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Lakhimpur Kheri News: देश में माैजूद 295 हाथियों में 180 को भाया दुधवा
Mon, 11 Aug 2025 11:35 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Mon, 11 Aug 2025 11:35 PM IST
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दुधवा केजलाशय में पानी पीता हाथियों का झुंड। स्रोत : वन विभाग।
बांकेगंज। हाथियों को भी दुधवा टाइगर रिजर्व (डीटीआर) की आबोहवा रास आ रही है। यही कारण है कि यहां बाघों के साथ-साथ इनका कुनबा भी बढ़ रहा है।
वर्तमान में यहां इनकी संख्या करीब 180 तक पहुंच गई है। वर्ष 2020 में यह संख्या 149 थी। प्रदेश में इस समय करीब 295 हाथी हैं। इनमें सबसे ज्यादा डीटीआर में हैं। वर्ष 2020 में प्रदेश में इनकी संख्या 252 थी।
करीब 2200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले डीटीआर में साल और सागौन के हरे-भरे जंगल अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं। यहां 153 बाघों और एक सींग वाले 46 गैंडों का कुनबा है, तो 180 हाथियों की चिंघाड़ भी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
यहां के जंगल में विचरण करने वाले हाथियों की संख्या जहां सात साल पहले 70 थी, जो वर्ष 2020 में बढ़कर 149 हो गई है। तीन साल में इनकी संख्या बढ़कर तक 180 तक पहुंच गई है। मंद प्रजनन क्षमता वाले हाथियों की बढ़ती आबादी काफी उत्साहजनक है। संवाद
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इंसेट
पड़ोसी देश के गजराजों ने भी बनाया आशियाना
दुधवा का जंगल पड़ोसी देश नेपाल के हाथियों को भी खूब भाता है। बड़ी संख्या में नेपाली हाथियों ने दुधवा जंगल को ही अपना आशियाना बना लिया है। यहां जंगल में आसानी से भोजन-पानी की उपलब्धता और विश्राम के लिए घने जंगल नेपाली हाथियों को इतने पसंद आते हैं कि वह अपने घर वापसी के बजाय दुधवा के जंगल को ही अपना बसेरा बना लेते हैं।
इंसेट
तराई हाथी रिजर्व से मिलेंगे नए आयाम
तराई क्षेत्र में जंगली हाथियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए इनके संरक्षण और संवर्धन के मद्देनजर सरकार ने अक्तूबर 2022 में डीटीआर, पीटीआर समेत दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी और गोला रेंज जंगल को मिलाकर तराई हाथी रिजर्व घोषित किया है। यह देश का 33वां और प्रदेश का दूसरा हाथी रिजर्व है। इसका कुल क्षेत्रफल 3049.39 वर्ग किलोमीटर है। यह चार जिलों लखीमपुर खीरी, बहराइच, पीलीभीत और शाहजहांपुर तक फैला है। तराई हाथी रिजर्व बन जाने से इनकी सुरक्षा के साथ-साथ उनका कुनबा बढ़ाने में मदद मिलेगी। डीटीआर प्रशासन हाथियों के आने-जाने के नए कॉरीडोर खोजेगा। यही नहीं जहां नेपाल के हाथियों के झुंड निकलते हैं और महीनों तक रहते हैं, उन कॉरीडोर का पता लगाकर उसे बाधामुक्त किया जाएगा। पास के खेतों में अगर बिजली की लाइन होगी तो उसे भी हटाया जाएगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि हाथी उन्हीं रास्तों से आवागमन करते हैं, जिन रास्तों से उनके पूर्वज आते-जाते रहे हैं। हाथी अपनी आनुवांशिक स्मृति के चलते ऐसा कर पाते हैं।
इंसेट
हाथियों का अनाथाश्रम और सुधार गृह भी है दुधवा
दुधवा में दूसरे जंगलों से अनाथ मिले हाथी शिशुओं का वात्सल्य मय पालन पोषण भी किया जा रहा है। वर्ष 2018 में बिजनौर जिले के अमानगढ़ जंगल में मिली अनाथ गज शिशु दुर्गा और इसी जंगल से 1923 में मादा शिशु गौरी को ममता मय प्यार मिल रहा है। यह दोनों न केवल पार्क प्रशासन, बल्कि सैलानियों की भी लाडल बनी हुई हैं। इसके साथ ही कुख्यात दस्यु ददुआ की सेवा में रहे एक हाथी और वाराणसी जिले में एक व्यक्ति की जान लेने वाले हाथी के लिए दुधवा सुधार गृह बना।
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दुधवा के जंगलों में बाघों के साथ हाथियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। तराई हाथी रिजर्व बन जाने से इनका संरक्षण और संवर्धन का कार्य और बेहतर ढंग से हो सकेगा। इनके कॉरीडोर चिह्नित कर उन्हें निर्बाध बनाया जाएगा।
-डॉ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व
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वर्तमान में यहां इनकी संख्या करीब 180 तक पहुंच गई है। वर्ष 2020 में यह संख्या 149 थी। प्रदेश में इस समय करीब 295 हाथी हैं। इनमें सबसे ज्यादा डीटीआर में हैं। वर्ष 2020 में प्रदेश में इनकी संख्या 252 थी।
करीब 2200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले डीटीआर में साल और सागौन के हरे-भरे जंगल अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं। यहां 153 बाघों और एक सींग वाले 46 गैंडों का कुनबा है, तो 180 हाथियों की चिंघाड़ भी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
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यहां के जंगल में विचरण करने वाले हाथियों की संख्या जहां सात साल पहले 70 थी, जो वर्ष 2020 में बढ़कर 149 हो गई है। तीन साल में इनकी संख्या बढ़कर तक 180 तक पहुंच गई है। मंद प्रजनन क्षमता वाले हाथियों की बढ़ती आबादी काफी उत्साहजनक है। संवाद
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पड़ोसी देश के गजराजों ने भी बनाया आशियाना
दुधवा का जंगल पड़ोसी देश नेपाल के हाथियों को भी खूब भाता है। बड़ी संख्या में नेपाली हाथियों ने दुधवा जंगल को ही अपना आशियाना बना लिया है। यहां जंगल में आसानी से भोजन-पानी की उपलब्धता और विश्राम के लिए घने जंगल नेपाली हाथियों को इतने पसंद आते हैं कि वह अपने घर वापसी के बजाय दुधवा के जंगल को ही अपना बसेरा बना लेते हैं।
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तराई हाथी रिजर्व से मिलेंगे नए आयाम
तराई क्षेत्र में जंगली हाथियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए इनके संरक्षण और संवर्धन के मद्देनजर सरकार ने अक्तूबर 2022 में डीटीआर, पीटीआर समेत दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी और गोला रेंज जंगल को मिलाकर तराई हाथी रिजर्व घोषित किया है। यह देश का 33वां और प्रदेश का दूसरा हाथी रिजर्व है। इसका कुल क्षेत्रफल 3049.39 वर्ग किलोमीटर है। यह चार जिलों लखीमपुर खीरी, बहराइच, पीलीभीत और शाहजहांपुर तक फैला है। तराई हाथी रिजर्व बन जाने से इनकी सुरक्षा के साथ-साथ उनका कुनबा बढ़ाने में मदद मिलेगी। डीटीआर प्रशासन हाथियों के आने-जाने के नए कॉरीडोर खोजेगा। यही नहीं जहां नेपाल के हाथियों के झुंड निकलते हैं और महीनों तक रहते हैं, उन कॉरीडोर का पता लगाकर उसे बाधामुक्त किया जाएगा। पास के खेतों में अगर बिजली की लाइन होगी तो उसे भी हटाया जाएगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि हाथी उन्हीं रास्तों से आवागमन करते हैं, जिन रास्तों से उनके पूर्वज आते-जाते रहे हैं। हाथी अपनी आनुवांशिक स्मृति के चलते ऐसा कर पाते हैं।
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हाथियों का अनाथाश्रम और सुधार गृह भी है दुधवा
दुधवा में दूसरे जंगलों से अनाथ मिले हाथी शिशुओं का वात्सल्य मय पालन पोषण भी किया जा रहा है। वर्ष 2018 में बिजनौर जिले के अमानगढ़ जंगल में मिली अनाथ गज शिशु दुर्गा और इसी जंगल से 1923 में मादा शिशु गौरी को ममता मय प्यार मिल रहा है। यह दोनों न केवल पार्क प्रशासन, बल्कि सैलानियों की भी लाडल बनी हुई हैं। इसके साथ ही कुख्यात दस्यु ददुआ की सेवा में रहे एक हाथी और वाराणसी जिले में एक व्यक्ति की जान लेने वाले हाथी के लिए दुधवा सुधार गृह बना।
दुधवा के जंगलों में बाघों के साथ हाथियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। तराई हाथी रिजर्व बन जाने से इनका संरक्षण और संवर्धन का कार्य और बेहतर ढंग से हो सकेगा। इनके कॉरीडोर चिह्नित कर उन्हें निर्बाध बनाया जाएगा।
-डॉ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व