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क्राइम: किसानों के साथ छल में फसेंगे कई और अफसर
Updated Fri, 16 Feb 2018 01:52 AM IST
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किसान बीमा में घोटालेबाज अफसरों पर कसेगा शिकंजा
ललितपुर।
शहर क्षेत्र की गल्लामंडी स्थित एसबीआई शाखा में किसान बीमा राशि का करोड़ों का गबन करने के मामले में भले ही विभागीय जांच अभी चल रही हो, लेकिन इस जांच में बैंक के कई बड़े अधिकारियों के फंसने की संभावना है। हालांकि बैंक के अधिकारी अभी भी कुछ कहने से कतरा रहे हैं और जांच होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं। हालांकि इस घोटाले में तमाम कमियां सामने आई हैं।
गौरतलब हो कि जिले के किसान पिछले चार सालों से प्रकृति की मार झेलते चले आ रहे हैं। ऐसे में प्रदेश सरकार की ओर से जिले को सूखा ग्रस्त भी घोषित किया गया। इसके साथ ही केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना किसान बीमा के अंतर्गत किसानों को फसल खराब होने का मुआवजा दिया जाता है। सरकार की ओर से मुआवजा आने के बाद भी किसानों के पास रुपये न पहुंचने से कई बार किसानों ने प्रदर्शन किया और मुआवजे की मांग की। लेकिन लाख प्रदर्शनों के बाद भी किसानों को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हो सकी। ऐसे में यह मामला सामने आने के बाद किसानों को प्रशासन की ओर से निष्पक्ष जांच की उम्मीद बढ़ गई है। यह घोटाला किस समय का है और इसकी राशि कितनी है इसके बारे में शाखा प्रबंधक शिवेंद्र मिश्रा ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया है।
ऐसे पकड़ में आया मामला
जानकारी के अनुसार यह पूरा घोटाला 2014 से लेकर 2017 के बीच का है। इस बीच बैंक का ऑडिट भी होता रहा, लेकिन मामला पकड़ में नहीं आ सका। एक सितंबर 2017 को तत्कालीन बैंक मैनेजर के रिटायर होने के बाद मेन ब्रांच में तैनात गिरीश कुमार खरे में शाखा प्रबंधक के तौर पर कार्यभार संभाला और यह मामला मिलने पर तत्काल उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को अवगत करवाया। उच्चाधिकारियों ने इस मामले की पड़ताल की तो मामला सही पाए जाने पर जांच शुरू कर दी। वहीं, इस मामले में तत्कालीन प्रबंधक के साथ कुछ व्यापारियों की मिलीभगत होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि तत्कालीन प्रबंधक का गृहजनपद ललितपुर ही होने के कारण कुछ खास लोगों के साथ मिलकर इसको अंजाम दिया गया होगा।
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दो लोग बाहर के भी शामिल
करोड़ों रुपये के घोटाले में सिर्फ बैंक कर्मचारी ही नहीं बल्कि बाहर के भी कुछ लोग शामिल हो सकते हैं। गौरतलब हो कि अधिक मात्रा में डाटा होने की स्थिति में बैंक बाहर से कुछ लोगों को बुलाकर उनके माध्यम से डाटा फीडिंग का कार्य करवाती है। बैंकिंग कर्मचारियों की मानें तो इस मामले में भी दो बाहरी लोगों की संलिप्तता है। इनके द्वारा ही पूरे डाटा को फीड किया गया और घालमेल किया गया। इसमें एक व्यक्ति जेनरेटर का कार्य करता है और दूसरा कंप्यूटर ऑपरेटर है।
बैंकर्स चेक बने सहारा
किसानों के साथ धोखाधड़ी के मामले में बैंक के कर्मचारियों ने किसानों के लिए आई राशि में गड़बड़ी की है। इसके लिए निर्धारित धनराशि से कम राशि को किसान के खाते में पहुंचाया और बची हुई अतिरिक्त राशि को बैंकर्स चेक के माध्यम से किसी अन्य खाते में पहुंचा दिया गया। इसके अतिरिक्त सीधे कुछ लोगों के खाते में भी रुपये पहुंचा दिए गए, जो किसान नहीं थे। इसके अलावा ऋण मोचन के कार्यक्रम में भी इसी की तर्ज पर किसानों को प्रलोभन देकर उनकी ऋण की राशि माफ करने का आश्वासन देकर किसानों के खाते में अतिरिक्त रुपये पहुंचा दिए गए और अतिरिक्त रुपयों को बाद में किसानों से ले लिया गया।
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ललितपुर।
शहर क्षेत्र की गल्लामंडी स्थित एसबीआई शाखा में किसान बीमा राशि का करोड़ों का गबन करने के मामले में भले ही विभागीय जांच अभी चल रही हो, लेकिन इस जांच में बैंक के कई बड़े अधिकारियों के फंसने की संभावना है। हालांकि बैंक के अधिकारी अभी भी कुछ कहने से कतरा रहे हैं और जांच होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं। हालांकि इस घोटाले में तमाम कमियां सामने आई हैं।
गौरतलब हो कि जिले के किसान पिछले चार सालों से प्रकृति की मार झेलते चले आ रहे हैं। ऐसे में प्रदेश सरकार की ओर से जिले को सूखा ग्रस्त भी घोषित किया गया। इसके साथ ही केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना किसान बीमा के अंतर्गत किसानों को फसल खराब होने का मुआवजा दिया जाता है। सरकार की ओर से मुआवजा आने के बाद भी किसानों के पास रुपये न पहुंचने से कई बार किसानों ने प्रदर्शन किया और मुआवजे की मांग की। लेकिन लाख प्रदर्शनों के बाद भी किसानों को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हो सकी। ऐसे में यह मामला सामने आने के बाद किसानों को प्रशासन की ओर से निष्पक्ष जांच की उम्मीद बढ़ गई है। यह घोटाला किस समय का है और इसकी राशि कितनी है इसके बारे में शाखा प्रबंधक शिवेंद्र मिश्रा ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया है।
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ऐसे पकड़ में आया मामला
जानकारी के अनुसार यह पूरा घोटाला 2014 से लेकर 2017 के बीच का है। इस बीच बैंक का ऑडिट भी होता रहा, लेकिन मामला पकड़ में नहीं आ सका। एक सितंबर 2017 को तत्कालीन बैंक मैनेजर के रिटायर होने के बाद मेन ब्रांच में तैनात गिरीश कुमार खरे में शाखा प्रबंधक के तौर पर कार्यभार संभाला और यह मामला मिलने पर तत्काल उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को अवगत करवाया। उच्चाधिकारियों ने इस मामले की पड़ताल की तो मामला सही पाए जाने पर जांच शुरू कर दी। वहीं, इस मामले में तत्कालीन प्रबंधक के साथ कुछ व्यापारियों की मिलीभगत होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि तत्कालीन प्रबंधक का गृहजनपद ललितपुर ही होने के कारण कुछ खास लोगों के साथ मिलकर इसको अंजाम दिया गया होगा।
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दो लोग बाहर के भी शामिल
करोड़ों रुपये के घोटाले में सिर्फ बैंक कर्मचारी ही नहीं बल्कि बाहर के भी कुछ लोग शामिल हो सकते हैं। गौरतलब हो कि अधिक मात्रा में डाटा होने की स्थिति में बैंक बाहर से कुछ लोगों को बुलाकर उनके माध्यम से डाटा फीडिंग का कार्य करवाती है। बैंकिंग कर्मचारियों की मानें तो इस मामले में भी दो बाहरी लोगों की संलिप्तता है। इनके द्वारा ही पूरे डाटा को फीड किया गया और घालमेल किया गया। इसमें एक व्यक्ति जेनरेटर का कार्य करता है और दूसरा कंप्यूटर ऑपरेटर है।
बैंकर्स चेक बने सहारा
किसानों के साथ धोखाधड़ी के मामले में बैंक के कर्मचारियों ने किसानों के लिए आई राशि में गड़बड़ी की है। इसके लिए निर्धारित धनराशि से कम राशि को किसान के खाते में पहुंचाया और बची हुई अतिरिक्त राशि को बैंकर्स चेक के माध्यम से किसी अन्य खाते में पहुंचा दिया गया। इसके अतिरिक्त सीधे कुछ लोगों के खाते में भी रुपये पहुंचा दिए गए, जो किसान नहीं थे। इसके अलावा ऋण मोचन के कार्यक्रम में भी इसी की तर्ज पर किसानों को प्रलोभन देकर उनकी ऋण की राशि माफ करने का आश्वासन देकर किसानों के खाते में अतिरिक्त रुपये पहुंचा दिए गए और अतिरिक्त रुपयों को बाद में किसानों से ले लिया गया।