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नोटबंदी के संकट से उबरने लगे छोटे उद्योग
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Fri, 24 Feb 2017 11:20 PM IST
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नोटबंदी
- फोटो : अमर उजाला
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कई कारखानों में ठप हो गया था काम, कर्मचारियों की नौकरी पर भी छाया था संकट
नोटबंदी से जिले के छोटे उद्योगों की कमर टूट गई। कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए थे। हालांकि अब धीरे धीरे ये उद्योग उबरने लगे हैं। गेहूं कटाई के बाद स्थिति पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है।
नो नवंबर को पांच सौ और एक हजार के नोट बंद होने के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव जिले के व्यापार पर पड़ा। कारोबार पूरी तरह ठप हो गए। सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ा, जहां दिन भर काम करने के बाद मजदूरों को शाम को मजदूरी देनी होती है। ऐसे कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए थे। कारण था कि पैसा न होने के कारण मजदूरी देने में दिक्कत हो रही थी, वहीं कच्चे माल की आपूर्ति न होने से कारखानों में काम भी बंद हो गया था। शहर से सटी राजपुर की इंडस्ट्रियल एरिया बेरौनक नजर आने लगा था। कारखानों में काम मंद हुआ तो मजदूरों के सामने परिवार चलाने का संकट पैदा हो गया था। वहीं कर्मचारियों को भी लगने लगा था कि पता नहीं कब उन्हें चलता कर दिया जाए। कारखाना संचालक बताते हैं कि पैसा बैंक से मिल नहीं पाता था तो वह भुगतान कहां से करते। अब उनका कहना है कि धीरे धीरे स्थिति सामान्य हो रही है। उम्मीद है कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा।
खांडसारी, राइस और प्लाईवुड की टूटी कमर
जिले में खांडसारी उद्योग की हालत पहले से ही खस्ताहाल थी। बाकी कसर नोटबंदी ने पूरी कर दी। कभी जिले में सौ से ज्यादा क्रेशर चल रहे थे। वर्ष 2016 में महज 16 क्रेशर ही चले। इनमें भी तब सन्नाटा पसर गया, जब नोटबंदी हो गई। यहां आने वाला गन्ना सिर्फ इसलिए नहीं आया कि नोटबंदी के कारण कैश नहीं मिल रहा था। इससे इन इकाइयों को गन्ना काफी कम मिला। इसी तरह राइस मिलें भी सन्नाटे में आ गईं। राइस मिलर्स एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष संजय अग्रवाल ने बताया कि सरकार की नीतियों के कारण पहले ही धान खरीद ठप थी। नोटबंदी से स्थिति और खराब हो गई। एक राइस मिल में लेबर और पल्लेदार मिलाकर सौ-डेढ़ सौ लोगों का स्टाफ काम करता है। इनके भुगतान की समस्या उत्पन्न हुई। यही हाल प्लाईवुड फैक्ट्रियों का हुआ। यहां भी मजदूरों का रोज शाम को मजदूरी चाहिए , लेकिन कैश की समस्या ने यहां भी खूब परेशान किया।
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जिले में कुल उद्योग धंधे 162
जिले में क्रेशर 16
जिले में राइस मिलें 55
प्लाईवुड फैक्ट्री 32
दफ्ती उद्योग 01
कोल्हू 46
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नोटबंदी से जिले के छोटे उद्योगों की कमर टूट गई। कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए थे। हालांकि अब धीरे धीरे ये उद्योग उबरने लगे हैं। गेहूं कटाई के बाद स्थिति पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है।
नो नवंबर को पांच सौ और एक हजार के नोट बंद होने के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव जिले के व्यापार पर पड़ा। कारोबार पूरी तरह ठप हो गए। सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ा, जहां दिन भर काम करने के बाद मजदूरों को शाम को मजदूरी देनी होती है। ऐसे कारखाने बंदी की कगार पर पहुंच गए थे। कारण था कि पैसा न होने के कारण मजदूरी देने में दिक्कत हो रही थी, वहीं कच्चे माल की आपूर्ति न होने से कारखानों में काम भी बंद हो गया था। शहर से सटी राजपुर की इंडस्ट्रियल एरिया बेरौनक नजर आने लगा था। कारखानों में काम मंद हुआ तो मजदूरों के सामने परिवार चलाने का संकट पैदा हो गया था। वहीं कर्मचारियों को भी लगने लगा था कि पता नहीं कब उन्हें चलता कर दिया जाए। कारखाना संचालक बताते हैं कि पैसा बैंक से मिल नहीं पाता था तो वह भुगतान कहां से करते। अब उनका कहना है कि धीरे धीरे स्थिति सामान्य हो रही है। उम्मीद है कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा।
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खांडसारी, राइस और प्लाईवुड की टूटी कमर
जिले में खांडसारी उद्योग की हालत पहले से ही खस्ताहाल थी। बाकी कसर नोटबंदी ने पूरी कर दी। कभी जिले में सौ से ज्यादा क्रेशर चल रहे थे। वर्ष 2016 में महज 16 क्रेशर ही चले। इनमें भी तब सन्नाटा पसर गया, जब नोटबंदी हो गई। यहां आने वाला गन्ना सिर्फ इसलिए नहीं आया कि नोटबंदी के कारण कैश नहीं मिल रहा था। इससे इन इकाइयों को गन्ना काफी कम मिला। इसी तरह राइस मिलें भी सन्नाटे में आ गईं। राइस मिलर्स एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष संजय अग्रवाल ने बताया कि सरकार की नीतियों के कारण पहले ही धान खरीद ठप थी। नोटबंदी से स्थिति और खराब हो गई। एक राइस मिल में लेबर और पल्लेदार मिलाकर सौ-डेढ़ सौ लोगों का स्टाफ काम करता है। इनके भुगतान की समस्या उत्पन्न हुई। यही हाल प्लाईवुड फैक्ट्रियों का हुआ। यहां भी मजदूरों का रोज शाम को मजदूरी चाहिए , लेकिन कैश की समस्या ने यहां भी खूब परेशान किया।
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जिले में कुल उद्योग धंधे 162
जिले में क्रेशर 16
जिले में राइस मिलें 55
प्लाईवुड फैक्ट्री 32
दफ्ती उद्योग 01
कोल्हू 46