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कस्बे में अगाध श्रद्धा से मना जश्ने गौसुलवरा
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कस्बा बानपुर में जश्ने गौसे आजम (ग्यारहवी शरीफ) के जुलूस में शामिल लोग
- फोटो : LALITPUR
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बानपुर। कस्बा में जश्ने गौसे आजम (ग्यारहवीं शरीफ) का पर्व बृहस्पतिवार को परंपरागत तरीके से मनाया गया। इस अवसर पर मदरसा फैजुल इस्लाम के छात्रों ने जुलूस-ए-गौसिया निकाला। जुलूस का स्वागत गांव के कई समाजसेवियों ने किया। जुलूस प्रमुख मार्गों से होकर जामा मस्जिद में खत्म हुआ।
जश्न-ए-गौसे आजम पर लोगों ने अपने घरों व कस्बे के मुख्य मार्ग को आकर्षक तरीके से सजाया था। जुलूस जामा मस्जिद से करीब तीन बजे शुरू होकर मुख्य बाजार, बस स्टैंड, नई बस्ती, आजादपुरा, बड़ा इमाम चौक, छोटा बड़ा जैन मंदिर, किले का मैदान, सानियन मुहल्ला, सहरिया बस्ती, मुस्लिम मुहल्ला और मुख्य बाजार से होता हुआ जामा मस्जिद आकर संपन्न हुआ। इस दौरान छात्र नात पढ़ते हुए चल रहे थे। उत्साही युवक हाथों से परचम लेकर हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए चल रहे थे। रात में उलमा ने तकरीर की, जिसमें लोगों को गौस-ए-आजम के द्वारा बताए गए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। इस मौके पर सदर अख्तर पठान, अनीस खां मंसूरी, हाजी कलीम खां, अब्दुल खां, अलीम खां, अंसार पठान, आमिर खान मंसूरी ,गफ्फार खां, इदरीस खां, इब्बू लंबरदार, इकबाल खां, फिरोज मंसूरी, लईक खां, मतीन शेख, आरिफ खां मंसूरी, अमजद मंसूरी, अतीक खां, मतू, इश्तियाक खां, इसरार खां, शमशाद खां, शकील खां, मजीद शाह, करीम शाह, अबरार खां मौजूद रहे।
इसलिए मनाते हैं त्योहार
इस्लामी कैलेंडर के चौथे महीने माहे रबीउल आखिर की ग्यारह तारीख के मुबारक मौके पर मुस्लिम इस पर्व को परंपरागत रुप से मनाते हैं। इसी तारीख को हजरत अब्दुल कादिर जीलानी बड़े पीर साहब की पैदाइश हुई थी। इसीलिए उनकी याद में जलसे और जुलूस निकलते हैं।
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जश्न-ए-गौसे आजम पर लोगों ने अपने घरों व कस्बे के मुख्य मार्ग को आकर्षक तरीके से सजाया था। जुलूस जामा मस्जिद से करीब तीन बजे शुरू होकर मुख्य बाजार, बस स्टैंड, नई बस्ती, आजादपुरा, बड़ा इमाम चौक, छोटा बड़ा जैन मंदिर, किले का मैदान, सानियन मुहल्ला, सहरिया बस्ती, मुस्लिम मुहल्ला और मुख्य बाजार से होता हुआ जामा मस्जिद आकर संपन्न हुआ। इस दौरान छात्र नात पढ़ते हुए चल रहे थे। उत्साही युवक हाथों से परचम लेकर हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए चल रहे थे। रात में उलमा ने तकरीर की, जिसमें लोगों को गौस-ए-आजम के द्वारा बताए गए रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित किया। इस मौके पर सदर अख्तर पठान, अनीस खां मंसूरी, हाजी कलीम खां, अब्दुल खां, अलीम खां, अंसार पठान, आमिर खान मंसूरी ,गफ्फार खां, इदरीस खां, इब्बू लंबरदार, इकबाल खां, फिरोज मंसूरी, लईक खां, मतीन शेख, आरिफ खां मंसूरी, अमजद मंसूरी, अतीक खां, मतू, इश्तियाक खां, इसरार खां, शमशाद खां, शकील खां, मजीद शाह, करीम शाह, अबरार खां मौजूद रहे।
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इसलिए मनाते हैं त्योहार
इस्लामी कैलेंडर के चौथे महीने माहे रबीउल आखिर की ग्यारह तारीख के मुबारक मौके पर मुस्लिम इस पर्व को परंपरागत रुप से मनाते हैं। इसी तारीख को हजरत अब्दुल कादिर जीलानी बड़े पीर साहब की पैदाइश हुई थी। इसीलिए उनकी याद में जलसे और जुलूस निकलते हैं।
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