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अभी भी बदलाव की जरूरत
लखीमपुर खीरी
Updated Fri, 14 Aug 2015 07:40 PM IST
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आजादी के बाद से अब तक देश की सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक स्थितियों में काफी बदलाव आया है। वृद्ध इस बदलाव को महसूस करते हैं लेकिन जिस आजादी की कल्पना उन्होंने की थी, उससे इस आजादी को कुछ अलग पाते हैं तो उनमें खिन्नता दिखती है। उधर युवा वर्ग समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और सामाजिक असुरक्षा आदि को लेकर आजादी को अधूरी मानते हैं। उनका कहना है कि जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं होती कि सभी को समान अवसर मिले तब तक आजादी पूरी नहीं है।
वर्तिका चौरसिया का कहना है कि आजादी के 68 साल बाद भी देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमताएं हैं। महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका तो मिला लेकिन उनमें सामाजिक असुरक्षा की भावना अभी तक खत्म नहीं हो पाई है। लोग न देश के प्रति और न ही समाज के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं जितनी उन्हें निभानी चाहिए।
सत्यदेव दीक्षित का कहना है कि आजादी के इतने साल बाद भी युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे देशों का मुंह ताकना पड़ रहा है। देश की प्रतिभाओं को रोजी और रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। लड़कियों और महिलाओं को सड़कों पर निकलने में डर लगता है ऐसे में यह कैसी आजादी। व्यवस्था में सुधार के लिए दूसरों को कोसने की बजाय हमें अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
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इशिता पालीवाल का कहना है कि आजादी के बाद तेजी से देश का विकास हुआ है। लंबे अरसे तक गुलामी झेलने के कारण स्थितियां बदलने में समय तो लगेगा। इसके लिए लोगों को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी। साथ ही देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी। जब हम खुद जिम्मेदार बनेंगे तभी दूसरों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करा सकेंगे।
श्यामजी अवस्थी का कहना है कि सुना है आजादी के पहले स्थितियां बेहद खराब थीं लोग मूलभूत सुविधाओं तक को तरसते थे। आजादी के बाद सुविधाओं का विस्तार तो हुआ लेकिन यह सुविधाएं चंद लोगों तक ही सिमट कर रह गईं। सरकारी सुविधाओं का लाभ कड़ी के अंतिम व्यक्ति तक को मिलना चाहिए। सामंतवाद आज भी कायम है बस रूप जरूर बदल गया है। आज राजाओं और जमींदारों की जगह राजनीतिकों ने ले ली है।
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वर्तिका चौरसिया का कहना है कि आजादी के 68 साल बाद भी देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमताएं हैं। महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका तो मिला लेकिन उनमें सामाजिक असुरक्षा की भावना अभी तक खत्म नहीं हो पाई है। लोग न देश के प्रति और न ही समाज के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं जितनी उन्हें निभानी चाहिए।
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सत्यदेव दीक्षित का कहना है कि आजादी के इतने साल बाद भी युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे देशों का मुंह ताकना पड़ रहा है। देश की प्रतिभाओं को रोजी और रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। लड़कियों और महिलाओं को सड़कों पर निकलने में डर लगता है ऐसे में यह कैसी आजादी। व्यवस्था में सुधार के लिए दूसरों को कोसने की बजाय हमें अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
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इशिता पालीवाल का कहना है कि आजादी के बाद तेजी से देश का विकास हुआ है। लंबे अरसे तक गुलामी झेलने के कारण स्थितियां बदलने में समय तो लगेगा। इसके लिए लोगों को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी। साथ ही देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी। जब हम खुद जिम्मेदार बनेंगे तभी दूसरों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करा सकेंगे।
श्यामजी अवस्थी का कहना है कि सुना है आजादी के पहले स्थितियां बेहद खराब थीं लोग मूलभूत सुविधाओं तक को तरसते थे। आजादी के बाद सुविधाओं का विस्तार तो हुआ लेकिन यह सुविधाएं चंद लोगों तक ही सिमट कर रह गईं। सरकारी सुविधाओं का लाभ कड़ी के अंतिम व्यक्ति तक को मिलना चाहिए। सामंतवाद आज भी कायम है बस रूप जरूर बदल गया है। आज राजाओं और जमींदारों की जगह राजनीतिकों ने ले ली है।