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जो कभी दूसरों को आसरा देते थे आज दूसरों की शरण में
अमर उजाला ब्यूरो ईसानगर।
Updated Wed, 03 Aug 2016 09:57 PM IST
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बाढ़ का कहर
- फोटो : अमर उजाला
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सैकड़ों लोगों को बेघर किया घाघरा की लहरों ने
आश्वासन के सिवा प्रशासन से कुछ भी नहीं मिला इन्हे
जो कल तक दूसरों को आसरा देते थे, आज दूसरों के यहां आसरा लेने को मजबूर हैं। घाघरा नदी ने न केवल उनका घर छीना बल्कि रोजी रोटी का जरिए खेतों को भी निगल लिया। अपने पक्के मकानों में सुख सुविधा के साथ रहने वाले हुलासपुरवा गांव के लोगों को झोपड़ियों, सरकारी भवनों या फिर सड़क किनारे बरसाती तानकर रहना पड़ रहा है। जिनके खेतों में कभी दर्जनों मजदूर काम करते थे आज वे खुद दूसरों के खेतों मेें काम कर अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं।
यह हाल है ईसानगर के रुद्रपुर गांव के मजरा हुलासपुरवा में घाघरा की कटान में अपना सबकुछ गवां चुके कटान पीड़ितों का। घाघरा की विनाशकारी लहरों ने उनका सब कुछ छीन लिया है। अब वे दूसरों के घरों में शरण लेकर अपना वक्त गुजार रहे हैं। इन कटान पीड़ितों ने दूसरे मजरों में रहने वाले लोगों के यहां शरण ली है। कुछ लोगों के सरकारी स्कूलों, एनआरएचएम भवन और रास्ते शरणस्थली बने हैं।
जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों ने यहां आकर कटान देखा, ग्रामीणों के साथ हमदर्दी भी जताई लेकिन इन्हें कोरे आश्वासनों के अलावा एक अदद तिरपाल और प्लास्टिक पिपिया के सिवा कुछ भी नहीं मिल सका है। खाने पीने के साथ इन्हें अपने बच्चों तक की छोटी छोटी जरूरतों के लिए दूसरों की मेहरबानियों पर आश्रित रहना पड़ रहा है। शरणार्थियों जैसी जिंदगी जी रहे लोगों की बेबसी इनके चेहरों पर साफ दिखाई दे रही है।
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आश्वासन के सिवा प्रशासन से कुछ भी नहीं मिला इन्हे
जो कल तक दूसरों को आसरा देते थे, आज दूसरों के यहां आसरा लेने को मजबूर हैं। घाघरा नदी ने न केवल उनका घर छीना बल्कि रोजी रोटी का जरिए खेतों को भी निगल लिया। अपने पक्के मकानों में सुख सुविधा के साथ रहने वाले हुलासपुरवा गांव के लोगों को झोपड़ियों, सरकारी भवनों या फिर सड़क किनारे बरसाती तानकर रहना पड़ रहा है। जिनके खेतों में कभी दर्जनों मजदूर काम करते थे आज वे खुद दूसरों के खेतों मेें काम कर अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं।
यह हाल है ईसानगर के रुद्रपुर गांव के मजरा हुलासपुरवा में घाघरा की कटान में अपना सबकुछ गवां चुके कटान पीड़ितों का। घाघरा की विनाशकारी लहरों ने उनका सब कुछ छीन लिया है। अब वे दूसरों के घरों में शरण लेकर अपना वक्त गुजार रहे हैं। इन कटान पीड़ितों ने दूसरे मजरों में रहने वाले लोगों के यहां शरण ली है। कुछ लोगों के सरकारी स्कूलों, एनआरएचएम भवन और रास्ते शरणस्थली बने हैं।
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जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों ने यहां आकर कटान देखा, ग्रामीणों के साथ हमदर्दी भी जताई लेकिन इन्हें कोरे आश्वासनों के अलावा एक अदद तिरपाल और प्लास्टिक पिपिया के सिवा कुछ भी नहीं मिल सका है। खाने पीने के साथ इन्हें अपने बच्चों तक की छोटी छोटी जरूरतों के लिए दूसरों की मेहरबानियों पर आश्रित रहना पड़ रहा है। शरणार्थियों जैसी जिंदगी जी रहे लोगों की बेबसी इनके चेहरों पर साफ दिखाई दे रही है।
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