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इन गांवों में तो कोई वोट मांगने तक नहीं आता
केके मौर्या निघासन।
Updated Mon, 13 Feb 2017 11:20 PM IST
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नदी
- फोटो : अमर उजाला
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मोहाना नदी ने काटा तो नेताओं के लिए भी बेगाने हो गए इन गांवों के लोग
भारत-नेपाल सीमा पर बह रही मोहाना नदी ने निघासन विधानसभा क्षेत्र के जिन गांवों को काटकर अलग किया, उन्हें जनप्रतिनिधियों ने भी ठुकरा दिया। मोहाना नदी के पार चौगुर्जी बंधिया और बंदरहिया गांव में रहने वाले लोग इस कदर उपेक्षित हैं कि राजनीतिक दलों के उम्मीदवार भी यहां वोट तक मांगने नहीं आते। वजह यह है कि व्यस्त चुनावी अभियान के बीच नाव से नदी पार कर यहां वोट मांगने आना उन्हें समय खराब करने जैसा लगता है।
तहसील मुख्यालय से करीब 37 किमी दूर सूरतनगर ग्राम पंचायत के बंदरहिया, चौगुर्जी, बंधिया, इंदरनगर, टांडा, सूरतनगर समेत करीब नौ मजरे हैं। इन गांवों की आबादी करीब 2200 है और करीब 1200 वोटर हैं। मोहाना नदी कभी इन गांवों से काफी दूर नेपाल सीमा में बहती थी। कुछ साल पहले मोहाना में कर्णाली नदी आकर मिली तो दोनों नदियों ने इस कदर कहर बरपाया कि चौगुर्जी, बंधिया और बंदरहिया गांव को तिकुनियां कस्बे से करीब 12 किमी दूर कर दिया। मोहाना देश की सीमा पर बहने लगी। दो साल पहले नदी ने सूरतनगर, पचहरी समेत सात गांवों को भी अपने आगोश में ले लिया। अब हालत यह है कि मोहाना के उस पार बसे गांवों में सड़क, खडंजा, शौचालय, स्कूल, बिजली जैसी कोई मूलभूत सुविधा नहीं है। गांवों के लोग नाव के जरिये रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए तिकुनियां आते हैं। छह महीने तक ये गांव टापू बने रहते हैं। गांव के लोगों ने बताया कि यहां नेता भले ही वोट मांगने नहीं आते लेकिन उन्होंने कभी मतदान का बहिष्कार नहीं किया। इंदरनगर, टांडा आदि गांव के लोगों के जरिये हर चुनाव में पुल बनवाने की मांग की जाती है लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है।
पिछड़ी जाति के लोग और पिछड़े
चौगर्जी बंदरहिया और बंधिया गांव में अधिकतर पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं। मोहाना नदी ने इन गांव के लोगों को और बेहाल कर दिया है। ये लोग साल में सिर्फ गेहूं की फसल बोकर किसी तरह परिवारों का भरण पोषण करते हैं। इन फसलों को भी अक्सर जंगली हाथी बर्बाद कर देते हैं।
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नेपाल के राजापुर से होती हैं जरूरतें पूरी
इन गांवों में बसे गांव के कमला प्रसाद, रामबली, मुन्नालाल, हरीलाल, सत्यनरायण, हीरा लाल, रामसनेही आदि ने बताया कि करीब चार किलोमीटर दूर नेपाल में स्थित राजापुर बाजार पड़ता हैं। अधिकतर खरीददारी नेपाल से ही की जाती हैं। तिकुनिया की दूरी 12 किलोमीटर पडने तथा एक नाव होने के कारण आने जाने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता हैं।
अनदेखी के बाद भी मत प्रतिशत अच्छा
दो साल पहले तक सूरतनगर के प्राथमिक विद्यालय में इन गांवों के लोग मतदान करने जाते थे। सूरतनगर का नदी ने वजूद मिटा दिया था। अब ये लोग गांव से करीब 10 किमी दूर टांडा गांव में मतदान करने आते हैं। 2014 में हुए उपचुनाव और लोकसभा के चुनाव में मतदान का प्रतिशत करीब 60 फीसदी था।
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भारत-नेपाल सीमा पर बह रही मोहाना नदी ने निघासन विधानसभा क्षेत्र के जिन गांवों को काटकर अलग किया, उन्हें जनप्रतिनिधियों ने भी ठुकरा दिया। मोहाना नदी के पार चौगुर्जी बंधिया और बंदरहिया गांव में रहने वाले लोग इस कदर उपेक्षित हैं कि राजनीतिक दलों के उम्मीदवार भी यहां वोट तक मांगने नहीं आते। वजह यह है कि व्यस्त चुनावी अभियान के बीच नाव से नदी पार कर यहां वोट मांगने आना उन्हें समय खराब करने जैसा लगता है।
तहसील मुख्यालय से करीब 37 किमी दूर सूरतनगर ग्राम पंचायत के बंदरहिया, चौगुर्जी, बंधिया, इंदरनगर, टांडा, सूरतनगर समेत करीब नौ मजरे हैं। इन गांवों की आबादी करीब 2200 है और करीब 1200 वोटर हैं। मोहाना नदी कभी इन गांवों से काफी दूर नेपाल सीमा में बहती थी। कुछ साल पहले मोहाना में कर्णाली नदी आकर मिली तो दोनों नदियों ने इस कदर कहर बरपाया कि चौगुर्जी, बंधिया और बंदरहिया गांव को तिकुनियां कस्बे से करीब 12 किमी दूर कर दिया। मोहाना देश की सीमा पर बहने लगी। दो साल पहले नदी ने सूरतनगर, पचहरी समेत सात गांवों को भी अपने आगोश में ले लिया। अब हालत यह है कि मोहाना के उस पार बसे गांवों में सड़क, खडंजा, शौचालय, स्कूल, बिजली जैसी कोई मूलभूत सुविधा नहीं है। गांवों के लोग नाव के जरिये रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए तिकुनियां आते हैं। छह महीने तक ये गांव टापू बने रहते हैं। गांव के लोगों ने बताया कि यहां नेता भले ही वोट मांगने नहीं आते लेकिन उन्होंने कभी मतदान का बहिष्कार नहीं किया। इंदरनगर, टांडा आदि गांव के लोगों के जरिये हर चुनाव में पुल बनवाने की मांग की जाती है लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है।
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पिछड़ी जाति के लोग और पिछड़े
चौगर्जी बंदरहिया और बंधिया गांव में अधिकतर पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं। मोहाना नदी ने इन गांव के लोगों को और बेहाल कर दिया है। ये लोग साल में सिर्फ गेहूं की फसल बोकर किसी तरह परिवारों का भरण पोषण करते हैं। इन फसलों को भी अक्सर जंगली हाथी बर्बाद कर देते हैं।
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नेपाल के राजापुर से होती हैं जरूरतें पूरी
इन गांवों में बसे गांव के कमला प्रसाद, रामबली, मुन्नालाल, हरीलाल, सत्यनरायण, हीरा लाल, रामसनेही आदि ने बताया कि करीब चार किलोमीटर दूर नेपाल में स्थित राजापुर बाजार पड़ता हैं। अधिकतर खरीददारी नेपाल से ही की जाती हैं। तिकुनिया की दूरी 12 किलोमीटर पडने तथा एक नाव होने के कारण आने जाने में काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता हैं।
अनदेखी के बाद भी मत प्रतिशत अच्छा
दो साल पहले तक सूरतनगर के प्राथमिक विद्यालय में इन गांवों के लोग मतदान करने जाते थे। सूरतनगर का नदी ने वजूद मिटा दिया था। अब ये लोग गांव से करीब 10 किमी दूर टांडा गांव में मतदान करने आते हैं। 2014 में हुए उपचुनाव और लोकसभा के चुनाव में मतदान का प्रतिशत करीब 60 फीसदी था।