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...हमें छप्पन भोग नहीं.. बस मुक्ति दिला दो और हमारे फूल सिरा दो
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Thu, 14 Sep 2017 11:46 PM IST
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श्राद्ध
- फोटो : अमर उजाला
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- सेठघाट स्थित मुक्तिधाम में दर्जनों फूल प्रवाहित होने का कर रहे इंतजार
- मुक्तिधाम प्रबंधक तीन माह पूर्व करा चुका है 450 फूल प्रवाहित
पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध कर तर्पण करने की वर्षों पुरानी परंपरा है। लोग इसका पालन करते हुए अपने पितरों का स्मरण भी करते हैं, लेकिन आज सैकड़ों ऐसे लोग भी हैं जो अपने बुजुर्गों की मौत के बाद उनको श्मशान ले जाकर अंतिम संस्कार तो कर देते हैं, लेकिन उनके फूलों को चुनकर उन्हें जल प्रवाहित करना भूल जाते हैं।
शहर के सेठघाट स्थित रामघाट मुक्तिधाम में कई परिवार के पूर्वजों की चिता से चुने गए फूल मटकियों और पॉलिथीन में लटक रहे हैं, जिन्हें उनके घरवाले सालों से लेने ही नहीं पहुंचे। इनमें से तमाम ऐसे परिवार हैं जो निर्धारित समय पर अपने पूर्वजों के फूल चुनने ही नहीं पहुंचे, जिस पर मुक्तिधाम प्रबंधन ने फूलों को चुनकर पेड़ों पर टांग दिया कि कभी तो अपने पूर्वजों की सुधि लेकर उनके घरवाले फूल लेने आएंगे, हालांकि एक साल बाद भी इन फूलों को लेने कोई नहीं पहुंचा। फिर मुक्तिधाम प्रबंधन ने साल भर में इकठ्ठा हुए फूलों को स्वयं फर्रूखाबाद ले जाकर गंगा में प्रवाहित करवा दिया।
धार्मिक मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद बुजुर्ग को तब तक मोक्ष नहीं मिलता जब तक उनके फूलों को चिता से चुनकर गंगा में प्रवाहित न कर दिया जाए। दाह संस्कार के बाद परिवार के लोग चिता से फूल चुनकर व शव की राख इकठ्ठा कर लेते हैं और फिर उसे मिट्टी के बर्तन में भरकर तीर्थ स्थान पर ले जाकर जल प्रवाहित करके पितरों का तर्पण करते हैं। अब यह परंपरा दरकती नजर आ रही है। भागदौड़ भरी जिंदगी में बेटे-बेटियों के पास अपने पूर्वजों के लिए इतना भी समय नहीं है कि वह अपने मां-बाप और पूर्वजों की चिता से फूल चुनकर उन्हें तीर्थ स्थान पर ले जाकर जल प्रवाहित कर तर्पण कर सकें। युवा दाह संस्कार एवं दसवां, तेरहवीं के बाद घर के बुजुर्ग के प्रति अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।
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देेवताओं से ज्यादा पितरों का तर्पण है श्रेष्ठ
धर्माचार्यों का कहना है कि देवताओं के निमित्त कार्य करने से पितरों का श्राद्ध तर्पण से श्रेष्ठ है। इसके लिए पितृपक्ष में प्रतिदिन पितरों का स्मरण कर दक्षिण दिशा में मुंह करके जल व तिल दोनों हथेलियों को मिलाकर दाहिनी हथेली की तर्जनी और अंगूठे की ओर जल अर्पण करते हैं। पितरों के लिए दाहिना हाथ और हथेलियों में सबसे महत्वपूर्ण तर्जनी के प्रयोग का अर्थ है कि पितरों को कार्य मजबूत दाहिने हाथ व सात्विक भाव से किया गया। पितरों की मृत्यु तिथि या अमावस्या को जब भी श्राद्ध करते हैं तो वह मध्याह्न 12 से अपराह्न तीन बजे के बीच किया जाता है। पितृपक्ष में पुरोहित के अलावा सिर्फ परिवार या रक्त संबंधी लोग ही भोजन करते हैं। मित्र या राह चलते लोगों को भोजन न कराएं। श्राद्ध के दिन अगर व्रत पड़ रहा है तो फलाहार कर श्राद्ध करें। दान एवं भोजन पात्र, सात्विक और कर्मकांडी विद्वान से ही कराएं।
जिनके घरवाले नहीं ले जाते फूल, उन्हें प्रबंध समिति कराती है जलप्रवाह
शहर के रामघाट मुक्तिधाम के प्रबंध समिति के सदस्य पंडित अशोक पांडे का कहना है कि प्रतिदिन दो चार शवों का दाह संस्कार होता है। नियमानुसार दाह संस्कार के तीसरे दिन घरवालों को अपने पूर्वज के फूल चुनकर उन्हें पवित्र नदी में प्रवाहित करना चाहिए, लेकिन बहुत से परिवार फूल लेने तक नहीं आते हैं, जिन्हें हम लोग ही चुनकर स्टोर रूम में रखवा देते हैं। एक साल में इस तरह इकठ्ठा हुए फूलों को स्वयं ले जाकर गंगा में प्रवाहित करा देते हैं।
हाल ही में पांच सौ फूलों को कराया गया प्रवाहित
शहीद सरदार भगत सिंह नि:स्वार्थ सेवा समिति के संस्थापक जसपाल सिंह पाली ने बताया कि मुक्तिधाम प्रबंध समिति के साथ में तीन माह पूर्व करीब पांच सौ फूलों को फर्रूखाबाद ले जाकर गंगा जी में प्रवाहित करवा दिया गया। इसमें कुछ ऐसे फूल थे जिनके घरवाले दाह संस्कार के बाद फूल चुनने ही नहीं आए थे, तो कुछ लावारिस शवों के फूल थे।
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- मुक्तिधाम प्रबंधक तीन माह पूर्व करा चुका है 450 फूल प्रवाहित
पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध कर तर्पण करने की वर्षों पुरानी परंपरा है। लोग इसका पालन करते हुए अपने पितरों का स्मरण भी करते हैं, लेकिन आज सैकड़ों ऐसे लोग भी हैं जो अपने बुजुर्गों की मौत के बाद उनको श्मशान ले जाकर अंतिम संस्कार तो कर देते हैं, लेकिन उनके फूलों को चुनकर उन्हें जल प्रवाहित करना भूल जाते हैं।
शहर के सेठघाट स्थित रामघाट मुक्तिधाम में कई परिवार के पूर्वजों की चिता से चुने गए फूल मटकियों और पॉलिथीन में लटक रहे हैं, जिन्हें उनके घरवाले सालों से लेने ही नहीं पहुंचे। इनमें से तमाम ऐसे परिवार हैं जो निर्धारित समय पर अपने पूर्वजों के फूल चुनने ही नहीं पहुंचे, जिस पर मुक्तिधाम प्रबंधन ने फूलों को चुनकर पेड़ों पर टांग दिया कि कभी तो अपने पूर्वजों की सुधि लेकर उनके घरवाले फूल लेने आएंगे, हालांकि एक साल बाद भी इन फूलों को लेने कोई नहीं पहुंचा। फिर मुक्तिधाम प्रबंधन ने साल भर में इकठ्ठा हुए फूलों को स्वयं फर्रूखाबाद ले जाकर गंगा में प्रवाहित करवा दिया।
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धार्मिक मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद बुजुर्ग को तब तक मोक्ष नहीं मिलता जब तक उनके फूलों को चिता से चुनकर गंगा में प्रवाहित न कर दिया जाए। दाह संस्कार के बाद परिवार के लोग चिता से फूल चुनकर व शव की राख इकठ्ठा कर लेते हैं और फिर उसे मिट्टी के बर्तन में भरकर तीर्थ स्थान पर ले जाकर जल प्रवाहित करके पितरों का तर्पण करते हैं। अब यह परंपरा दरकती नजर आ रही है। भागदौड़ भरी जिंदगी में बेटे-बेटियों के पास अपने पूर्वजों के लिए इतना भी समय नहीं है कि वह अपने मां-बाप और पूर्वजों की चिता से फूल चुनकर उन्हें तीर्थ स्थान पर ले जाकर जल प्रवाहित कर तर्पण कर सकें। युवा दाह संस्कार एवं दसवां, तेरहवीं के बाद घर के बुजुर्ग के प्रति अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।
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देेवताओं से ज्यादा पितरों का तर्पण है श्रेष्ठ
धर्माचार्यों का कहना है कि देवताओं के निमित्त कार्य करने से पितरों का श्राद्ध तर्पण से श्रेष्ठ है। इसके लिए पितृपक्ष में प्रतिदिन पितरों का स्मरण कर दक्षिण दिशा में मुंह करके जल व तिल दोनों हथेलियों को मिलाकर दाहिनी हथेली की तर्जनी और अंगूठे की ओर जल अर्पण करते हैं। पितरों के लिए दाहिना हाथ और हथेलियों में सबसे महत्वपूर्ण तर्जनी के प्रयोग का अर्थ है कि पितरों को कार्य मजबूत दाहिने हाथ व सात्विक भाव से किया गया। पितरों की मृत्यु तिथि या अमावस्या को जब भी श्राद्ध करते हैं तो वह मध्याह्न 12 से अपराह्न तीन बजे के बीच किया जाता है। पितृपक्ष में पुरोहित के अलावा सिर्फ परिवार या रक्त संबंधी लोग ही भोजन करते हैं। मित्र या राह चलते लोगों को भोजन न कराएं। श्राद्ध के दिन अगर व्रत पड़ रहा है तो फलाहार कर श्राद्ध करें। दान एवं भोजन पात्र, सात्विक और कर्मकांडी विद्वान से ही कराएं।
जिनके घरवाले नहीं ले जाते फूल, उन्हें प्रबंध समिति कराती है जलप्रवाह
शहर के रामघाट मुक्तिधाम के प्रबंध समिति के सदस्य पंडित अशोक पांडे का कहना है कि प्रतिदिन दो चार शवों का दाह संस्कार होता है। नियमानुसार दाह संस्कार के तीसरे दिन घरवालों को अपने पूर्वज के फूल चुनकर उन्हें पवित्र नदी में प्रवाहित करना चाहिए, लेकिन बहुत से परिवार फूल लेने तक नहीं आते हैं, जिन्हें हम लोग ही चुनकर स्टोर रूम में रखवा देते हैं। एक साल में इस तरह इकठ्ठा हुए फूलों को स्वयं ले जाकर गंगा में प्रवाहित करा देते हैं।
हाल ही में पांच सौ फूलों को कराया गया प्रवाहित
शहीद सरदार भगत सिंह नि:स्वार्थ सेवा समिति के संस्थापक जसपाल सिंह पाली ने बताया कि मुक्तिधाम प्रबंध समिति के साथ में तीन माह पूर्व करीब पांच सौ फूलों को फर्रूखाबाद ले जाकर गंगा जी में प्रवाहित करवा दिया गया। इसमें कुछ ऐसे फूल थे जिनके घरवाले दाह संस्कार के बाद फूल चुनने ही नहीं आए थे, तो कुछ लावारिस शवों के फूल थे।