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जहां नजर घुमाओ, भीड़ ही भीड़ नजर आई

Fri, 22 May 2020 01:00 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 22 May 2020 01:00 AM IST
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huge crowd of workers gathered at amjhara border
अमझरा गोशाला में बस से जाने के लिए लगी लोगों की भीड़ - फोटो : LALITPUR
डोंगराखुर्द। जिले के बार्डर अमझरा घाटी पर मजदूरों की बढ़ोतरी हर दिन हो रही है। प्रशासन द्वारा मजदूरों को लगातार भिजवाजा जा रहा है, लेकिन महानगरों से आने वाले मजदूरों का सिलसिला जारी है। हजारों की संख्या में मजदूर अमझरा गोशाला में पहुंच रहे हैं, जहां नजर घुमाओ, वहीं पर लोगों की भीड़ दिखाईं पड़ रही है। भीषण गर्मी में लोगों के लिए गोशाला सहारा बनी हुई है।
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बृहस्पतिवार को सुबह से लेकर शाम तक भीड़ आती रही। गोशाला में जगह कम पड़ गई तो लोगों ने चटाई, चादर और कंबलों के सहारे धूप बचाई। पेड़ो में पतझड़ होने छाया की समस्या है। गर्म हवा और तेज धूप में वृद्ध, महिला, पुरुष और मासूम बच्चों का बुरा हाल है। कोरोना वायरस से बचाव हेतु लॉकडाउन होने के बाद शहरों में फंसे श्रमिकों के हालात बदतर हो गए हैं। एकाएक ट्रेनों के ठप होने, बसों के बंद होने के बाद जो जहां मजदूर था, वहीं फंसकर रह गया।
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परेशान मजदूर अब अपने वतन की ओर लौट रहे हैं, कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल रहे हैं। दिन रात का सफर कर रहे हैं। कहीं सोए, कहीं कुछ मिला तो खाया नहीं तो पानी पीकर चलते रहे। गर्मी से मासूम बच्चों का बुरा हाल है।
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डिजिटल इंडिया के भारत में पैदल चलते मजदूरों की इस हालत की परिकल्पना किसी ने नहीं की होगी। मजदूरों की समस्या इतनी विकराल हो जाएगी, इसका अंदाजा नहीं था। यही वजह है कि मजदूर दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। शहरों से गांव को वापस पैदल चलने वाले श्रमिकों के पैरों में छाले पड़ गए हैं। हजारों की संख्या में मजदूर उप्र और मप्र के बार्डर अमझरा घाटी पर फंसे हुए हैं। मजदूरों को घर पहुंचने की जल्दी है, पर जितनी जल्दी वह सोच रहे हैं, उतनी जल्दी मुमकिन होता नजर नहीं आ रहा है।
दिव्यांग तीन किलोमीटर पैदल चला
मुहम्मद नियाज ने बताया कि दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। मुंबई में एक फैक्टरी में छह हजार रुपये महीने पर काम करता था। अमझरा बार्डर से ट्रक में बैठा था। ट्रक ड्राइवर ने कुछ दूर चलकर किराया मांगा तो पैसा नहीं था। इस पर ड्राइवर ने नीचे उतार दिया। ऐसी भीषण गर्मी और तेज धूप में तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। अब मुझे बिहार जाना है।
साहब! अबकी बार घर भेज दो
मुहम्मद असील ने बताया कि महाराष्ट्र के भीममंडी में काम करता था। जो कमाया वह खर्च हो गया। घर से पैसा मंगवाया तो बहुत कष्ट हुआ। जब तक जीएंगे, तक तक नहीं भूल पाएंगें। अपने घर से बाहर जाकर कभी काम नहीं करेंगे, चाहे भीख मांग लेंगे। बिहार के मधुवनी जिला जाना है।
बहुत परेशान किया
संसुल ने बताया कि भीममंडी में करीब पांच लाख मजदूर काम करते थे। इनमें ज्यादातर बिहार के हैं। वहां पर कई बार नाम और पता लिखवाया गया। एक महीने लगातार कागज भरते रहे, लेकिन कोई साधन नहीं मिला। 24 लोग किराया देकर यहां आए हैं। अब बिहार के मधुवनी जिला जाना है।

12 बसें प्रवासियों को लेकर गृह जनपदों में भेजी गई हैं। करीब साठ बसें और जाएंगी। गर्भवती महिलाओं को बसों में सुरक्षित बैठाया जा रहा है। छोटे बच्चों को दूध की व्यवस्था की गई है। मजदूरों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है।
- फूलसिंह, पुलिस क्षेत्राधिकारी पाली।
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