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कुपोषण से लड़ाई में नाकाफी साबित हो रही सरकारी खुराक
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एनआरसी महरौनी में इलाज कराने आई बच्ची
- फोटो : LALITPUR
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सिलावन (ललितपुर)। कुपोषण से लड़ाई में आंगनबाड़ी केंद्र से वितरित की जा रही सरकारी खुराक नाकाफी साबित हो रही है। इस कारण बच्चे कुपोषण से उबर नहीं पा रहे हैं। इससे आंगन में बच्चों की किलकारियां कम ही सुनने को मिलती हैं। हां, कुपोषित बच्चों के सिसकने की आवाज जरूर मन को द्रवित कर देती है। गांवों के कई बच्चे कुपोषण की त्रासदी झेलने को मजबूर हैं।
विकासखंड बिरधा के अंतर्गत ग्राम पंचायत खिरियाछतारा में कुपोषित बच्ची दीपाली की मां सुमन का कहना है कि बेटी दो वर्ष की होने के बाद भी चल नहीं सकती है और न बोल पाती है। वह बच्ची को पौष्टिक आहार नहीं दे पा रही है। सरकार द्वारा जो दिया जाता हैं, वह अपर्याप्त है। इसी गांव में मझली बहू की दो वर्षीय पुत्री साक्षी, अमरवती की दो पुत्रियां सात वर्षीय विनीता व छह वर्षीय पिंकी, गुलाब की पांच वर्षीय पुत्री सीमा, कमला का दस माह का पुत्र अभिषेक, सुरभि की ढाई वर्षीय पुत्री अनीता भी कुपोषण के शिकार हैं।
ग्राम खिरियाछतारा के बगल में ग्राम झरकोन के तीन बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यहां की आंगनबाड़ी सुमन बताती हैं कि केंद्र पर वजन नापने की मशीन नहीं होने से उन्हें बच्चों की सही स्थिति जांचने में परेशानी होती हैं। कुपोषण का असर नौनिहालों के हाथ और पैरों पर दिखता है। दरअसल, तंगहाली में जीवनयापन कर रहे गरीब ग्रामीण अपने बच्चों को भरपेट भोजन नहीं दे पाते हैं। इससे कुपोषण की स्थिति पैदा हो जाती है। आंगनबाड़ी केंद्र में कुपोषित बच्चों को पुष्टाहार उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन यह केंद्र बच्चों को पोषण दिलाने में नाकाम साबित हो रहे है।
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ऐसे पहचानें बच्चों में कुपोषण
कमजोर और दुर्बल शरीर में सांस लेने की दिक्कत होती है। ठंड अधिक लगती है और थकान हो जाती है। बार-बार संक्रमण का खतरा रहता है। लड़का - लड़की में भेदभाव, मां का कुपोषित होना, कम उम्र में शादी, गंदे वातावरण में रहना और पाचन समस्या होना कुपोषण का कारण है।
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इनसे मिलता पौष्टिक आहार
कुपोषण से बचने के लिए अंकुरित चना, दूध, दही, फल, सब्जियां, सूखे मेवा, अंडा आदि आहार दिए जाते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों पर कुपोषित बच्चों को डेढ़ किलो चावल व ढाई किलो गेहूं ही मिल रहा है, जो कुपोषण को दूर करने में नाकाफी है।
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एनआरसी पर 1137 का उपचार
विकासखंड महरौनी में अति कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए छह पलंग का एनआरसी शुरू किया गया था। एक वर्ष में यहां 1,137 अति कुपोषित बच्चों का इलाज किया गया। बच्चों को दूध, दलिया, हलवा, खिचड़ी आदि हर दो- दो घंटे में दिया जाता है। बच्चे की मां को तीन बार भोजन देने की सुविधा है। इसके अलावा 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।
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जिले में कुपोषित बच्चे
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक जिले में 351 कुपोषित बच्चे और 718 अति कुपोषित बच्चे हैं। इनमें से 35 अति कुपोषित बच्चों को अस्पताल के एनआरसी में उपचार के लिए भर्ती कराया गया है।
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स्वास्थ्य परीक्षण के बाद चिह्नित कुपोषित बच्चों को गेहूं, चावल व दाल वितरित की जाती है। आंगनबाड़ी कर्मियों द्वारा बच्चे के माता-पिता को पौष्टिक आहार दिए जाने की सलाह दी जाती है।
- पुष्पा वर्मा
जिला कार्यक्रम अधिकारी
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विकासखंड बिरधा के अंतर्गत ग्राम पंचायत खिरियाछतारा में कुपोषित बच्ची दीपाली की मां सुमन का कहना है कि बेटी दो वर्ष की होने के बाद भी चल नहीं सकती है और न बोल पाती है। वह बच्ची को पौष्टिक आहार नहीं दे पा रही है। सरकार द्वारा जो दिया जाता हैं, वह अपर्याप्त है। इसी गांव में मझली बहू की दो वर्षीय पुत्री साक्षी, अमरवती की दो पुत्रियां सात वर्षीय विनीता व छह वर्षीय पिंकी, गुलाब की पांच वर्षीय पुत्री सीमा, कमला का दस माह का पुत्र अभिषेक, सुरभि की ढाई वर्षीय पुत्री अनीता भी कुपोषण के शिकार हैं।
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ग्राम खिरियाछतारा के बगल में ग्राम झरकोन के तीन बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यहां की आंगनबाड़ी सुमन बताती हैं कि केंद्र पर वजन नापने की मशीन नहीं होने से उन्हें बच्चों की सही स्थिति जांचने में परेशानी होती हैं। कुपोषण का असर नौनिहालों के हाथ और पैरों पर दिखता है। दरअसल, तंगहाली में जीवनयापन कर रहे गरीब ग्रामीण अपने बच्चों को भरपेट भोजन नहीं दे पाते हैं। इससे कुपोषण की स्थिति पैदा हो जाती है। आंगनबाड़ी केंद्र में कुपोषित बच्चों को पुष्टाहार उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन यह केंद्र बच्चों को पोषण दिलाने में नाकाम साबित हो रहे है।
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ऐसे पहचानें बच्चों में कुपोषण
कमजोर और दुर्बल शरीर में सांस लेने की दिक्कत होती है। ठंड अधिक लगती है और थकान हो जाती है। बार-बार संक्रमण का खतरा रहता है। लड़का - लड़की में भेदभाव, मां का कुपोषित होना, कम उम्र में शादी, गंदे वातावरण में रहना और पाचन समस्या होना कुपोषण का कारण है।
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इनसे मिलता पौष्टिक आहार
कुपोषण से बचने के लिए अंकुरित चना, दूध, दही, फल, सब्जियां, सूखे मेवा, अंडा आदि आहार दिए जाते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों पर कुपोषित बच्चों को डेढ़ किलो चावल व ढाई किलो गेहूं ही मिल रहा है, जो कुपोषण को दूर करने में नाकाफी है।
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एनआरसी पर 1137 का उपचार
विकासखंड महरौनी में अति कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए छह पलंग का एनआरसी शुरू किया गया था। एक वर्ष में यहां 1,137 अति कुपोषित बच्चों का इलाज किया गया। बच्चों को दूध, दलिया, हलवा, खिचड़ी आदि हर दो- दो घंटे में दिया जाता है। बच्चे की मां को तीन बार भोजन देने की सुविधा है। इसके अलावा 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।
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जिले में कुपोषित बच्चे
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक जिले में 351 कुपोषित बच्चे और 718 अति कुपोषित बच्चे हैं। इनमें से 35 अति कुपोषित बच्चों को अस्पताल के एनआरसी में उपचार के लिए भर्ती कराया गया है।
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स्वास्थ्य परीक्षण के बाद चिह्नित कुपोषित बच्चों को गेहूं, चावल व दाल वितरित की जाती है। आंगनबाड़ी कर्मियों द्वारा बच्चे के माता-पिता को पौष्टिक आहार दिए जाने की सलाह दी जाती है।
- पुष्पा वर्मा
जिला कार्यक्रम अधिकारी

खिरिया छतारा में कुपोषित बच्चे- फोटो : LALITPUR

कुपोषित दीपाली अपनी मां सुमन के साथ- फोटो : LALITPUR