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Lalitpur News: सहायक चकबंदी अधिकारी, लेखपाल व कानूनगो पर रिपोर्ट दर्ज के आदेश

Wed, 27 May 2026 01:32 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Wed, 27 May 2026 01:32 AM IST
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Orders Issued to Register FIRs Against Assistant Consolidation Officer, Lekhpal, and Kanungo
संवाद न्यूज एजेंसी
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ललितपुर। नियमों के विपरीत, मनमाने तरीके से षड़यंत्र कर जालसाजी से विरासत दर्ज करने के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक जायसवाल ने सहायक चकबंदी अधिकारी, लेखपाल और कानूनगो पर रिपोर्ट दर्ज के आदेश जारी किया है।
कोतवाली के मोहल्ला सरदारपुरा निवासी महेंद्र कुमार गौतम ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रार्थना पत्र देकर बताया कि ग्राम ककरूवा में खाता संख्या 271 के तहत कुल 6.584 हेक्टेयर संक्रमणीय कृषि योग्य भूमि है। जिस पर वह खुद काबिज और काश्तकार हैं। इस गांव में साल 2018 से चकबंदी प्रक्रिया चल रही है। पूर्व में इस भूमि पर कुछ विवाद होने के कारण तत्कालीन चकबंदी लेखपाल सुदीप कुमार और कानूनगो ने 10 जनवरी 2024 को आदेश पारित कर इसे विवादग्रस्त मानते हुए चकबंदी अधिनियम की धारा 9 के तहत सुरक्षित कर दिया था। ताकि दोनों पक्षों को सुनने के बाद नियमतः इसका निस्तारण किया जा सके। पीड़ित किसान का आरोप है कि लेखपाल सुदीप कुमार के तबादले के बाद आए चकबंदी लेखपाल अतुल गुप्ता, सहायक चकबंदी अधिकारी अर्चना मिश्रा और कानूनगो कर्मचंद्र राय ने आपसी साठगांठ कर ली। साजिश रचते हुए एक सितंबर 2025 को नियमों को ताक पर रख कर धारा 6 के तहत आदेश पारित किया। जिसमें सुभाषपुरा निवासी गंगा पत्नी सौरभ नायक के पक्ष में विरासत दर्ज कर दी गई। बताया कि 19 सितंबर 2025 को पीड़ित ने लेखपाल से अपने खाते की नकल मांगी, तो उसने नकल देने से मना कर दिया।
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कोर्ट में खुली चकबंदी विभाग की पोल

पीड़ित किसान ने पुलिस अधीक्षक को रजिस्टर्ड डाक से शिकायत भेजी और पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, तब पीड़ित ने अधिवक्ता अशोक कुमार चतुर्वेदी के माध्यम से सीजेएम कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया। कोर्ट ने जब जांच रिपोर्ट मांगी गई, तो चकबंदी विभाग ने अपनी आख्या में कहा कि लेखपाल अतुल गुप्ता को इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि यह भूमि पहले से धारा 9 के तहत सुरक्षित और विवादग्रस्त है। इस पर आनन-फानन में एक सितंबर 2025 के उस अवैध आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को फिर से पुराने मूल स्वरूप में ला दिया। सीजेएम अपने आदेश में लिखा कि जांच आख्या में दिया गया यह निष्कर्ष स्वीकार्य नहीं है कि संबंधित कर्मचारी/अधिकारी को पूर्व आदेश की जानकारी नहीं रही हो। संपूर्ण पत्रावली उन्हीं के अधिकार क्षेत्र में रहती है और कोई भी नया आदेश पारित करने से पूर्व पिछला रिकॉर्ड देखना अनिवार्य होता है।
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अदालत ने आगे कहा कि फर्जीवाड़ा पकड़े जाने के बाद आदेश को निरस्त कर देना ही यह साबित करता है कि संबंधित अधिकारियों द्वारा अपराध कारित किया गया है और अब इसे ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। चकबंदी विभाग में जिस तरह मनमाने तरीके से नाम चढ़ाए और काटे जा रहे हैं, उसकी पूरी सत्यता केवल पुलिस की निष्पक्ष विवेचना से ही सामने आ सकती है। सीजेएम कोर्ट ने थाना प्रभारी कोतवाली आदेश दिए कि वे उक्त तथ्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ लोक सेवक द्वारा अशुद्ध दस्तावेज तैयार करने और षड्यंत्र के तहत अविलंब रिपोर्ट दर्ज कर नियमानुसार विवेचना करें।
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