फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lalitpur News ›   brinandan kiledar freedom fighter

अंग्रेजी हुकुमत से माफी मांगने की जगह किलेदार ने जेल जाना किया पसंद

Mon, 02 Aug 2021 12:30 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 02 Aug 2021 12:30 AM IST
विज्ञापन
brinandan kiledar freedom fighter
पं. बृजनंदन किलेदार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी - फोटो : LALITPUR
ललितपुर। आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी पं. बृजनंदन किलेदार ने अंग्रेजी हुकूमत से माफी मांगने की जगह जेल में रहना पसंद किया। वह वर्ष 1931, 32 व 42 में जेल में रहे। दो अक्तूबर 2002 को उनका निधन हो गया। पं. बृजनंदन किलेदार जिले के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में एक रहे हैं। उनका जन्म स्वतंत्रता सेनानी परिवार में एक जनवरी 1901 में हुआ था। बचपन से ही इन पर पिता स्वतंत्रता सेनानी पं. नंदकिशोर किलेदार के सामाजिक क्रियाकलापों का असर पड़ा। उस समय इनके घर पर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने की योजनाएं बनती थीं। जिस कारण उनके मन मस्तिष्क पर असर पड़ा और वह वर्ष 1929 में इस आंदोलन से जुड़ गए थे। क्रांतिकारियों के रुकने, ठहरने व भोजन की व्यवस्था किलेदार ही करते थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे। इस दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा था।
विज्ञापन

शहर के प्रबुद्घ नागरिक देवेंद्र गुरु बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन में पं. बृजनंदन किलेदार और उनके पिता पं नंदकिशोर किलेदार दोनों जेल चले गए थे। अंग्रेज सरकार चाहती थी कि स्वतंत्रता सेनानी माफी मांग लें तो उन्हें आजाद कर दिया जाएगा। वह इस बात पर दृढ़ थे कि उन्हें बिना शर्त स्वत: छोड़ा जाए, क्योंकि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। उन दिनों पं. बृजनंदन किलेदार की बड़ी पुत्री शकुंतला देवी की शादी तय हुई थी। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद से बरात आनी थी। फलदान, लगन आदि पहले हो चुके थे, ऐसे में शादी टाली नहीं जा सकती थी। उनसे फिर कहा गया कि पिता-पुत्र माफी मांग लो तो छोड़ दिया जाएगा पर दोनों ने इससे इंकार कर दिया।
विज्ञापन

इस पर सरकार ने कहा कि कुछ शर्तें लिख दो तो दोनों को पंद्रह दिन के पेरोल पर छोड़ देने की बात कही, वह इस पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने सीधा जवाब दिया कि बिना शर्त छोड़ो वरना जेल में ही रहेंगे। नवंबर माह में होशंगाबाद से बेटी की बरात आई। लड़की की मां और दादी ने अपने सामर्थ्य भर संसाधन जुटाने का प्रयास किया। उधर, झांसी जेल में दोनों पिता-पुत्र शादी के दिन बैचेन हो उठे। पिता नंदकिशोर किलेदार गीता उठा कर चादर ओढ़ कर एक कोने में बैठ कर उसे पढ़ने लगे। वहीं, पिता बृंजनंदन किलेदार बेचैनी से बैरक में चारों ओर घूमने लगे। उसी बैरक में एक ग्रामीण कैदी भी था, जो दिनभर लोकगीत गाया करता था। उसने एक बुंदेली विदाई लोकगीत छेड़ दिया। ‘कच्ची ईंट बाबुल देहरी न धरियो, बेटी न दिईओ परदेश मेरे लाल..’ गीत से उनकी और भी बेचैनी और बढ़ गई। इसके बाद उन्होंने मानस की कुछ चौपाई गुनगुनाकर बेचैनी पर काबू पाया।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed