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जाते-जाते दुधवा को गम दे गया साल 2019
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इस साल तेंदुए, बारहसिंगा और हाथी की भी हो चुकी है मौत
पलियाकलां। साल 2019 दुधवा नेशनल पार्क तथा वन्यजीव प्रेमियों के लिए काफी दुखदाई कहा जा सकता है। इस साल दुधवा पार्क क्षेत्र के एक तेंदुआ, बारहसिंगा व एक नर हाथी की मौत हुई।
नौ जनवरी को पलिया-भीरा रोड पर एक अज्ञात वाहन की टक्कर से एक बारहसिंगा की मौत हुए तो इसी तरह 22 फरवरी को दो गैंडों में आपसी संघर्ष के चलते एक नर गैंडे की मौत हो गई। सात अप्रैल को दुधवा के बफर जोन के सुमेरनगर गांव के पास एक नर तेंदुए का शव बरामद हुआ। चार साल के इस नर तेंदुए की भी आपसी संघर्ष में जान चली गई थी। इसके बाद 27 जुलाई को दुधवा टाइगर रिजर्व की सठियाना रेंज से लगभग सौ मीटर की दूरी पर पलिया रेंज के बफर जोन में निषादनगर घोला में एक गन्ने के खेत में नर हाथी की करंट लगने से मौत हो गई। इन सदमों से अभी पार्क प्रशासन उबर भी नहीं पाया था कि साल 2019 के खत्म होते-होते 31 दिसंबर को नर गैंडे की आपसी संघर्ष में मौत हो गई।
30 के फेर में उलझी पड़ी है गैंडा परियोजना
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क की सलूकापुर गैंडा परियोजना 30 के फेर में उलझ गई है। यहां गैंडों का आंकड़ा जैसे ही 30 के आस पास आता है वैसे ही कोई न कोई हादसा होने से गैंडे की मौत हो जाती है। इससे एक सींग वाले दुर्लभ गैंडों के कुनबे में इजाफा नहीं हो पा रहा है।
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दुधवा के 32 गैंडों में एक गैंडे की मौत फरवरी में हुई थी जिसके बाद यह संख्या 31 रह गई लेकिन अब एक और नर गैंडे की मौत से एक बार फिर संख्या 30 पहुंच गई है।
वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज में सलूकापुर बीट की 27 वर्ग किलोमीटर भूमि में बसाई गई गैंडा पुनर्वास परियोजना का मकसद लुप्त हो रही इस प्रजाति को बचाना था। इसी मकसद से यहां एक सींग वाले दुर्लभ गैंडे असम और नेपाल से लाए गए थे। परियोजना के शुरुआती दौर में ही यहां बदले माहौल के चलते एक दो-गैंडों की जान चली गई थी। लग रहा था कि परियोजना पूरी तरह से फ्लॉप हो जाएगी, लेकिन अंदाजे गलत साबित हुए और गैंडों की संख्या में वृद्धि हुई। इसमें ज्यादातर बच्च नर गैंडा बांके के थे। धीरे-धीरे गैंडा परिवार की संख्या बढ़कर 30 तक पहुंच गई, लेकिन एक सींग वाले गैंडों के लिए यह 30 का आंकड़ा एक अभिशाप बन गया। 30 की गिनती के आसपास आते ही यहां कोई न कोई हादसा हो जाता है और इस हादसे में किसी न किसी गैंडे की जान चली जाती है। धीरे-धीरे बढ़कर गैंडों की संख्या 31 हो गई थी लेकिन इसके बाद अब यह संख्या फिर से 30 पर पहुंच गई है। इसमें अब गैंडा परियोजना फेज वन में 26 तथा गैंडा परियोजना फेज टू में चार गैंडे रह गए हैं।
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पलियाकलां। साल 2019 दुधवा नेशनल पार्क तथा वन्यजीव प्रेमियों के लिए काफी दुखदाई कहा जा सकता है। इस साल दुधवा पार्क क्षेत्र के एक तेंदुआ, बारहसिंगा व एक नर हाथी की मौत हुई।
नौ जनवरी को पलिया-भीरा रोड पर एक अज्ञात वाहन की टक्कर से एक बारहसिंगा की मौत हुए तो इसी तरह 22 फरवरी को दो गैंडों में आपसी संघर्ष के चलते एक नर गैंडे की मौत हो गई। सात अप्रैल को दुधवा के बफर जोन के सुमेरनगर गांव के पास एक नर तेंदुए का शव बरामद हुआ। चार साल के इस नर तेंदुए की भी आपसी संघर्ष में जान चली गई थी। इसके बाद 27 जुलाई को दुधवा टाइगर रिजर्व की सठियाना रेंज से लगभग सौ मीटर की दूरी पर पलिया रेंज के बफर जोन में निषादनगर घोला में एक गन्ने के खेत में नर हाथी की करंट लगने से मौत हो गई। इन सदमों से अभी पार्क प्रशासन उबर भी नहीं पाया था कि साल 2019 के खत्म होते-होते 31 दिसंबर को नर गैंडे की आपसी संघर्ष में मौत हो गई।
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30 के फेर में उलझी पड़ी है गैंडा परियोजना
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क की सलूकापुर गैंडा परियोजना 30 के फेर में उलझ गई है। यहां गैंडों का आंकड़ा जैसे ही 30 के आस पास आता है वैसे ही कोई न कोई हादसा होने से गैंडे की मौत हो जाती है। इससे एक सींग वाले दुर्लभ गैंडों के कुनबे में इजाफा नहीं हो पा रहा है।
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दुधवा के 32 गैंडों में एक गैंडे की मौत फरवरी में हुई थी जिसके बाद यह संख्या 31 रह गई लेकिन अब एक और नर गैंडे की मौत से एक बार फिर संख्या 30 पहुंच गई है।
वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज में सलूकापुर बीट की 27 वर्ग किलोमीटर भूमि में बसाई गई गैंडा पुनर्वास परियोजना का मकसद लुप्त हो रही इस प्रजाति को बचाना था। इसी मकसद से यहां एक सींग वाले दुर्लभ गैंडे असम और नेपाल से लाए गए थे। परियोजना के शुरुआती दौर में ही यहां बदले माहौल के चलते एक दो-गैंडों की जान चली गई थी। लग रहा था कि परियोजना पूरी तरह से फ्लॉप हो जाएगी, लेकिन अंदाजे गलत साबित हुए और गैंडों की संख्या में वृद्धि हुई। इसमें ज्यादातर बच्च नर गैंडा बांके के थे। धीरे-धीरे गैंडा परिवार की संख्या बढ़कर 30 तक पहुंच गई, लेकिन एक सींग वाले गैंडों के लिए यह 30 का आंकड़ा एक अभिशाप बन गया। 30 की गिनती के आसपास आते ही यहां कोई न कोई हादसा हो जाता है और इस हादसे में किसी न किसी गैंडे की जान चली जाती है। धीरे-धीरे बढ़कर गैंडों की संख्या 31 हो गई थी लेकिन इसके बाद अब यह संख्या फिर से 30 पर पहुंच गई है। इसमें अब गैंडा परियोजना फेज वन में 26 तथा गैंडा परियोजना फेज टू में चार गैंडे रह गए हैं।