश्य देखने को मिलता है। इसके अलावा विभाग की नजरों में कोई भी बच्चा घरेलू नौकर नहीं है, जबकि शहर के ही कई रिहायसी इलाकों में छोटे बालक-बालिका घरों में झाड़ू-पौंछा व बर्तन धोकर घरेलू नौकर का काम कर रहे हैं। इसी तरह विभागीय रिपोर्ट में केवल एक ही बालक है जो ईट-भट्ठों व खदानों पर काम करता है, जबकि हकीकत तो यह है कि गांवों में नलों से बालू निकालने, पहाड़ियों से मुहर्रम खोदने व पत्थरों की खदानों और ईंट भट्टी के लिए मिट्टी खोदने के काम में कई बच्चे संलिप्त हैं। इसके अलावा बीएसए विभाग की रिपोर्ट में जनपद का कोई भी बच्चा गैराज व फैक्टरी में कार्य नहीं करता है।
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जनपद में फैक्टरी तो नहीं है, लेकिन गैराजों की बात करें तो शहर क्षेत्र में स्थित मवेशी बाजार में अनेकों बालक मजदूरी करते हैं। वहीं विभागीय रिपोर्ट की हकीकत की पोल तो इससे ही खुलकर सामने आ जाती है कि रिपोर्ट के अनुसार जनपद के किसी भी छोटे होटल व ढाबों पर कोई बच्चा काम नहीं करता है, जबकि हकीकत सबको ही पता है, कि चाय-नास्ता की दुकानों, स्टेशन, बस स्टेंड व बाजारों में खुली हर दूसरी दुकान पर कोई छोटूू काम करता ही है। कृषि व्यवसाय का कार्य करने वाले में भी मात्र 4 बालकों को ही दर्शाया गया है।

...ताकि न हो दिक्कत
 इसके अलावा विभाग ने सबसे अधिक आउट आफ स्कूल बच्चों की संख्या ऐसे कारण बताए हैं, जिससे प्रशासन को भी समस्या खड़ी न हो। इसमें सबसे ज्यादा बच्चे अपने छोटे भाई-बहिनों की देखभाल के कारण विद्यालय नहीं पहुंच पा रहे हैं, जिनकी संख्या 71 है। इसके अलावा 66 बच्चे अपने घर के कार्यों में व्यस्तता के कारण, 47 बच्चे विद्यालय की अधिक दूरी होने के कारण और 30 बच्चे अन्य कारणों व 24 बच्चे गंभीर विकलांगता के कारण विद्यालय नहीं पहुंच पा रहे हैं।


नि:शुल्क शिक्षा में गरीबी कैसा रोड़ा
विभाग ने हाउस होल्ड सर्वे की रिपोर्ट में बताया है कि जनपद के 22 बालक-बालिकाएं ऐसी है, जो गरीबी के चलते शिक्षा के मूल धरा से नहीं जुड़ पाए हैं। गौरतलब है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है। बच्चों को मुफ्त में दो जोड़ी यूनिफार्म, पुस्तकें, बस्ता आदि उपलब्ध कराती है। इसके अलावा मिड-डे मील के तहत बच्चों को एक समय को पोष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराया जाता है। यह तमाम सुविधाएं मुफ्त में उपलब्ध होने के बाद भी यदि शिक्षा में गरीबी रोड़ा बने तो यह दिमाग से परे बात है।
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