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स्वाधीनता महायज्ञ में राजनरायन ने दी अंतिम आहुति
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Mon, 14 Aug 2017 11:18 PM IST
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स्वतंत्रता आंदोलन
- फोटो : अमर उजाला
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क्रांति के लिए शस्त्र जुटाते हत्या के लिए हुई थी फांसी
शहादत के जोश में बढ़ गया था छह पौंड वजन
स्वतंत्रता समर के महायज्ञ में अंतिम आहुति देने का श्रेय भी खीरी जिले को जाता है। जिले के राजनरायन मिश्र को दी गई फांसी स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम फांसी थी। जिलेदार की हत्या के आरोप में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से फांसी दिए जाने के समय तक शहादत के जोश में राजनरायन मिश्र का वजन छह पौंड बढ़ गया था। यह देख अंग्रेज भी हतप्रभ रह गए।
जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर शोध करने वाले डॉ. रामपाल सिंह बताते हैं कि जिले के भीखमपुर गांव में जन्मे राजनरायन मिश्र किशोरावस्था से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। सशस्त्र क्रांति के लिए शस्त्र इकट्ठा करने के लिए वह महमूदाबाद रियासत के जिलेदार से बंदूक मांगने उसके घर पहुंचे। बंदूक मांगी तो उसने बंदूक देने की बजाय राजनरायन पर ही तान दी। जिलेदार को खुद पर हमलावर होते देख राजनरायन ने उसकी बंदूक छीन कर उसे गोली से उड़ा दिया और फरार हो गए।
फरार होने के बाद राजनरायन अपना नाम बदलकर देश के विभिन्न हिस्सों में घूमते हुए क्रांति का सृजन करते रहे। जब गांधी जी ने आगा खां महल की कैद में 21 दिन का ऐतिहासिक अनशन किया तो राजनरायन मिश्र को हड़ताल कराने के दंड स्वरूप मुंबई में छह माह की सजा मिली, जिसे उन्होंने अपना नाम पता बदलकर भुगता। अक्टूबर 1943 में जेल से छूटने के बाद जब वह प्रदेश में लौटे तो उन्हें मेरठ में गिरफ्तार कर लिया गया।
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मुकदमा चला और 27 जून 1944 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। अंत में उन्हें लखनऊ की जिला जेल ले जाया गया और नौ दिसंबर 1944 की सुबह उन्हें वहीं फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी उम्र महज 24 साल थी। फांसी के तख्ते पर खड़े होकर राजनरायन मिश्र ने वंदेमातरम गीत गाया और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए। इस तरह 1857 में मंगल पांडेय ने अपने प्राणों की आहुति देकर जिस स्वतंत्रता समर के महायज्ञ का श्रीगणेश किया था, राजनरायन मिश्र ने उसमें अपने प्राणों की अंतिम आहुति दी।
उपेक्षित हैं शहीद के स्मारक
शहीद राजनरायन मिश्र की याद में जिला मुख्यालय पर एक स्मारक बना है। इसमें सीतापुर आंख अस्पताल की शाखा चल रही हैं। स्मारक प्रांगण में बनी मूर्ति को एक साल पहले छत नसीब हो पाई है। शहीद के पैतृक गांव भीखमपुर में लगी शहीद की प्रतिमा को तो अभी तक छत नहीं मिल पाई है। स्मारक के आसपास की जगह का इस्तेमाल गांव के लोग अपने मवेशी बांधने और भूसा आदि रखने के लिए कर रहे हैं।
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शहादत के जोश में बढ़ गया था छह पौंड वजन
स्वतंत्रता समर के महायज्ञ में अंतिम आहुति देने का श्रेय भी खीरी जिले को जाता है। जिले के राजनरायन मिश्र को दी गई फांसी स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम फांसी थी। जिलेदार की हत्या के आरोप में फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से फांसी दिए जाने के समय तक शहादत के जोश में राजनरायन मिश्र का वजन छह पौंड बढ़ गया था। यह देख अंग्रेज भी हतप्रभ रह गए।
जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर शोध करने वाले डॉ. रामपाल सिंह बताते हैं कि जिले के भीखमपुर गांव में जन्मे राजनरायन मिश्र किशोरावस्था से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। सशस्त्र क्रांति के लिए शस्त्र इकट्ठा करने के लिए वह महमूदाबाद रियासत के जिलेदार से बंदूक मांगने उसके घर पहुंचे। बंदूक मांगी तो उसने बंदूक देने की बजाय राजनरायन पर ही तान दी। जिलेदार को खुद पर हमलावर होते देख राजनरायन ने उसकी बंदूक छीन कर उसे गोली से उड़ा दिया और फरार हो गए।
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फरार होने के बाद राजनरायन अपना नाम बदलकर देश के विभिन्न हिस्सों में घूमते हुए क्रांति का सृजन करते रहे। जब गांधी जी ने आगा खां महल की कैद में 21 दिन का ऐतिहासिक अनशन किया तो राजनरायन मिश्र को हड़ताल कराने के दंड स्वरूप मुंबई में छह माह की सजा मिली, जिसे उन्होंने अपना नाम पता बदलकर भुगता। अक्टूबर 1943 में जेल से छूटने के बाद जब वह प्रदेश में लौटे तो उन्हें मेरठ में गिरफ्तार कर लिया गया।
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मुकदमा चला और 27 जून 1944 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। अंत में उन्हें लखनऊ की जिला जेल ले जाया गया और नौ दिसंबर 1944 की सुबह उन्हें वहीं फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी उम्र महज 24 साल थी। फांसी के तख्ते पर खड़े होकर राजनरायन मिश्र ने वंदेमातरम गीत गाया और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए। इस तरह 1857 में मंगल पांडेय ने अपने प्राणों की आहुति देकर जिस स्वतंत्रता समर के महायज्ञ का श्रीगणेश किया था, राजनरायन मिश्र ने उसमें अपने प्राणों की अंतिम आहुति दी।
उपेक्षित हैं शहीद के स्मारक
शहीद राजनरायन मिश्र की याद में जिला मुख्यालय पर एक स्मारक बना है। इसमें सीतापुर आंख अस्पताल की शाखा चल रही हैं। स्मारक प्रांगण में बनी मूर्ति को एक साल पहले छत नसीब हो पाई है। शहीद के पैतृक गांव भीखमपुर में लगी शहीद की प्रतिमा को तो अभी तक छत नहीं मिल पाई है। स्मारक के आसपास की जगह का इस्तेमाल गांव के लोग अपने मवेशी बांधने और भूसा आदि रखने के लिए कर रहे हैं।