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चवन्नी-चवन्नी जुटाकर मोहम्मदी में शुरू हुई थी रामलीला
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मोहम्मदी में धनुष भंग की लीला का मंचन करते कलाकार।
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मोहम्मदी। नगर में लगभग 120 वर्ष पुरानी रामलीला की शुरुआत महज चार रुपये से हुई थी। वर्ष 1899 में मोहम्मदी में चल रही इस रामलीला की शुरुआत पुतन्नी तिराहे के निकट शिव मंदिर में बिंद्रा प्रसाद भल्ला, बच्चू भट्ट और कुछ साधुओं ने चवन्नी-चवन्नी चंदा जुटाकर की थी। उस दौरान 16 कहारों ने सिंहासन उठाने की जिम्मेदारी ली।
बुजुर्ग बताते हैं कि जिस समय सिंहासन नगर की बाजार से होकर निकलता था, उस समय कोई व्यापारी अपनी दुकान की गद्दी पर बैठा नहीं मिलता था। पात्रों को सजाने और लीला करवाने की जिम्मेदारी ली थी लल्ला मिश्रा ने। लंबे समय तक उन्होंने रामलीला करवाई। 1950 में उनका निधन हो गया। उनके बाद लल्ला मिश्रा के बेटे भिखारी लाल मिश्रा ने लंबे समय तक रामलीला करवाई। अपनी चौपाई गायन की विशिष्ट शैली के कारण उन्हें काफी लोकप्रियता मिली। उनके निधन के बाद मौजूदा समय में उनके दामाद चंद्रभाल मिश्रा रामलीला आयोजन का दायित्व निभा रहे हैं।
मोहम्मदी में रामलीला की खासियत है कि यह मंच पर नहीं होती, बल्कि बड़े मैदान में होती है। नगर के लाला कामेश्वर दयाल के पुत्र अतुल रस्तोगी बताते हैं कि 1955 में रामलीला की जिम्मेदारी समाजसेवी कामेश्वर दयाल रस्तोगी को दी गई, उनके प्रयास से रामलीला का स्तर काफी ऊंचा हुआ। 15 दिन के मेले में दूर-दूर से खेल तमाशे और दुकानें लगने लगीं। दिन में लीला होती थी रात को कथा व उसके बाद नाटक होता था, दंगल की शुरुआत भी इन्हीं के प्रयासों से हुई। धीरे-धीरे मेले में और सुधार हुआ। कवि सम्मेलन समेत कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कलाकार, कवि, शायर आदि शामिल हुआ करते थे।
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वर्ष 1988 से रामलीला मेला नगर पालिका परिषद की देखरेख में हो रहा है, जिसमें पहले हर वर्ष नगर के नागरिकों से एक कमेटी बनाई जाती थी, जिसके माध्यम से मेला होता था। रामलीला मैदान में रामकुमार कटियार और कामता प्रसाद गुप्ता ने एक बड़ा द्वार बनवाया था। अब नगर पालिका परिषद मोहम्मदी के अध्यक्ष और सभासदों के माध्यम से अलग-अलग कार्यक्रमों की टीमें बनाकर मेला हो रहा है।
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बुजुर्ग बताते हैं कि जिस समय सिंहासन नगर की बाजार से होकर निकलता था, उस समय कोई व्यापारी अपनी दुकान की गद्दी पर बैठा नहीं मिलता था। पात्रों को सजाने और लीला करवाने की जिम्मेदारी ली थी लल्ला मिश्रा ने। लंबे समय तक उन्होंने रामलीला करवाई। 1950 में उनका निधन हो गया। उनके बाद लल्ला मिश्रा के बेटे भिखारी लाल मिश्रा ने लंबे समय तक रामलीला करवाई। अपनी चौपाई गायन की विशिष्ट शैली के कारण उन्हें काफी लोकप्रियता मिली। उनके निधन के बाद मौजूदा समय में उनके दामाद चंद्रभाल मिश्रा रामलीला आयोजन का दायित्व निभा रहे हैं।
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मोहम्मदी में रामलीला की खासियत है कि यह मंच पर नहीं होती, बल्कि बड़े मैदान में होती है। नगर के लाला कामेश्वर दयाल के पुत्र अतुल रस्तोगी बताते हैं कि 1955 में रामलीला की जिम्मेदारी समाजसेवी कामेश्वर दयाल रस्तोगी को दी गई, उनके प्रयास से रामलीला का स्तर काफी ऊंचा हुआ। 15 दिन के मेले में दूर-दूर से खेल तमाशे और दुकानें लगने लगीं। दिन में लीला होती थी रात को कथा व उसके बाद नाटक होता था, दंगल की शुरुआत भी इन्हीं के प्रयासों से हुई। धीरे-धीरे मेले में और सुधार हुआ। कवि सम्मेलन समेत कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई, जिनमें राष्ट्रीय स्तर के कलाकार, कवि, शायर आदि शामिल हुआ करते थे।
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वर्ष 1988 से रामलीला मेला नगर पालिका परिषद की देखरेख में हो रहा है, जिसमें पहले हर वर्ष नगर के नागरिकों से एक कमेटी बनाई जाती थी, जिसके माध्यम से मेला होता था। रामलीला मैदान में रामकुमार कटियार और कामता प्रसाद गुप्ता ने एक बड़ा द्वार बनवाया था। अब नगर पालिका परिषद मोहम्मदी के अध्यक्ष और सभासदों के माध्यम से अलग-अलग कार्यक्रमों की टीमें बनाकर मेला हो रहा है।