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अंजनी माता मंदिर: यहां स्नान मात्र से चर्म रोग ठीक होने की मान्यता

Thu, 11 Apr 2024 12:33 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 11 Apr 2024 12:33 AM IST
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Anjani Mata Temple: It is believed that skin diseases can be cured by just bathing here.
संवाद न्यूज एजेंसी
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ललितपुर। मां अंजनी के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां स्नान मात्र से चर्म रोग ठीक हो जाता है। जनपद मुख्यालय से 42 किलोमीटर व महरौनी से आठ किलोमीटर दूर ग्राम कुम्हेड़ी के पास यह मंदिर है। यहां हनुमान जयंती पर मेला लगता है तो नवरात्र में प्रतिदिन लोग यहां दर्शन करने जाते हैं।
मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित है कि इसी गांव के भवूदी टिकरया नामक किसान खेत में हल चला रहा था, तभी हल का फाल जमीन में फंस गया। फाल निकालते समय वहां मूर्ति होने का आभास हुआ। किसान ने पड़ोसियों की मदद से मूर्ति को बाहर निकालकर पास में खड़े बबूल के पेड़ के नीचे रखवा दिया और वहीं मूर्ति की पूजा की जाने लगी। इसी गांव के शंकर दयाल शर्मा के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने बबूल के नीचे स्थापित मां अंजनी माता से संतान प्राप्ति की प्रार्थना की। उनके घर 60 वर्ष की आयु में कन्या ने जन्म लिया।
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इससे प्रभवित होकर उन्होंने वहीं एक छोटा सा मंदिर बनवाकर उसमें मां अंजनी की स्थापना करा दी। इस घटना को करीब आठ दशक बीत चुके हैं, तब से यहां श्रद्धालु पूजा पाठ करने आते हैं। उनका मानना है कि यहां उनके बच्चों को रोगों से निजात मिलती है। मंदिर के पास लगे हैंडपंप पर रविवार और बुधवार को बच्चों को नहलाने, माता को नारियल चढ़ाने और पुराने वस्त्र दान करने की परंपरा है। निसंतान जोड़े आकर मंदिर के पीछे वाले हिस्से में हल्दी के उल्टे हाथ की छाप लगाते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से उनकी संतान पाने की मुराद पूरी होती है।
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हनुमान जयंती पर एक सप्ताह तक लगता है मेला
हनुमान जयंती पर पूर्णमासी से एक सप्ताह तक मेला लगता है। पहले दिन जवारे चढ़ाने के साथ मेला शुरू होता है। एक सप्ताह में वैशाख की षष्ठी को मेले का समापन होता है। मेले में हजारों श्रद्धालु मनौतियां मांगने आते हैं।

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कभी लगता था बड़ा पशु मेला
अंजनी माता मंदिर पर मेला इसलिए भी प्रसिद्ध था कि एक समय में यहां क्षेत्र का सबसे बड़ा पशु मेला लगता था। उत्कृष्ट नस्ल के गाय व बैल बिकने के लिए आते थे। उस समय मशीनरी न होने के कारण बैलों से खेती होती थी। मेले में कई प्रांतों से ग्रामीण पशु खरीदने व बेचने आते थे। अब मशीनरी के युग में यह पशु मेला लगना बंद हो गया।
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