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देवामाता: मंत्रों से माता की होती है साधना
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। आध्यात्मिक महत्व की साधना स्थली देवामाता प्राचीन मंदिर है। यहां वर्ष 1987 में धर्मक्षेत्र की सीमा विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ हो चुका है। यह यज्ञ उसी तरीके से किया गया था, जैसे भगवान राम ने अपने राज्य की सीमा विस्तार के लिए किया था।
जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर झांसी मार्ग पर तेरई फाटक तिराहा है। वहां से तीन किलोमीटर अंदर जाने पर देवामाता तीर्थक्षेत्र है। रेलमार्ग से बिजरौठन स्टेशन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। तिपहिया वाहन भी हाईवे से चलते हैं। देवामाता में मातादुर्गा के 108 स्वरूपों में 32वां स्वरूप स्थापित है। सन् 1980 में फक्कड़ बाबा नाम के संत यहां आए। उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार कराते हुए भव्य मंदिर व द्वार का निर्माण कराया। यहां सिरेमिक टाइल्स के टुकड़ों से दीवारों की सुंदर चित्रकारी की गई है। मंदिर का मुख्य नारा माता-पिता की जय है। इसे मंदिर में हर जगह टाइल्स के टुकड़ों से सजाकर लिखा गया है। नवरात्र के समय यहां हजाराें लोग दर्शन करने आते हैं।
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यहां अन्य मंदिर भी हैं स्थापित
देवामाता में मूल मूर्ति के अलावा, भगवान शंकर, ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, राधाकृष्ण, हनुमान, कालभैरव, राम दरबार, काली माता, सरस्वती माता, यहां नौ देवियों का वास्तु शुद्ध मंदिर भी बना है। यही नहीं नौ देवी मंदिर के गर्भगृह के नीचे तलघर में महाकाल की प्रतिमूर्ति की स्थापना की गई है। इसके दर्शन के लिए एक खिड़की बनाई गई है।
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वेदशाला भी है स्थापित
मंदिर परिसर में भव्य वेदशाला का निर्माण किया गया है, जहां चारों वेदों के अलावा उपवेद, पुराण और उपनिषद आदि शास्त्रों का संग्रह है।
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तंत्रविद्या के साधक इस स्थान को मानते हैं उपयुक्त
मां काली के साधक तंत्र विद्या की साधना के लिए इस स्थान को उपयुक्त मानते हैं। यहां का वातावरण साधना के उपयुक्त है।
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ललितपुर। आध्यात्मिक महत्व की साधना स्थली देवामाता प्राचीन मंदिर है। यहां वर्ष 1987 में धर्मक्षेत्र की सीमा विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ हो चुका है। यह यज्ञ उसी तरीके से किया गया था, जैसे भगवान राम ने अपने राज्य की सीमा विस्तार के लिए किया था।
जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर झांसी मार्ग पर तेरई फाटक तिराहा है। वहां से तीन किलोमीटर अंदर जाने पर देवामाता तीर्थक्षेत्र है। रेलमार्ग से बिजरौठन स्टेशन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। तिपहिया वाहन भी हाईवे से चलते हैं। देवामाता में मातादुर्गा के 108 स्वरूपों में 32वां स्वरूप स्थापित है। सन् 1980 में फक्कड़ बाबा नाम के संत यहां आए। उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार कराते हुए भव्य मंदिर व द्वार का निर्माण कराया। यहां सिरेमिक टाइल्स के टुकड़ों से दीवारों की सुंदर चित्रकारी की गई है। मंदिर का मुख्य नारा माता-पिता की जय है। इसे मंदिर में हर जगह टाइल्स के टुकड़ों से सजाकर लिखा गया है। नवरात्र के समय यहां हजाराें लोग दर्शन करने आते हैं।
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यहां अन्य मंदिर भी हैं स्थापित
देवामाता में मूल मूर्ति के अलावा, भगवान शंकर, ब्रह्मा, विष्णु, गणेश, राधाकृष्ण, हनुमान, कालभैरव, राम दरबार, काली माता, सरस्वती माता, यहां नौ देवियों का वास्तु शुद्ध मंदिर भी बना है। यही नहीं नौ देवी मंदिर के गर्भगृह के नीचे तलघर में महाकाल की प्रतिमूर्ति की स्थापना की गई है। इसके दर्शन के लिए एक खिड़की बनाई गई है।
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वेदशाला भी है स्थापित
मंदिर परिसर में भव्य वेदशाला का निर्माण किया गया है, जहां चारों वेदों के अलावा उपवेद, पुराण और उपनिषद आदि शास्त्रों का संग्रह है।
तंत्रविद्या के साधक इस स्थान को मानते हैं उपयुक्त
मां काली के साधक तंत्र विद्या की साधना के लिए इस स्थान को उपयुक्त मानते हैं। यहां का वातावरण साधना के उपयुक्त है।