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बारिश के चार महीने गांव में कैद होकर रह जाते कुर्रटवासी
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कुर्रट गांव में हैंडपंप से निकलती हवा
- फोटो : LALITPUR
मड़ावरा/ललितपुर। प्रदेश सरकार भले ही समग्र विकास के दावे कर रही हो लेकिन हकीकत इससे कहीं हटकर है। प्रदेश के अंतिम छोर में बसे कुर्रट गांव में आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। यहां के लोगों को अभी तक पक्की सड़क नसीब नहीं हो पाई है। इस कारण यहां के लोग बारिश के चार महीने गांव से बाहर नहीं निकल पाते हैं।
विकासखंड मड़ावरा के वनांचल में ग्राम पंचायत कुर्रट बसी है। इस गांव से मध्यप्रदेश की सीमा लगी हुई है, इसके निकट धसान नदी है। गांव में लगभग 200 परिवार रहते हैं। गांव में एक जूनियर हाईस्कूल, एक ग्रामीण सचिवालय, दो ट्रांसफार्मर, करीब 6 सार्वजनिक हैंडपंप हैं। इस ग्राम पंचायत में लखंजर व जैतुपुरा गांव भी जुड़े हैं। इन तीनों गांवों की सबसे विकट समस्या संपर्क मार्ग की कमी है। जंगल के बीच बसे इन गांवों में पक्की सड़क नहीं होने से बारिश के चार महीने आवागमन लगभग समाप्त हो जाता है।
कुर्रट गांव में तहसील मुख्यालय मड़ावरा से धौरीसागर से जंगल के रास्ते तथा गिरार से जैतुपुरा होते हुए पहुंचा जा सकता है । बारिश के दिनों में रास्ते इतने दुर्गम हो जाते हैं कि ट्रैक्टर के अलावा अन्य चार पहिया वाहन से वहां पहुंचना काफी मुश्किल है। बारिश के मौसम में अगर कोई ग्रामीण बुजुर्ग, महिला या बच्चा बीमार हो जाए तो उसका इलाज करवाना काफी मुश्किल हो जाता है। जब कोई बीमार हो जाता है तो ग्रामीणों को उसे खाट (चारपाई) पर रखकर नाव से धसान नदी पार करानी पड़ती है, तब जाकर मध्यप्रदेश के बरायठा कसबा में पहुंच पाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव के भीतर कई गलियों में सीसी एवं पेवर ब्रिक्स नहीं बिछे हैं। इससे रास्ते में गंदगी व कीचड़ की समस्या बनी रहती है। यहां के लोगों के लिए रोजगार कृषि कार्य ही हैं। खेतों में मजदूरी के अलावा कोई और काम नहीं है।
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गांव में विकास के नाम पर कुछ सरकारी इमारतें बनी हैं। बाकी गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी नजर आती है। गांव नाम के लिए ही उत्तर प्रदेश में है। गांव के लोगों के अधिकतर काम मध्य प्रदेश के बरायठा से निपटते हैं, यह गांव के करीब पड़ता है।-देवी सिंह, कुर्रट
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स्वच्छ भारत मिशन के तहत कुर्रट गांव में बड़ी संख्या में शौचालय बनाए गए हैं लेकिन अधिकांश शौचालय अधूरे और जीर्णशीर्ण हैं। इसमें घटिया सामग्री लगाई गई। कई शौचालयों में गड्ढे तक नहीं खोदे गए हैं, कई लाभार्थियों को मजदूरी तक नहीं मिली है।-हरदास कुशवाहा, कुर्रट
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कुर्रट में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए परिषदीय विद्यालय संचालित हैं। कोरोना काल में स्कूल बंद हैं, सामान्य दिनों में भी विद्यालय अनियमित खुलते हैं। लोगों ने जूनियर हाईस्कूल में तैनात शिक्षिका को ठीक से पहचानते भी नहीं हैं।-कमलेश सेन
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गांव में पीने के स्वच्छ पानी की बेहद कमी है। स्कूल के पास लगा हैंडपंप महीनों से खराब है। ग्रामीण निजी टयूबवेल से पीनी के पानी का इंतजाम करते हैं। वहीं, गांव के मोहल्ला में बबलू कुशवाहा के मकान के पास स्थापित 25 केवीए का ट्रांसफार्मर खराब पड़ा है।-पप्पू सेन
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सामाजिक चेतना की जरूरत है, तभी खुले में शौच की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। एक साल से शौचालय का पैसा लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है।-डॉ. अवधेश सिंह,डीपीआरओ
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विकासखंड मड़ावरा के वनांचल में ग्राम पंचायत कुर्रट बसी है। इस गांव से मध्यप्रदेश की सीमा लगी हुई है, इसके निकट धसान नदी है। गांव में लगभग 200 परिवार रहते हैं। गांव में एक जूनियर हाईस्कूल, एक ग्रामीण सचिवालय, दो ट्रांसफार्मर, करीब 6 सार्वजनिक हैंडपंप हैं। इस ग्राम पंचायत में लखंजर व जैतुपुरा गांव भी जुड़े हैं। इन तीनों गांवों की सबसे विकट समस्या संपर्क मार्ग की कमी है। जंगल के बीच बसे इन गांवों में पक्की सड़क नहीं होने से बारिश के चार महीने आवागमन लगभग समाप्त हो जाता है।
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कुर्रट गांव में तहसील मुख्यालय मड़ावरा से धौरीसागर से जंगल के रास्ते तथा गिरार से जैतुपुरा होते हुए पहुंचा जा सकता है । बारिश के दिनों में रास्ते इतने दुर्गम हो जाते हैं कि ट्रैक्टर के अलावा अन्य चार पहिया वाहन से वहां पहुंचना काफी मुश्किल है। बारिश के मौसम में अगर कोई ग्रामीण बुजुर्ग, महिला या बच्चा बीमार हो जाए तो उसका इलाज करवाना काफी मुश्किल हो जाता है। जब कोई बीमार हो जाता है तो ग्रामीणों को उसे खाट (चारपाई) पर रखकर नाव से धसान नदी पार करानी पड़ती है, तब जाकर मध्यप्रदेश के बरायठा कसबा में पहुंच पाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव के भीतर कई गलियों में सीसी एवं पेवर ब्रिक्स नहीं बिछे हैं। इससे रास्ते में गंदगी व कीचड़ की समस्या बनी रहती है। यहां के लोगों के लिए रोजगार कृषि कार्य ही हैं। खेतों में मजदूरी के अलावा कोई और काम नहीं है।
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गांव में विकास के नाम पर कुछ सरकारी इमारतें बनी हैं। बाकी गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी नजर आती है। गांव नाम के लिए ही उत्तर प्रदेश में है। गांव के लोगों के अधिकतर काम मध्य प्रदेश के बरायठा से निपटते हैं, यह गांव के करीब पड़ता है।-देवी सिंह, कुर्रट
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स्वच्छ भारत मिशन के तहत कुर्रट गांव में बड़ी संख्या में शौचालय बनाए गए हैं लेकिन अधिकांश शौचालय अधूरे और जीर्णशीर्ण हैं। इसमें घटिया सामग्री लगाई गई। कई शौचालयों में गड्ढे तक नहीं खोदे गए हैं, कई लाभार्थियों को मजदूरी तक नहीं मिली है।-हरदास कुशवाहा, कुर्रट
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कुर्रट में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए परिषदीय विद्यालय संचालित हैं। कोरोना काल में स्कूल बंद हैं, सामान्य दिनों में भी विद्यालय अनियमित खुलते हैं। लोगों ने जूनियर हाईस्कूल में तैनात शिक्षिका को ठीक से पहचानते भी नहीं हैं।-कमलेश सेन
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गांव में पीने के स्वच्छ पानी की बेहद कमी है। स्कूल के पास लगा हैंडपंप महीनों से खराब है। ग्रामीण निजी टयूबवेल से पीनी के पानी का इंतजाम करते हैं। वहीं, गांव के मोहल्ला में बबलू कुशवाहा के मकान के पास स्थापित 25 केवीए का ट्रांसफार्मर खराब पड़ा है।-पप्पू सेन
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सामाजिक चेतना की जरूरत है, तभी खुले में शौच की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। एक साल से शौचालय का पैसा लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है।-डॉ. अवधेश सिंह,डीपीआरओ

अनुपयोगी साबित हो रहे आधे अधूरे शौचालय- फोटो : LALITPUR

कुर्रट गांव का रास्ता दलदल में तब्दील- फोटो : LALITPUR