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फूड़ता के शामिल होने से लोकगीत के श्रोताओं में आई कमी
Updated Sun, 18 Feb 2018 01:56 AM IST
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फूहड़ता शामिल करने से लोकगीत के श्रोताओं में आई कमी
ललितपुर। बुंदेलखंडी गीत सम्राट से प्रख्यात कलाकार देशराज पटैरिया ने माना कि लोकगीतों में फूहड़ता शामिल हो गई है। ऐसा कुछ कलाकारों ने अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किया है। इससे उनकी लोकप्रियता को नहीं बढ़ी बल्कि लोकगीत के श्रोता ही कम हो गए हैं। उन्होंने राजनीति को सबसे गंदा स्थान बताया। उन्होंने एक मुलाकात में यह बात कही। वे तुवन ग्राउंड में आयोजित देवगढ़ महोत्सव में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आए थे।
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की संस्कृति किसी से कम नहीं है। कवि मधुकर ने इसका विस्तृत वर्णन अपनी कविताओं में किया है। जब वह चौदह वर्ष की उम्र के थे, तब से उन्होंने कीर्तन गायन की शुरुआत की थी। लेकिन 18 वर्ष की उम्र में लोकगीत गाने की शुरुआत की। 31 जुलाई वर्ष 1976 को सबसे पहले आकाशवाणी ने उनके लोकगीत रिकार्ड किए और इसका प्रसारण सात अगस्त 1976 को किया। इसी दिन से आकाशवाणी की स्थापना हुई और उसने रिकार्ड किए गए छह गीतों का प्रसारण किया। सबसे बड़ी बात यह रही कि आकाशवाणी ने इसका प्रसारण 80 केंद्रों से किया था। हरे वाष मंडप छाए, सिया जू ब्याहन गांव आए यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ। आज भी इसे शादियों में गाया जाता था। जबनो मोरी बहन जानकी आंखन नहीं दिखानी तबनो मोखों ई मेड़े का पीने न पानी गीत को भी खूब ख्याति मिली। वर्तमान में लोकगीत गाते हुए सैतालीस वर्ष हो गए हैं। उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आल्हा गाने पर जगनक पुरस्कार प्रदान किया था तो ओरछा में रायप्रवीण पुरस्कार अर्जुन सिंह के हाथों से मिला। तानसेन की शिष्या रायप्रवीण थी जिनके नाम से यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। पदमश्री, यशभारती पुरस्कार नहीं मिलने पर उन्होंने कहा कि उनकी योग्यता में कोई कमी रह गई होगी तब उन्हें इस लायक नहीं समझा गया। कई लोकगायकों की तरह राजनीति में आने के सवाल पर उन्होंने कहा कि राजनीति सबसे गंदा स्थान है। यहां एक दिन में जीवनभर का कमाया बेकार हो जाता है। मैं राजनीति में कभी नहीं आऊंगा और न ही किसी का प्रचार का करूंगा। बुंदेलखंड की संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए सरकार बुंदेलखंडी महोत्सव का आयोजन करें।
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ललितपुर। बुंदेलखंडी गीत सम्राट से प्रख्यात कलाकार देशराज पटैरिया ने माना कि लोकगीतों में फूहड़ता शामिल हो गई है। ऐसा कुछ कलाकारों ने अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किया है। इससे उनकी लोकप्रियता को नहीं बढ़ी बल्कि लोकगीत के श्रोता ही कम हो गए हैं। उन्होंने राजनीति को सबसे गंदा स्थान बताया। उन्होंने एक मुलाकात में यह बात कही। वे तुवन ग्राउंड में आयोजित देवगढ़ महोत्सव में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आए थे।
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड की संस्कृति किसी से कम नहीं है। कवि मधुकर ने इसका विस्तृत वर्णन अपनी कविताओं में किया है। जब वह चौदह वर्ष की उम्र के थे, तब से उन्होंने कीर्तन गायन की शुरुआत की थी। लेकिन 18 वर्ष की उम्र में लोकगीत गाने की शुरुआत की। 31 जुलाई वर्ष 1976 को सबसे पहले आकाशवाणी ने उनके लोकगीत रिकार्ड किए और इसका प्रसारण सात अगस्त 1976 को किया। इसी दिन से आकाशवाणी की स्थापना हुई और उसने रिकार्ड किए गए छह गीतों का प्रसारण किया। सबसे बड़ी बात यह रही कि आकाशवाणी ने इसका प्रसारण 80 केंद्रों से किया था। हरे वाष मंडप छाए, सिया जू ब्याहन गांव आए यह गीत काफी लोकप्रिय हुआ। आज भी इसे शादियों में गाया जाता था। जबनो मोरी बहन जानकी आंखन नहीं दिखानी तबनो मोखों ई मेड़े का पीने न पानी गीत को भी खूब ख्याति मिली। वर्तमान में लोकगीत गाते हुए सैतालीस वर्ष हो गए हैं। उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आल्हा गाने पर जगनक पुरस्कार प्रदान किया था तो ओरछा में रायप्रवीण पुरस्कार अर्जुन सिंह के हाथों से मिला। तानसेन की शिष्या रायप्रवीण थी जिनके नाम से यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। पदमश्री, यशभारती पुरस्कार नहीं मिलने पर उन्होंने कहा कि उनकी योग्यता में कोई कमी रह गई होगी तब उन्हें इस लायक नहीं समझा गया। कई लोकगायकों की तरह राजनीति में आने के सवाल पर उन्होंने कहा कि राजनीति सबसे गंदा स्थान है। यहां एक दिन में जीवनभर का कमाया बेकार हो जाता है। मैं राजनीति में कभी नहीं आऊंगा और न ही किसी का प्रचार का करूंगा। बुंदेलखंड की संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए सरकार बुंदेलखंडी महोत्सव का आयोजन करें।
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