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श्रीनगर में खाता खोलना भाजपा के लिए चुनौती
अशोक निगम लखीमपुर खीरी।
Updated Sun, 05 Feb 2017 10:54 PM IST
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elections
- फोटो : DEMO PIC
अभी तक एक बार भी यहां से नहीं जीता है भाजपा का उम्मीदवार
मगर लोकसभा चुनाव 2014 में मिले सर्वाधिक 36.48 फीसद वोट
जिले की श्रीनगर ऐसी सीट है जहां भाजपा आज तक अपना खाता नहीं खोल पाई है। दलित और अति पिछड़ी जातियों की बहुलता वाले इस क्षेत्र में मतदाता भाजपा के प्रति किस कदर उदासीन हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980, 1985 और रामलहर के दौरान 1993 में ही भाजपा का उम्मीदवार यहां दूसरे नंबर पर रहा। इसके अलावा और किसी चुनाव में भाजपा मुख्य संघर्ष में भी जगह नहीं बना पाई। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव ने यहां जरूर भाजपा के लिए उम्मीदें जगाई हैं जिसमें उसे सबसे ज्यादा 36.48 फीसद वोट मिले थे।
पूरे जिले में भाजपा के लिए सबसे ज्यादा माफिक कोई सीट रही है तो वह है मोहम्मदी, जहां से उसका उम्मीदवार 1980 के बाद चार बार जीता है। पुरानी हैदराबाद सीट जिसका नाम अब गोला हो गया है, उस पर भी भाजपा ने तीन बार जीत दर्ज की है। लेकिन पैला, निघासन और धौरहरा सीट पर भी भाजपा का उम्मीदवार सिर्फ एक-एक बार जीता है।
भाजपा की स्थापान से पहले 1974 में श्रीनगर से जरूर जनसंघ के उम्मीदवार राज बृजराज सिंह विधायक बने थे। लेकिन इसके अलावा और कोई चुनाव जनसंघ ने भी यहां से नहीं जीता। 1977 में राज बृजराज सिंह फिर विधायक बने लेकिन इस बार वह जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। 2012 के चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार मंजू त्यागी 23624 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहीं थी। दूसरे नंबर पर बसपा रही जिसे 27.15 फीसद और चौथे स्थान पर रही सपा को सिर्फ 13.55 फीसद वोट मिले थे।
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लखीमपुर में भाजपा दो बार 1991 और 1993 का चुनाव जीत सकी। दोनों बार रामगोपाल वर्मा विधायक बने। पैला में 1993 में केवल एक बार शशिबाला भारती भाजपा से विधायक बनीं तो धौरहरा से 1991 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर बाला प्रसाद अवस्थी विधायक बने।
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मगर लोकसभा चुनाव 2014 में मिले सर्वाधिक 36.48 फीसद वोट
जिले की श्रीनगर ऐसी सीट है जहां भाजपा आज तक अपना खाता नहीं खोल पाई है। दलित और अति पिछड़ी जातियों की बहुलता वाले इस क्षेत्र में मतदाता भाजपा के प्रति किस कदर उदासीन हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980, 1985 और रामलहर के दौरान 1993 में ही भाजपा का उम्मीदवार यहां दूसरे नंबर पर रहा। इसके अलावा और किसी चुनाव में भाजपा मुख्य संघर्ष में भी जगह नहीं बना पाई। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव ने यहां जरूर भाजपा के लिए उम्मीदें जगाई हैं जिसमें उसे सबसे ज्यादा 36.48 फीसद वोट मिले थे।
पूरे जिले में भाजपा के लिए सबसे ज्यादा माफिक कोई सीट रही है तो वह है मोहम्मदी, जहां से उसका उम्मीदवार 1980 के बाद चार बार जीता है। पुरानी हैदराबाद सीट जिसका नाम अब गोला हो गया है, उस पर भी भाजपा ने तीन बार जीत दर्ज की है। लेकिन पैला, निघासन और धौरहरा सीट पर भी भाजपा का उम्मीदवार सिर्फ एक-एक बार जीता है।
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भाजपा की स्थापान से पहले 1974 में श्रीनगर से जरूर जनसंघ के उम्मीदवार राज बृजराज सिंह विधायक बने थे। लेकिन इसके अलावा और कोई चुनाव जनसंघ ने भी यहां से नहीं जीता। 1977 में राज बृजराज सिंह फिर विधायक बने लेकिन इस बार वह जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। 2012 के चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार मंजू त्यागी 23624 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहीं थी। दूसरे नंबर पर बसपा रही जिसे 27.15 फीसद और चौथे स्थान पर रही सपा को सिर्फ 13.55 फीसद वोट मिले थे।
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लखीमपुर में भाजपा दो बार 1991 और 1993 का चुनाव जीत सकी। दोनों बार रामगोपाल वर्मा विधायक बने। पैला में 1993 में केवल एक बार शशिबाला भारती भाजपा से विधायक बनीं तो धौरहरा से 1991 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर बाला प्रसाद अवस्थी विधायक बने।