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लखीमपुर की रामलीला: यहां काशी की तर्ज होता है मंचन, 162 साल में नहीं बदली कोई परंपरा

Sun, 11 Oct 2026 01:59 PM IST
Mukesh Kumar संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Published by: Mukesh Kumar Updated Sun, 11 Oct 2026 01:59 PM IST
सार

लखीमपुर खीरी जिले की 162 साल पुरानी ऐतिहासिक रामलीला 11 अक्तूबर से शुरू होगी। यह रामलीला काशी के रामनगर की तर्ज पर अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष 1864 में मथुरा प्रसाद सेठ ने इसकी शुरुआत की थी। यहां रामलीला सजे मंच पर नहीं, बल्कि मेला मैदान में प्रसंगों के अनुरूप स्थान बदलकर होती है।

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Lakhimpur Ramlila Staged in the style of Kashi no traditions have changed in 162 years
मथुरा भवन में तैयारी में जुटे आयोजन समिति के सदस्य - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

वक्त बदला, रोशनी के साधन बदले और दुनिया आधुनिकता के नए दौर में पहुंच गई, लेकिन लखीमपुर खीरी की ऐतिहासिक रामलीला की परंपराएं आज भी वैसी ही हैं। कभी तेल से जलने वाले दीयों की रोशनी में होने वाली रामलीला ने लालटेन और गैस लाइट का दौर देखा और अब बिजली की रोशनी में इसका आयोजन होता है। 162 वर्षों के लंबे सफर में रोशनी के साधनों के अलावा यहां की रामलीला में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

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न मंच सजा, न पात्रों की परंपरा बदली और न ही रामचरितमानस पर आधारित प्रसंगों के सजीव मंचन का सिलसिला टूटा। आस्था, समर्पण और परंपरा की इसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए ऐतिहासिक रामलीला 11 अक्तूबर से शुरू होने जा रही है। यहां काशी के रामनगर की रामलीला की तर्ज मंचन होता है। 
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वर्ष 1864 में मथुरा प्रसाद सेठ ने काशी के रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला की तर्ज पर यहां रामलीला की शुरुआत कराई थी। तब से लेकर आज तक यह आयोजन निरंतर चला आ रहा है। इसकी खासियत यह है कि यहां रामलीला किसी सजे-धजे मंच पर नहीं होती, बल्कि मेला मैदान में अलग-अलग प्रसंगों का सजीव मंचन किया जाता है।
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रामचरितमानस पर आधारित इस रामलीला में प्रसंगों के अनुरूप स्थान बदलते हैं, जिससे दर्शकों को कथा के घटनाक्रम से जुड़ने का अवसर मिलता है। भगवान राम और केवट के मिलन का प्रसंग नगर के सेठ घाट पर उल्ल नदी में सजीव रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

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162 साल से पुरुष ही निभा रहे सभी पात्रों की भूमिका
लखीमपुर की रामलीला में पात्रों की भूमिका निभाने की परंपरा भी विशिष्ट है। रामलीला का आयोजन कराने वाले सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के सर्वराहकार विपुल सेठ ने बताया कि यहां रामलीला के सभी पात्र पुरुष ही होते हैं। भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शुत्रुघ्न व भगवान गणेश सहित नौ प्रमुख स्वरूपों की भूमिका बच्चे निभाते हैं, जबकि अन्य पात्रों की भूमिका बड़े लोग निभाते हैं। 

खास बात यह है कि रामलीला में अभिनय करने वाला कोई भी पात्र पेशेवर कलाकार नहीं है। सभी लोग अपनी आस्था और श्रद्धा के चलते स्वेच्छा से निशुल्क भाग लेते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आयोजन को स्थानीय समाज और धार्मिक आस्था से जोड़ती है।

सभी पात्र होते हैं ब्राह्मण
आयोजन कराने वाले सेठ परिवार के किशन सेठ ने बताया कि नगर की ऐतिहासिक रामलीला के लिए मथुरा भवन में पिछले एक माह से तैयारियां चल रही थीं, जो अब पूरी हो गई हैं। उन्होंने बताया कि रामलीला के सभी पात्र ब्राह्मण ही होते हैं। ये परंपरा शुरू से चली आ रही है। 

एक खासियत और है कि जब रामलीला का मंचन करने के लिए पात्र तैयार हो जाते हैं और उनका तिलक व आरती हो जाती है, तो उसके बाद कोई भी पात्र पैदल नहीं चलता। उन्हें रथ या पालकी से ही मेला मैदान व अन्य स्थलों तक ले जाया जाता है।

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