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सुहेली की सिल्ट समस्या नहीं किसानों के दिल का है दर्द
अमर उजाला ब्यूरो-पलियाकलां।
Updated Wed, 01 Jun 2016 10:43 PM IST
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कोठी थाना क्षेत्र के पैगम्बरपुर गांव के पास मचपुरा माइनर कटने से डूबी फसल।
- फोटो : अमर उजाला
अमर उजाला में खबर छपी तो आगे आए लोग
किसान बोले बहुत हो चुकी राजनीति, डीएम का जताया आभार
सुहेली नदी की सिल्ट महज एक समस्या नहीं बल्कि लोगों के दिल का दर्द बन कर सामने आई है। सालों से पानी की तबाही झेल रहे लोगों को आर्थिक रूप से इसने कमजोर कर दिया है। नदी की धार अपनी जगह से गायब हो चुकी है और नई जगह पर धार चले जाने से यहां पर लोगों के खेत बाढ़ में और सिल्टिंग से बर्बाद हो रहे हैं। नई जगह पर धार चलने से वहां तबाही का मंजर है। दर्द तब सामने आया जब नदी की धार में रास्ता बन गया। किसानों को लगा कि अब तक राजनीति बहुत हो चुकी अब खुद ही कुछ करना होगा। इस मुहिम को शुरू करने न तो कोई नेता पहुंचा था और न ही अफसर। अमर उजाला ने जब किसानों के इस दर्द की खबर छापी तो लोग खुद ही आगे आए और हालात से निपटने की तैयारी शुरू कर दी।
इसके बाद अफसर भी जागे और नेता भी। हालात से निपटने के लिए जज्बे की जरूरत है। इस जज्बे को यहां के किसानों ने कर दिखाया। अब तक सैकड़ों किसान जुड़ चुके हैं और उन्होंने सीधे कह दिया कि अब बहुत हो चुकी है बयान बाजियां अब हम पर पड़ी है और हम ही निपटेंगे। 25 मई तक सूखी सुहेली पर बोलने को किसी के पास कुछ भी नहीं था अमर उजाला ने जब इस दर्द को बयां किया तो सबसे पहले डीएम आकाशदीप संजीदा हुए और उन्होंने किसानों के जज्बे को देखते हुए एक्सपर्ट ओपीनियन के लिए टीम भेज दी। साथ में किसान भी थे। टीम में शामिल अधिकारी बोले समस्या काफी बड़ी है लेकिन नामुमकिन नहीं है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट तैयार करनी शुरू कर दी है। दुधवा के डीडी महावीर कौजलगि भी संजीदा हैं और उन्होंने अनुमति पत्र भेज दिया है और जल्द से जल्द अनुमति दिलाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। एक दिक्कत और दिखाई दे रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत खनन मुमकिन नहीं लेकिन जानकारों की माने तो खनन और डिसिल्टिंग में काफी फर्क है और इस पर वह कानून लागू नहीं होता है। बारिश का मौसम करीब आ रहा है लेकिन किसानों के हौसले पस्त नहीं है उनका कहना है कि वह काम कराने के लिए कमर कसे हुए हैं लेकिन प्रशासन और शासन से मदद होती है तो कार्य और भी बेहतर हो जाएगा। बारिश के मौसम की बात कहते हुए उनका कहना है कि अगर बारिश हो भी जाती है तो सुहेली में जहां पर डिसिल्टिंग होनी है वहां आसानी से काम किया जा सकता है और कोई भी दिक्कत पेश नहीं आएगी। क्योंकि यहां का हिस्सा काफी ऊंचा है और पानी यहां नहीं रुक रहा है। उन्होंने डीएम और डीडी के प्रयासों के साथ अमर उजाला को भी धन्यवाद ज्ञापित कर कहा है कि डीएम और डीडी के प्रयास से उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही अनुमति भी मिल जाएगी और जिला प्रशासन के स्तर से ही किसी न किसी मद से बजट भी मिल जाएगा। ऐसा नहीं हुआ तो वे बर्बादी से निपटने के लिए खुद तैयार हैं। उन्होंने कहा है कि यह दर्द सिर्फ किसानों का ही नहीं, आम लोगों का भी है जो बाढ़ के खतरे से दो चार हो रहे हैं। साथ ही उन जीवों का है जो सुहेली नदी के पानी से अपनी प्यास बुझा रहे थे।
जब नहीं रह गई थी आस तो इन्होंने कर दिखाया था मुमकिन
बिजुआ ब्लाक का ही मामला देख लें यहां दंबल टांडा गांव शारदा में कट रहा था और कुछ घर बचे थे और सैकड़ों एकड़ जमीन। समाजवादी पार्टी के ब्लाक अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह बिग्गी दंबल टांडा गांव को बचाने के लिए सांसद रवि प्रकाश वर्मा से मिले। सांसद की सिफारिश से शारदा नगर से आई तकनीकी टीम ने प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1.52 करोड़ बताई। शासन से इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम पास होना मुमकिन नहीं था तब ऐसे हालात में सुुरेंद्र सिंह ने अपने चार भाइयों से बात करके खुद ही नदी में बंधा बनाने की जिम्मेदारी ले ली। उस जिम्मेदारी निभाने में 12 लाख रुपये लगे और तीन ठोकरें बनकर तैयार हो गईं। वह एक किसान का जज्बा था जिसने इलाके की सैकड़ों जमीन और चंद बचे घरों को नदी में समाने से बचा लिया। इससे पहले सन 2009 में भीरा में झादी ताल की ओर बढ़ रही शारदा को रोकने के लिए इलाके के किसान जसवंत सिंह कलेर ने भी बीड़ा उठाया था। बगैर किसी सरकारी सहायता के लोगों के साथ मिलकर नदी की उस धार के सामने रेत का पहाड़ खड़ा कर दिया था। जिस धार से किशनपुर सेंक्चुरी का झादी ताल, गिरदा गौड़ी समेत कई गांव और उनकी कृषि भूमि प्रभावित हो रही थी।
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फौरी रिपोर्ट डीडी दुधवा नेशनल पार्क को सौंप दी गई है वह इसे डीएम को प्रेषित करेंगे। कितना धन लगेगा यह विस्तृत सर्वे में आएगा और यह कार्य सिंचाई खंड शारदानगर के आधीन है। सारे कार्य हो जाएं तो बारिश में भी यहां कार्य हो सकता है।
-श्याम सुंदर, सहायक अभियंता, बाढ़ खंड
डिसिल्टिंग और खनन अलग अलग बाते हैं पार्क अनुमति के बाद डिसिल्टिंग कार्य किया जा सकता है।
-शादाब असलम, एसडीएम, पलिया-खीरी
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किसान बोले बहुत हो चुकी राजनीति, डीएम का जताया आभार
सुहेली नदी की सिल्ट महज एक समस्या नहीं बल्कि लोगों के दिल का दर्द बन कर सामने आई है। सालों से पानी की तबाही झेल रहे लोगों को आर्थिक रूप से इसने कमजोर कर दिया है। नदी की धार अपनी जगह से गायब हो चुकी है और नई जगह पर धार चले जाने से यहां पर लोगों के खेत बाढ़ में और सिल्टिंग से बर्बाद हो रहे हैं। नई जगह पर धार चलने से वहां तबाही का मंजर है। दर्द तब सामने आया जब नदी की धार में रास्ता बन गया। किसानों को लगा कि अब तक राजनीति बहुत हो चुकी अब खुद ही कुछ करना होगा। इस मुहिम को शुरू करने न तो कोई नेता पहुंचा था और न ही अफसर। अमर उजाला ने जब किसानों के इस दर्द की खबर छापी तो लोग खुद ही आगे आए और हालात से निपटने की तैयारी शुरू कर दी।
इसके बाद अफसर भी जागे और नेता भी। हालात से निपटने के लिए जज्बे की जरूरत है। इस जज्बे को यहां के किसानों ने कर दिखाया। अब तक सैकड़ों किसान जुड़ चुके हैं और उन्होंने सीधे कह दिया कि अब बहुत हो चुकी है बयान बाजियां अब हम पर पड़ी है और हम ही निपटेंगे। 25 मई तक सूखी सुहेली पर बोलने को किसी के पास कुछ भी नहीं था अमर उजाला ने जब इस दर्द को बयां किया तो सबसे पहले डीएम आकाशदीप संजीदा हुए और उन्होंने किसानों के जज्बे को देखते हुए एक्सपर्ट ओपीनियन के लिए टीम भेज दी। साथ में किसान भी थे। टीम में शामिल अधिकारी बोले समस्या काफी बड़ी है लेकिन नामुमकिन नहीं है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट तैयार करनी शुरू कर दी है। दुधवा के डीडी महावीर कौजलगि भी संजीदा हैं और उन्होंने अनुमति पत्र भेज दिया है और जल्द से जल्द अनुमति दिलाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। एक दिक्कत और दिखाई दे रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत खनन मुमकिन नहीं लेकिन जानकारों की माने तो खनन और डिसिल्टिंग में काफी फर्क है और इस पर वह कानून लागू नहीं होता है। बारिश का मौसम करीब आ रहा है लेकिन किसानों के हौसले पस्त नहीं है उनका कहना है कि वह काम कराने के लिए कमर कसे हुए हैं लेकिन प्रशासन और शासन से मदद होती है तो कार्य और भी बेहतर हो जाएगा। बारिश के मौसम की बात कहते हुए उनका कहना है कि अगर बारिश हो भी जाती है तो सुहेली में जहां पर डिसिल्टिंग होनी है वहां आसानी से काम किया जा सकता है और कोई भी दिक्कत पेश नहीं आएगी। क्योंकि यहां का हिस्सा काफी ऊंचा है और पानी यहां नहीं रुक रहा है। उन्होंने डीएम और डीडी के प्रयासों के साथ अमर उजाला को भी धन्यवाद ज्ञापित कर कहा है कि डीएम और डीडी के प्रयास से उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही अनुमति भी मिल जाएगी और जिला प्रशासन के स्तर से ही किसी न किसी मद से बजट भी मिल जाएगा। ऐसा नहीं हुआ तो वे बर्बादी से निपटने के लिए खुद तैयार हैं। उन्होंने कहा है कि यह दर्द सिर्फ किसानों का ही नहीं, आम लोगों का भी है जो बाढ़ के खतरे से दो चार हो रहे हैं। साथ ही उन जीवों का है जो सुहेली नदी के पानी से अपनी प्यास बुझा रहे थे।
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जब नहीं रह गई थी आस तो इन्होंने कर दिखाया था मुमकिन
बिजुआ ब्लाक का ही मामला देख लें यहां दंबल टांडा गांव शारदा में कट रहा था और कुछ घर बचे थे और सैकड़ों एकड़ जमीन। समाजवादी पार्टी के ब्लाक अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह बिग्गी दंबल टांडा गांव को बचाने के लिए सांसद रवि प्रकाश वर्मा से मिले। सांसद की सिफारिश से शारदा नगर से आई तकनीकी टीम ने प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1.52 करोड़ बताई। शासन से इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम पास होना मुमकिन नहीं था तब ऐसे हालात में सुुरेंद्र सिंह ने अपने चार भाइयों से बात करके खुद ही नदी में बंधा बनाने की जिम्मेदारी ले ली। उस जिम्मेदारी निभाने में 12 लाख रुपये लगे और तीन ठोकरें बनकर तैयार हो गईं। वह एक किसान का जज्बा था जिसने इलाके की सैकड़ों जमीन और चंद बचे घरों को नदी में समाने से बचा लिया। इससे पहले सन 2009 में भीरा में झादी ताल की ओर बढ़ रही शारदा को रोकने के लिए इलाके के किसान जसवंत सिंह कलेर ने भी बीड़ा उठाया था। बगैर किसी सरकारी सहायता के लोगों के साथ मिलकर नदी की उस धार के सामने रेत का पहाड़ खड़ा कर दिया था। जिस धार से किशनपुर सेंक्चुरी का झादी ताल, गिरदा गौड़ी समेत कई गांव और उनकी कृषि भूमि प्रभावित हो रही थी।
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फौरी रिपोर्ट डीडी दुधवा नेशनल पार्क को सौंप दी गई है वह इसे डीएम को प्रेषित करेंगे। कितना धन लगेगा यह विस्तृत सर्वे में आएगा और यह कार्य सिंचाई खंड शारदानगर के आधीन है। सारे कार्य हो जाएं तो बारिश में भी यहां कार्य हो सकता है।
-श्याम सुंदर, सहायक अभियंता, बाढ़ खंड
डिसिल्टिंग और खनन अलग अलग बाते हैं पार्क अनुमति के बाद डिसिल्टिंग कार्य किया जा सकता है।
-शादाब असलम, एसडीएम, पलिया-खीरी