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Lalitpur News: भगवान नीलकंठेश्वर के दर्शन को चढ़नी पड़ती हैं एक सौ आठ सीढ़ियां

Fri, 01 Mar 2024 12:59 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 01 Mar 2024 12:59 AM IST
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One has to climb one hundred and eight steps to have darshan of Lord Neelkantheshwar.
अमर उजाला ब्यूरो
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ललितपुर-डोंगराखुर्द। विंध्याचल की वादियों में स्थित भगवान नीलकंठेश्वर की बलुआ पत्थर से बनी स्वनिर्मित चंदेल कालीन मूर्ति के दर्शन के लिए 108 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर तक जाना होता है। गर्भगृह में भगवान भोले अपने त्रिमुखी रूप में विराजमान हैं तो आंगन में खुले आसमान के नीचे नंदी की मूर्ति स्थापित है। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत श्रेणी पर स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर अद्भुत एवं अद्वितीय है। करीब 1300 साल पुराना चंदेल कालीन राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर आस्था का केंद्र है। यूं तो साल भर यहां धार्मिक कार्यक्रमों की धूम रहती है, लेकिन शिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। यह मंदिर अपनी कोख में हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता को छिपाए हुए है। मंदिर के पुजारी आजादपुरी महाराज ने कहा कि भोलेनाथ के दर्शन करने मात्र से भक्तों की मुराद पूरी हो जाती है।
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---------झरने का पानी बना देता है निरोगी
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर के नीचे झरना सालभर गिरता रहता है। गर्मी हो या सर्दी, इसका पानी कभी सूखता नहीं है। यह पानी कहां से आता है, इस बात की भी जानकारी कोई नहीं कर सका। मान्यता है कि इस पानी का लगातार सेवन करने वाले की काया हमेशा निरोगी बनी रहती है। पहाड़ों की कंदराओं से बहने वाला औषधीय गुणों से युक्त पानी यहां आने वाले लोगों की सारी थकान हर लेता है।
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---------शिव की त्रिमुखी मूर्ति के नीचे है एकमुखी ज्योतिर्लिंग
मंदिर में काले पत्थर पर भगवान की त्रिमुखी मूर्ति के दर्शन होते हैं। इस मूर्ति को नवमी-दशमी सदी में चंदेल कालीन राजाओं ने बनवाया था। इस मंदिर में शिखर नहीं है। इसका वास्तु शिल्प देखते ही बनता है। मंदिर में भगवान शिव की त्रिमुखी मूर्ति के नीचे फर्श पर एक मुखी ज्योतिर्लिंग स्थापित है। शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ का अर्ध नारीश्वर रूप मानते हैं। त्रिमुखी महेश की मूर्ति व एकमुखी ज्योतिर्लिंग का हिंदू धर्म शास्त्रों व पुराणों में विशेष महत्व बताया गया है।
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मूर्ति की विशेषता
मूर्ति के पृष्ठभाग पर कैलाश पर्वत को दर्शाया गया है। यहां शिवजी डमरू बजाते व हलाहल पीते दर्शाए गए हैं। बीच में विराट स्वरूप सदाशिव निबंध मुद्रा में दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला से जाप कर रहे हैं और बाएं हाथ में श्रीफल लिए हैं। वाम भाग में मां पार्वती हैं जो अपने एक हाथ में त्रिशूल लिए हैं। इस अद्भुत मूर्ति में कुल आठ हाथ हैं। इनमें दंड, हलाहल, डमरू, माला आईना, बिंदी, त्रिशूल और श्रीफल धारण किया हुआ है। यही वजह है कि आस्था के वशीभूत होकर श्रद्धालु यहां आते जाते रहते हैं।

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कैसे पहुंचें दर्शन करने
ललितपुर रेलवे स्टेशन से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। पाली कस्बे तक बसों की सुविधा भी उपलब्ध है। पाली बस स्टैंड पर उतर कर लगभग चार किलोमीटर दूर यह नीलकंठेश्वर मंदिर बना है। मगर, कस्बा पाली में रात्रि विश्राम का कोई साधन उपलब्ध नहीं है। इसलिए सुबह जाकर शाम को जिला मुख्यालय आना पड़ता है।
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