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Mother's Day: एक ने पति को खोने के बाद संभाला परिवार, तो दूसरे ने दुकान चलाकर बेटी को बनाया असिस्टेंट कमिश्नर
Sun, 10 May 2026 12:38 PM IST
दीपक महाजन
अमर उजाला नेटवर्क, ललितपुर
अमर उजाला नेटवर्क, ललितपुर
Published by: दीपक महाजन
Updated Sun, 10 May 2026 12:38 PM IST
सार
मातृ दिवस पर ललितपुर की दो मां की प्रेरक कहानियां, जो संघर्ष, समर्पण और ममता की मिसाल हैं। विपरीत परिस्थितियों में इन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और अपने बच्चों की परवरिश के लिए मां के साथ पिता की भूमिका भी निभाई।
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शहीद की पत्नी संध्या अपने बच्चों के साथ व ममता जैन अपने बेटी के साथ।
- फोटो : संवाद
विस्तार
मां का प्यार, त्याग और संघर्ष शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। बच्चों की खुशी और भविष्य के लिए मां हर कठिनाई का सामना कर लेती है। जनपद में कई ऐसी माताएं हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी और अपने बच्चों की परवरिश के लिए मां के साथ पिता की भूमिका भी निभाई। मातृ दिवस पर पेश हैं ऐसी ही दो प्रेरक कहानियां, जो संघर्ष, समर्पण और ममता की मिसाल हैं।
शहीद की पत्नी संध्या ने नहीं टूटने दिया बच्चों का हौसला
महरौनी तहसील क्षेत्र के ग्राम सौजना निवासी संध्या सिंह की जिंदगी संघर्षों से भरी रही है। वर्ष 2011 में उनकी शादी सेना में तैनात चरन सिंह से हुई थी। वर्ष 2019 में लंबे इंतजार और मन्नतों के बाद उनके घर जुड़वा बेटा और बेटी ने जन्म लिया। परिवार खुशियों से भर गया था। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए संध्या गांव में रहने लगीं, जबकि चरन सिंह सेना में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे। इसी बीच 23 दिसंबर 2022 को सिक्किम में हुए हादसे में हवलदार चरन सिंह समेत 16 जवानों के शहीद होने की खबर आई। यह खबर परिवार के लिए बड़ा सदमा थी। पति के शहीद होने के बाद संध्या ने खुद को टूटने नहीं दिया। बच्चों के भविष्य के लिए उन्होंने हिम्मत जुटाई और आगे बढ़ने का फैसला किया। प्रदेश सरकार ने उन्हें सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय, ललितपुर में तैनाती दी। आज वह शहर में किराये के मकान में रहकर बेटे शुभ और बेटी नव्या की पढ़ाई करवा रही हैं। दोनों बच्चे इस वर्ष कक्षा एक में पहुंचे हैं। संध्या कहती हैं कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके दोनों बच्चे बड़े होकर भारतीय सेना में जाएं और देश सेवा करें।
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शहीद की पत्नी संध्या ने नहीं टूटने दिया बच्चों का हौसला
महरौनी तहसील क्षेत्र के ग्राम सौजना निवासी संध्या सिंह की जिंदगी संघर्षों से भरी रही है। वर्ष 2011 में उनकी शादी सेना में तैनात चरन सिंह से हुई थी। वर्ष 2019 में लंबे इंतजार और मन्नतों के बाद उनके घर जुड़वा बेटा और बेटी ने जन्म लिया। परिवार खुशियों से भर गया था। बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए संध्या गांव में रहने लगीं, जबकि चरन सिंह सेना में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे। इसी बीच 23 दिसंबर 2022 को सिक्किम में हुए हादसे में हवलदार चरन सिंह समेत 16 जवानों के शहीद होने की खबर आई। यह खबर परिवार के लिए बड़ा सदमा थी। पति के शहीद होने के बाद संध्या ने खुद को टूटने नहीं दिया। बच्चों के भविष्य के लिए उन्होंने हिम्मत जुटाई और आगे बढ़ने का फैसला किया। प्रदेश सरकार ने उन्हें सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय, ललितपुर में तैनाती दी। आज वह शहर में किराये के मकान में रहकर बेटे शुभ और बेटी नव्या की पढ़ाई करवा रही हैं। दोनों बच्चे इस वर्ष कक्षा एक में पहुंचे हैं। संध्या कहती हैं कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके दोनों बच्चे बड़े होकर भारतीय सेना में जाएं और देश सेवा करें।
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दुकान में बेटी के साथ बैठी ममता।
- फोटो : संवाद
परचून की दुकान से बेटी को बनाया असिस्टेंट कमिश्नर
मड़ावरा कस्बा निवासी ममता जैन ने भी संघर्ष और मेहनत से अपने बच्चों के सपनों को नई उड़ान दी। वर्ष 2021 में कोरोना काल के दौरान उनके पति सुनील जैन का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। सीमित संसाधनों के बावजूद ममता ने हार नहीं मानी। घर संभालने के साथ उन्होंने परचून की दुकान चलाई और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। मां के संघर्ष और समर्पण ने बेटी हिमांशी को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। ममता जैन ने बताया कि बेटी का सपना पीसीएस अधिकारी बनने का था। इसके लिए उन्होंने हिमांशी को दिल्ली में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाई। लगातार मेहनत और मां के संघर्ष का परिणाम यह रहा कि हिमांशी ने पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर असिस्टेंट कमिश्नर का पद हासिल किया। ममता आज भी अपनी दो बेटियों और एक बेटे की पढ़ाई पूरी जिम्मेदारी के साथ करवा रही हैं।
रिपोर्ट: राजीव शुक्ला
मड़ावरा कस्बा निवासी ममता जैन ने भी संघर्ष और मेहनत से अपने बच्चों के सपनों को नई उड़ान दी। वर्ष 2021 में कोरोना काल के दौरान उनके पति सुनील जैन का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। सीमित संसाधनों के बावजूद ममता ने हार नहीं मानी। घर संभालने के साथ उन्होंने परचून की दुकान चलाई और बच्चों की पढ़ाई जारी रखी। मां के संघर्ष और समर्पण ने बेटी हिमांशी को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। ममता जैन ने बताया कि बेटी का सपना पीसीएस अधिकारी बनने का था। इसके लिए उन्होंने हिमांशी को दिल्ली में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाई। लगातार मेहनत और मां के संघर्ष का परिणाम यह रहा कि हिमांशी ने पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर असिस्टेंट कमिश्नर का पद हासिल किया। ममता आज भी अपनी दो बेटियों और एक बेटे की पढ़ाई पूरी जिम्मेदारी के साथ करवा रही हैं।
रिपोर्ट: राजीव शुक्ला