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आस्था का केंद्र है कुटी धाम का हनुमान मंदिर एवं प्राचीन शिवलिंग
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कुटीधाम का प्राचीन शिवलिंग।
- फोटो : LALITPUR
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मड़ावरा (ललितपुर)। तहसील मड़ावरा से पूर्व दिशा में लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्राम बढ़वार के कुटिहार में बंडई नदी के किनारे प्राचीन दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर स्थित है। नदी के अंदर एक विशाल कुंड है, जिसे महादेव कुंड के नाम से जाना जाता है। महादेव कुंड के किनारे स्थित दिव्य शिवलिंग है। बताया जाता है कि इस पाषाण शिवलिंग का उद्भव नदी में खड़े विशाल अर्जुन के वृक्ष से हुआ था।
यहां महंत आनंद गिरि महाराज ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार आश्रम से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित प्राचीन सिद्ध क्षेत्र पंडवन धाम पर लगभग 17वीं शताब्दी में संत अमरदास रहा करते थे। भोलेनाथ ने उन्हें एक रात स्वप्न में बताया कि गर्रोलीमाफ गांव के मध्य कुटिहार में बंडई नदी के तट पर खड़े अर्जुन के पेड़ में वह अदृश्य रूप से स्थापित हैं और अब प्रकट होना चाहते हैं। संत अमर नाथ गांव वालों के साथ वहां पहुंचे। हवन यज्ञ कर जैसे ही अर्जुन का पेड़ काटा गया तो पिंडी के रूप में शिवलिंग दिखाई दिया। शंका समाधान के लिए ग्रामीणों ने जब पेड़ को वहां से हटाया तो पत्थर की करीब पांच फीट की गहराई तक पिंडी निकलती गई। चबूतरा निर्माण के साथ पिंडी को वहीं प्रतिष्ठापित किया गया जो अब भी मौजूद है और धीरे-धीरे आकार को स्वत: बढ़ता जा रहा है।
कुंड का जल छिड़कने से फसलों पर नहीं लगते कीट पतंगे
मान्यता है कि यहां के जलकुंड का जल किसान खेतों में ले जाकर छिड़कते हैं तो फसलों पर कीट पतंगों का प्रकोप नही होता। मंदिर तक पहुंचने वाला मार्ग कंकरीला-पथरीला और पगडंडियों के रूप में है। श्रद्धालु यहां आसानी से नहीं पहुंच सकते। मार्ग निर्माण और विद्युत व्यवस्था यहां के विकास में बाधक हैं। अगर मार्ग निर्माण और बिजली पानी की व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाए तो यह सिद्ध क्षेत्र पर्यटन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा।
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यहां महंत आनंद गिरि महाराज ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार आश्रम से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित प्राचीन सिद्ध क्षेत्र पंडवन धाम पर लगभग 17वीं शताब्दी में संत अमरदास रहा करते थे। भोलेनाथ ने उन्हें एक रात स्वप्न में बताया कि गर्रोलीमाफ गांव के मध्य कुटिहार में बंडई नदी के तट पर खड़े अर्जुन के पेड़ में वह अदृश्य रूप से स्थापित हैं और अब प्रकट होना चाहते हैं। संत अमर नाथ गांव वालों के साथ वहां पहुंचे। हवन यज्ञ कर जैसे ही अर्जुन का पेड़ काटा गया तो पिंडी के रूप में शिवलिंग दिखाई दिया। शंका समाधान के लिए ग्रामीणों ने जब पेड़ को वहां से हटाया तो पत्थर की करीब पांच फीट की गहराई तक पिंडी निकलती गई। चबूतरा निर्माण के साथ पिंडी को वहीं प्रतिष्ठापित किया गया जो अब भी मौजूद है और धीरे-धीरे आकार को स्वत: बढ़ता जा रहा है।
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कुंड का जल छिड़कने से फसलों पर नहीं लगते कीट पतंगे
मान्यता है कि यहां के जलकुंड का जल किसान खेतों में ले जाकर छिड़कते हैं तो फसलों पर कीट पतंगों का प्रकोप नही होता। मंदिर तक पहुंचने वाला मार्ग कंकरीला-पथरीला और पगडंडियों के रूप में है। श्रद्धालु यहां आसानी से नहीं पहुंच सकते। मार्ग निर्माण और विद्युत व्यवस्था यहां के विकास में बाधक हैं। अगर मार्ग निर्माण और बिजली पानी की व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाए तो यह सिद्ध क्षेत्र पर्यटन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा।

महंत आनंद गिरि महाराज।- फोटो : LALITPUR
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