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फीस जमा कराने को लेकर अभिभावक स्कूल प्रबंधन के बीच हो रही खटपट
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लखीमपुर खीरी। कोरोना काल में उद्योग-धंधों के साथ ही बच्चों की शिक्षा काफी प्रभावित हुई है। नर्सरी से कक्षा आठ तक के जूनियर स्कूलों में अब तक शिक्षण कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया है और न ही अधिकारी इस बारे में कुछ बोलने की स्थिति में हैं, क्योंकि निर्णय सरकार को लेना है। बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन कराने का दावा विद्यालय प्रबंधन द्वारा किया जा रहा है, लेकिन ज्यादातर बच्चों के पास स्मार्टफोन की सुविधा नहीं है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या कई महीनों से बनी हुई है।
प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे अभिभावकों की चिंता बढ़ती जा रही है। स्कूल प्रबंधन ऑनलाइन क्लासेज के जरिए बच्चों का कोर्स पूरा कराने की बात कह रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में खराब नेटवर्क बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज में बड़ा रोड़ा साबित हुआ है, जबकि 70 फीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा नहीं है। मार्च 2020 में लॉकडाउन लागू होने के तीन महीने बाद बाजार खुल गए, फिर कक्षा नौ से इंटरमीडिएट व डिग्री कॉलेज खुल गए, लेकिन नर्सरी से कक्षा आठ तक की पढ़ाई अब तक शुरू नहीं हो पाई है, जबकि स्कूल प्रबंधन ने वार्षिक परीक्षा कराने की तैयारी शुरू कर दी है और बकाया फीस जमा करने के लिए अभिभावकों को मोबाइल के जरिए संदेश भेजे जा रहे हैं, जिससे अभिभावकों में बेचैनी बढ़ी है।
अभिभावक संघ के पदाधिकारी और सदस्य कई बार डीएम को ज्ञापन देकर सरकार से छह माह की फीस माफ करने की गुहार लगा चुके हैं। सरकार ने अब तक अभिभावकों को राहत देने के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया है। वहीं जिला प्रशासन भी इस मामले में कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। अभी तक फीस को एक-एक महीने में जमा करने की सहूलियत देने के नाम पर अभिभावकों को छला गया है। इससे अभिभावकों की मुश्किलों का कोई समाधान नहीं हुआ है। जिनका व्यापार चौपट रहा, वो फीस के पैसे कैसे जुटाएंगे। वहीं अप्रैल से दिसंबर 2020 तक फीस जमा करने को लेकर स्कूल प्रबंधन लगातार अभिभावकों पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए छात्रों को परीक्षा में बैठने से वंचित कर देने की चेतावनी मिल रहीं हैं। अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन से लॉकडाउन अवधि यानी अप्रैल से जून तक फीस माफ करने की मांग की, लेकिन प्रबंधन ने अभिभावकों की एक भी नहीं सुनी।
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शिक्षकों को मिल रही आधी पगार
नामी-गिरामी प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की पगार कोरोना काल के चलते आधी रह गई है। सूत्र बताते हैं कि ज्यादातर स्कूल प्रबंधन ने फीस जमा न होने का हवाला देकर शिक्षकों को प्रतिमाह मिलने वाली पगार को आधा कर दिया है। वहीं स्कूल प्रबंधन अभिभावकों से पूरी फीस वसूलने में लगा है।
स्कूल बंद तो पूरी फीस देने का औचित्य नहीं
शहर के एक प्राइवेट स्कूल में बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन इस साल कोरोना संक्रमण के चलते दस माह से स्कूल बंद हैं। बच्चों की पढ़ाई भी नहीं कराई गई। ऑनलाइन पढ़ाई भी बच्चों को समझ नहीं आ रही। ऐसे में फीस को आधा किया जाना चाहिए। सरकार से मांग करते हैं कि आम बजट में अभिभावकों के लिए भी कुछ सोचें।
- कंवलजीत सिंह, अभिभावक
पढ़ाई नहीं तो फीस भी नहीं
कोविड-19 के चलते मार्च से स्कूल बंद चल रहे हैं। लॉकडाउन में दुकान बंद रहने से कमाई घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। स्कूल में पढ़ाई नहीं हुई, तो पूरी फीस क्यों दें। लॉकडाउन के दौरान तीन माह की फीस माफ की जानी चाहिए। सरकार आम बजट के माध्यम से अभिभावकों को कुछ राहत दे सकती है।
- गौरव गुप्ता, अभिभावक
परिषदीय स्कूलों में बच्चों की कक्षाएं संचालित नहीं हुई हैं। व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए बच्चों को होमवर्क दिया जा रहा है। प्राइवेट स्कूलों में भी कक्षा एक से आठ तक की कक्षाएं संचालित नहीं हुई हैं। इस संबंध में शासन स्तर से मिलने वाले निर्देशों का अनुपालन कराया जाएगा। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों की फीस माफ या कम करने के संबंध में सरकार स्तर से ही कोई निर्णय लिया जा सकता है।
- बुद्ध प्रिय सिंह, बीएसए
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प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे अभिभावकों की चिंता बढ़ती जा रही है। स्कूल प्रबंधन ऑनलाइन क्लासेज के जरिए बच्चों का कोर्स पूरा कराने की बात कह रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में खराब नेटवर्क बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज में बड़ा रोड़ा साबित हुआ है, जबकि 70 फीसदी बच्चों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधा नहीं है। मार्च 2020 में लॉकडाउन लागू होने के तीन महीने बाद बाजार खुल गए, फिर कक्षा नौ से इंटरमीडिएट व डिग्री कॉलेज खुल गए, लेकिन नर्सरी से कक्षा आठ तक की पढ़ाई अब तक शुरू नहीं हो पाई है, जबकि स्कूल प्रबंधन ने वार्षिक परीक्षा कराने की तैयारी शुरू कर दी है और बकाया फीस जमा करने के लिए अभिभावकों को मोबाइल के जरिए संदेश भेजे जा रहे हैं, जिससे अभिभावकों में बेचैनी बढ़ी है।
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अभिभावक संघ के पदाधिकारी और सदस्य कई बार डीएम को ज्ञापन देकर सरकार से छह माह की फीस माफ करने की गुहार लगा चुके हैं। सरकार ने अब तक अभिभावकों को राहत देने के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया है। वहीं जिला प्रशासन भी इस मामले में कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। अभी तक फीस को एक-एक महीने में जमा करने की सहूलियत देने के नाम पर अभिभावकों को छला गया है। इससे अभिभावकों की मुश्किलों का कोई समाधान नहीं हुआ है। जिनका व्यापार चौपट रहा, वो फीस के पैसे कैसे जुटाएंगे। वहीं अप्रैल से दिसंबर 2020 तक फीस जमा करने को लेकर स्कूल प्रबंधन लगातार अभिभावकों पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए छात्रों को परीक्षा में बैठने से वंचित कर देने की चेतावनी मिल रहीं हैं। अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन से लॉकडाउन अवधि यानी अप्रैल से जून तक फीस माफ करने की मांग की, लेकिन प्रबंधन ने अभिभावकों की एक भी नहीं सुनी।
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शिक्षकों को मिल रही आधी पगार
नामी-गिरामी प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की पगार कोरोना काल के चलते आधी रह गई है। सूत्र बताते हैं कि ज्यादातर स्कूल प्रबंधन ने फीस जमा न होने का हवाला देकर शिक्षकों को प्रतिमाह मिलने वाली पगार को आधा कर दिया है। वहीं स्कूल प्रबंधन अभिभावकों से पूरी फीस वसूलने में लगा है।
स्कूल बंद तो पूरी फीस देने का औचित्य नहीं
शहर के एक प्राइवेट स्कूल में बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन इस साल कोरोना संक्रमण के चलते दस माह से स्कूल बंद हैं। बच्चों की पढ़ाई भी नहीं कराई गई। ऑनलाइन पढ़ाई भी बच्चों को समझ नहीं आ रही। ऐसे में फीस को आधा किया जाना चाहिए। सरकार से मांग करते हैं कि आम बजट में अभिभावकों के लिए भी कुछ सोचें।
- कंवलजीत सिंह, अभिभावक
पढ़ाई नहीं तो फीस भी नहीं
कोविड-19 के चलते मार्च से स्कूल बंद चल रहे हैं। लॉकडाउन में दुकान बंद रहने से कमाई घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। स्कूल में पढ़ाई नहीं हुई, तो पूरी फीस क्यों दें। लॉकडाउन के दौरान तीन माह की फीस माफ की जानी चाहिए। सरकार आम बजट के माध्यम से अभिभावकों को कुछ राहत दे सकती है।
- गौरव गुप्ता, अभिभावक
परिषदीय स्कूलों में बच्चों की कक्षाएं संचालित नहीं हुई हैं। व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए बच्चों को होमवर्क दिया जा रहा है। प्राइवेट स्कूलों में भी कक्षा एक से आठ तक की कक्षाएं संचालित नहीं हुई हैं। इस संबंध में शासन स्तर से मिलने वाले निर्देशों का अनुपालन कराया जाएगा। प्राइवेट स्कूलों के बच्चों की फीस माफ या कम करने के संबंध में सरकार स्तर से ही कोई निर्णय लिया जा सकता है।
- बुद्ध प्रिय सिंह, बीएसए