लिलौटीनाथ शिव मंदिर: यहां प्रथम पूजन करते हैं अश्वत्थामा और आल्हा उदल, दिन में तीन बार रंग बदलता है शिवलिंग
लखीमपुर खीरी में शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर जुनई और कंडवा नदी के बीच स्थित लिलौटीनाथ मंदिर शिवभक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यहां शिवलिंग की स्थापना द्वापर युग में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी।
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लखीमपुर खीरी में महाभारतकालीन लिलौटीनाथ शिव मंदिर अपनी महत्ता और पौराणिकता के लिए विख्यात है। शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर जुनई और कंडवा नदी के बीच स्थित लिलौटीनाथ मंदिर के बारे में मान्यता है कि शिवलिंग की स्थापना द्वापर युग में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी। किवदंती है कि अश्वत्थामा और आल्हा उदल इस मंदिर में प्रथम पूजा करते हैं। कपाट खुलने से पहले शिवलिंग पूजित मिलता है और रंग बदलता है।
लिलौटीनाथ शिव मंदिर में शिवलिंग में आकृति उभरी है। श्रद्धालु इसे माता पार्वती का स्वरूप मानते हैं। मान्यता है कि शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। सुबह काला, दोपहर भूरा और रात में शिवलिंग से सफेद छटा बिखेरता है। मंदिर में वैसे तो प्रतिदिन भक्तों का आना जाना रहता है। सावन में हजारों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है।
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महेवा स्टेट के राजाओं ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। अब मंदिर समिति पर देखभाल का जिम्मा है। मंदिर में पंचमुखी हनुमान, दक्षिण मुखी, सूर्य देव, मां दुर्गा, विष्णु जी और घाट पर दक्षिणेश्वर शिव विराजमान हैं। जिले के अलावा दूर दराज से भी श्रद्धालु पूजन और मनौती मांगने आते हैं।
बबुरी और खैर के जंगल के बीच था मंदिर
जानकारों के मुताबिक कालांतर में लिलौटी धाम काफी बड़े भू भाग में फैला था। बबुरी और खैर के जंगल थे। इस बीच शिवलिंग मिलने से स्टेट की महारानी की इच्छा पर राजाओं ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। समय के साथ जंगल मिटते गए। करीब दस एकड़ का क्षेत्रफल आज भी यहां की हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करता है।
कपाट खुलने पर पूजित मिलता है शिवलिंग
पौराणिक लिलौटी मंदिर सुबह चार बजे खुल जाता है। महंत रोहित गिरि बताते हैं कि रात गर्भ गृह और प्रांगण की साफ सफाई कर मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। भोर होते ही कपाट खुलते है तो शिव लिंग पर पुष्प, बेलपत्र, अच्छत चढ़ा मिलता है।
अमावस्या पर लगता है मेला
लिलौटी मंदिर प्रांगण में हर अमावस्या पर मेला लगता है। भंडारे और प्रसाद का वितरण होता है। स्थानीय और जिले के अन्य जगहों के दुकानदार खिलौने, मिठाई, लकड़ी घरेलू समान की दुकान आकर्षण होती है। चारों और जंगल की हरियाली और जूनई कंडवा के संगम किनारे लोग बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।