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श्रीमद भागवत गीता भक्त को जीवन जीने की कला सिखाती है
ब्यूरो
Updated Fri, 08 Jan 2016 12:58 AM IST
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ललितपुर। स्वामी चंद्रेश्वर गिरि महाराज ने कहा कि श्रीमद भागवत गीता भक्त को जीवन जीने की कला सिखाती है। इस मौके पर भगवान श्री कृष्ण के जन्म की कथा सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। कथा व्यास ने गीता का महत्व बताया।
मुहल्ला नई बस्ती स्थित लिटिल फ्लावर स्कूल के पास चल रही कथा में चौथे दिन कथा व्यास ने कहा कि गीता का वास्तविक उद्देश्य व्यवहार एवं आध्यात्म का समन्वय है। गीता में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण का अमर संदेश है। गीता ने सदाचार को ही धर्म कहा है। सदाचार से त्याग जागृत होता है और त्याग से सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि गीता कहती है कि कलियुग में मनुष्य की बुद्धि बहुत स्वार्थी हो जाती है। वह निरंतर अपनी व अपने परिवार की भलाई के लिए ही सोचता है। स्वार्थ के कारण मनुष्य अच्छे व बुरे में भेद करने का विवेक खो देता है। इसी का परिणाम है समाज में पनपने वाला दुराचरण।
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झूठ, अन्याय, हिसा, भ्रष्टाचार, छल-कपट, लूट और चरित्र हीनता जैसी बुराइयां सदाचरण के अभाव से ही फैलती हैं, जिनसे समाज को भारी क्षति होती है। व्यक्ति को अपना नैतिक पतन रोकने के लिए गीता का अनुसरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को सेवा को ही अपना मुख्य धर्म व उद्देश्य बनाना चाहिए, क्योंकि सेवा से मनुष्य में संस्कारों का अंकुरण होता है। महापुराण का पूजन वैदिक रीति से प्रधान यजमान अनिल श्रीवास्तव ने किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने कथा की आरती उतारी।
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मुहल्ला नई बस्ती स्थित लिटिल फ्लावर स्कूल के पास चल रही कथा में चौथे दिन कथा व्यास ने कहा कि गीता का वास्तविक उद्देश्य व्यवहार एवं आध्यात्म का समन्वय है। गीता में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण का अमर संदेश है। गीता ने सदाचार को ही धर्म कहा है। सदाचार से त्याग जागृत होता है और त्याग से सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।
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उन्होंने कहा कि गीता कहती है कि कलियुग में मनुष्य की बुद्धि बहुत स्वार्थी हो जाती है। वह निरंतर अपनी व अपने परिवार की भलाई के लिए ही सोचता है। स्वार्थ के कारण मनुष्य अच्छे व बुरे में भेद करने का विवेक खो देता है। इसी का परिणाम है समाज में पनपने वाला दुराचरण।
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झूठ, अन्याय, हिसा, भ्रष्टाचार, छल-कपट, लूट और चरित्र हीनता जैसी बुराइयां सदाचरण के अभाव से ही फैलती हैं, जिनसे समाज को भारी क्षति होती है। व्यक्ति को अपना नैतिक पतन रोकने के लिए गीता का अनुसरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को सेवा को ही अपना मुख्य धर्म व उद्देश्य बनाना चाहिए, क्योंकि सेवा से मनुष्य में संस्कारों का अंकुरण होता है। महापुराण का पूजन वैदिक रीति से प्रधान यजमान अनिल श्रीवास्तव ने किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने कथा की आरती उतारी।