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Lakhimpur Kheri News: दुधवा के नजारे... रंग-बिरंगे, दिलकश परिंदे

Fri, 05 Jan 2024 12:35 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 05 Jan 2024 12:35 AM IST
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Views of Dudhwa... Colorful, charming birds
लखीमपुर खीरी/बांकेगंज। ऐसा नहीं है कि दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगल में सिर्फ बाघ या अन्य वन्यजीव ही दिखते हैं, यहां का जंगल रंग-बिरंगे और दिलकश पक्षियों से मालामाल है। पक्षियों की यहां 450 प्रजातियां हैं। इनमें दुर्लभ प्रजाति का बंगाल फ्लोरिकन पक्षी भी यहां पाया जाता है। हर साल प्रवासी परिंदों का डेरा तो लगता ही है।
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पांच जनवरी को हर साल राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है। खीरी जिले में इसकी प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। यहां बड़ी संख्या में मौजूद जलाशयों में ठंडे देशों से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी आकर चार महीने का प्रवास करते हैं। इन दिनों दुधवा टाइगर रिजर्व के बफरजोन की नगरिया झील, किशनपुर सेंक्चुरी के झादीताल के अलावा दुधवा का भादीताल, ककरहा तालाब, शारदा नगर, मैनहेन झील, रमिया बेहड़ झील समेत विभिन्न जलाशय प्रवासी पक्षियों से गुलजार हैं।
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इन जलाशयों में सैकड़ों प्रजातियों के रंग-बिरंगे स्थानीय पक्षी पूरे साल देखे जाते हैं। गांवों के जलाशयों के किनारे सरसों का प्राकृतिक हैबिटेट है। उड़ान भरकर एक से दूसरे जलाशय में जाते सारस सबके आकर्षण का केंद्र हैं।
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मेहमान परिंदे
झादीताल,भादीताल और ककरहा में मुख्य रूप से यूरोप, मध्य एशिया, पूर्वी साइबेरिया, चीन, लद्दाख और तिब्बत से खूबसूरत पक्षी आते हैं। इसमें स्पाॅट विल्ड डक, रेड क्रस्टेड पोचर्ड, ग्रे लग गूस, बार हेडेड गूस, टस्टेड डक, कामन टील, पिन टील, ब्राहमानी डक, कूट मूर हेन, अबलक, गुर्चिया बतख आदि शामिल हैं।

संरक्षण के लिए प्रयास जरूरी
बांकेगंज। खेतों में अंधाधुंध कीटनाशक का इस्तेमाल होने से जलाशयों का पानी जहरीला होता जा रहा है। इसके चलते गांवों के किनारे जलाशयों में पाए जाने वाले सारस जहरीला पानी पी रहे हैं। यहीं कारण है कि 10 साल पहले जिले में दो हजार से अधिक सारस पाए जाते थे, लेकिन साल 2023 में हुई गणना में मात्र 179 सारस देखे गए।


वर्जन
दुधवा न केवल जलचर, थलचर जीवों से समृद्ध है, बल्कि यहां मिलने वाले 450 प्रजातियों के परिंदे यहां की जैव विविधता को और अधिक मालामाल करते हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए लोगोें को जागरूक होना चाहिए। कीटनाशक और खरपतवार नाशक का कम से कम इस्तेमाल हो, ताकि पक्षियों का प्राकृतवास सुरक्षित रहे।
-ललित कुमार वर्मा, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व
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