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नफीस के पर्दा खींचते ही शुरु हो जाती रामलीला
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 19 Sep 2017 01:16 AM IST
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ramlila, lalitpur news
- फोटो : amar ujala
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नृसिंह मंदिर की रामलीला आज भी हिंदू मुस्लिम एकता की प्रतीक है। पिछले पचास वर्ष से तालाबपुरा में होने वाली इस रामलीला का शुभारंभ पैंतीस वर्ष से नफीस के द्वारा परदा खींचनेे के बाद ही किया जाता है। पचास वर्ष पूरे होने की वर्षगांठ पर इस बार आयोजन में विशेष आकर्षण होगा। सजीवता लाने के लिए मथुरा वृंदावन से पात्रों के लिए पोशाकें और आभूषण मंगाए गए हैं।
वर्ष 1968 में शहर के तालाबपुरा स्थित श्रीनृसिंह मंदिर में रामलीला की शुरुआत की गई थी। उस समय सादे पर्दा और साधारण वेशभूषा में ही मंचन की शुरुआत की गई थी। आयोजन समिति की स्थापना बब्बू राजा रौंड़ा द्वारा की गई थी। सभी वर्गों के सहयोग से रामलीला के मंचन में आने वाले खर्चे को वहन किया जाता था। लेकिन, धीरे-धीरे रामलीला ने भव्य रुप धारण कर लिया और पात्रों व उनकी साज-सज्जा के सामानों में भी आधुनिकता बढ़ती गई और मंचन को सजीवता देने के लिए खर्चा में भी बढ़ गया। रामलीला के संस्थापक बब्बू राजा ने कई वर्षों तक अपनी कद काठी और बुलंद आवाज के सहारे खुद ही रावण का किरदार निभाया। उनका किरदार आज भी याद किया जाता है। ढोलक और हरमोनियम की धुन पर शुरु हुई रामलीला आज आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच होती है। एक ही मंच पर परदों के सहारे ही अयोध्या, जनकपुरी, वन, नदी और लंका दहन का मंचन किया जाता है। तालाबपुरा की रामलीला में पैंतीस वर्षों से नि:स्वार्थ भावना से धार्मिक कार्य में पर्दा खींचने का मुख्य कार्य नफीस अपने सहयोगी देवी कुशवाहा के साथ करते हैं।
इस बारे में दर्शकों का इसका जरा भी अंदाजा नहीं होता है कि पर्दा लगाने, पर्दा की साज सज्जा करने और पर्दा खीचने के पीछे किसका हाथ है। जबकि पूरी रामलीला के मंचन में मुख्यत: पर्दा का ही खेल होता है। यह पर्दा ही रामलीला के नाट्य मंचन की असल कहानी कहता है और रामलीला का सजीव चित्रण दर्शाता है। रामलीला का पर्दा खींचने वाले नफीस का कहना है कि उन्हें यह कार्य करते हुए पैंतीस वर्ष हो गए हैं और उन्हें रामलीला का मंच सजाने और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की इस लीला के मंचन का पर्दा खींचने में आत्मसंतुष्टि भी मिलती है। रामलीला के इस प्राचीन मंचन का सजीव चित्रण दर्शाने के लिए इस बार की रामलीला में भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम का किरदार दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले आयुष्मान निभाएंगे, तो लक्ष्मण नौंवी कक्षा में अध्य्यनरत रुद्रांश चतुर्वेदी बनेंगे। सीता का किरदार आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले शुुुभम पुरोहित अदा करेंगे।
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श्रीनृसिंह रामलीला समिति के अध्यक्ष भवानी सिंह यादव और कोषाध्यक्ष अखिलेश पाठक बताते हैं कि वर्तमान में सभी किरदारों में सबसे महंगा किरदार रावण का हो गया है। पहले तो रावण का किरदार करने वाले भी आसानी से मिल जाते थे और वह नि:स्वार्थ भाव से भी इस मंचन में सहयोग देते थे और आज के दौर में युवाओं में ऐसा मंचन करने की खूबियां भी कम ही मिलती हैं। लेकिन वर्तमान में रावण का किरदार आधुनिकता के साथ महंगा भी हो गया है। हालांकि राम, लक्ष्मण और सीता का किरदार निभाने वालों पर बहुत अधिक खर्चा नहीं आता है। रामलीला की तैयारियां एक महीने पूर्व से की जा रही हैं। सोमवार की शाम को रामलीला का मंच सज कर तैयार हो चुुका है और अब तालाबपुरा में श्रीनृृसिंह रामलीला समिति के तत्वावधान 14 दिवसीय रामलीला का आयोजन किया जाएगा, जो शहर में मुख्य आकर्षण के केंद्र रहेगी। इस बार विजयकांत जहां वर्तमान में रावण का किरदार अदा करेंगे, तो आयुष्मान भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम का किरदार निभाएंगे।
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वर्ष 1968 में शहर के तालाबपुरा स्थित श्रीनृसिंह मंदिर में रामलीला की शुरुआत की गई थी। उस समय सादे पर्दा और साधारण वेशभूषा में ही मंचन की शुरुआत की गई थी। आयोजन समिति की स्थापना बब्बू राजा रौंड़ा द्वारा की गई थी। सभी वर्गों के सहयोग से रामलीला के मंचन में आने वाले खर्चे को वहन किया जाता था। लेकिन, धीरे-धीरे रामलीला ने भव्य रुप धारण कर लिया और पात्रों व उनकी साज-सज्जा के सामानों में भी आधुनिकता बढ़ती गई और मंचन को सजीवता देने के लिए खर्चा में भी बढ़ गया। रामलीला के संस्थापक बब्बू राजा ने कई वर्षों तक अपनी कद काठी और बुलंद आवाज के सहारे खुद ही रावण का किरदार निभाया। उनका किरदार आज भी याद किया जाता है। ढोलक और हरमोनियम की धुन पर शुरु हुई रामलीला आज आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच होती है। एक ही मंच पर परदों के सहारे ही अयोध्या, जनकपुरी, वन, नदी और लंका दहन का मंचन किया जाता है। तालाबपुरा की रामलीला में पैंतीस वर्षों से नि:स्वार्थ भावना से धार्मिक कार्य में पर्दा खींचने का मुख्य कार्य नफीस अपने सहयोगी देवी कुशवाहा के साथ करते हैं।
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इस बारे में दर्शकों का इसका जरा भी अंदाजा नहीं होता है कि पर्दा लगाने, पर्दा की साज सज्जा करने और पर्दा खीचने के पीछे किसका हाथ है। जबकि पूरी रामलीला के मंचन में मुख्यत: पर्दा का ही खेल होता है। यह पर्दा ही रामलीला के नाट्य मंचन की असल कहानी कहता है और रामलीला का सजीव चित्रण दर्शाता है। रामलीला का पर्दा खींचने वाले नफीस का कहना है कि उन्हें यह कार्य करते हुए पैंतीस वर्ष हो गए हैं और उन्हें रामलीला का मंच सजाने और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की इस लीला के मंचन का पर्दा खींचने में आत्मसंतुष्टि भी मिलती है। रामलीला के इस प्राचीन मंचन का सजीव चित्रण दर्शाने के लिए इस बार की रामलीला में भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम का किरदार दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले आयुष्मान निभाएंगे, तो लक्ष्मण नौंवी कक्षा में अध्य्यनरत रुद्रांश चतुर्वेदी बनेंगे। सीता का किरदार आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले शुुुभम पुरोहित अदा करेंगे।
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श्रीनृसिंह रामलीला समिति के अध्यक्ष भवानी सिंह यादव और कोषाध्यक्ष अखिलेश पाठक बताते हैं कि वर्तमान में सभी किरदारों में सबसे महंगा किरदार रावण का हो गया है। पहले तो रावण का किरदार करने वाले भी आसानी से मिल जाते थे और वह नि:स्वार्थ भाव से भी इस मंचन में सहयोग देते थे और आज के दौर में युवाओं में ऐसा मंचन करने की खूबियां भी कम ही मिलती हैं। लेकिन वर्तमान में रावण का किरदार आधुनिकता के साथ महंगा भी हो गया है। हालांकि राम, लक्ष्मण और सीता का किरदार निभाने वालों पर बहुत अधिक खर्चा नहीं आता है। रामलीला की तैयारियां एक महीने पूर्व से की जा रही हैं। सोमवार की शाम को रामलीला का मंच सज कर तैयार हो चुुका है और अब तालाबपुरा में श्रीनृृसिंह रामलीला समिति के तत्वावधान 14 दिवसीय रामलीला का आयोजन किया जाएगा, जो शहर में मुख्य आकर्षण के केंद्र रहेगी। इस बार विजयकांत जहां वर्तमान में रावण का किरदार अदा करेंगे, तो आयुष्मान भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम का किरदार निभाएंगे।